जनवरी 12, 2015

हमारे सपनों का शहर दिल्ली

दिल्ली  हमारे सपनों का शहर। हम कभी सपनों में भी दिल्ली नहीं आपाते। अगर हमारी दादी ने हमारे पापा को बाहर पढ़ने के लिए भेजा न होता। तब यहाँ रहना तो दूर, इसे कभी छू भी नहीं पाते। हम दिल्ली रोज़ सुनते, पर कभी इसे देख नहीं पाते। हम भी वहीं चार-पाँच साल पहले तुमसे शादी और दो बच्चों के बाद या तो चाचा की तरह बंटवारे में अपना हिस्सा लिए, ख़ुद को कोसते ‘चिचड़ी चौराहे’ पर पान की ढाबली खोले बैठे होते या मनरेगा हमें भी लील गया होता। कभी ऐसा भी होता के माता-पिता से लड़ झगड़ लेने के बाद गुस्से में दिल्ली होते हुए लुधियाना पंजाब में कहीं कपड़े की दुकान पर तह लगा रहे होते। या फ़िर संदीप की तरह पूना भाग जाते। वहाँ से पैसा भेजा करते। फ़िर कभी लौटकर गाँव के लड़कों की तरह कैसे भी करके(?) सऊदी जाने के ख़याल में डूब जाते।

ऐसे में अगर कभी गलती से दिल्ली  आ भी गये होते, तो पहाड़गंज रेलवे स्टेशन की तरफ़ रिक्शा खींच रहे होते और जीबी रोड़ के किसी कोठे पर किसी असहाय मज़बूर लड़की में तुम्हारी तस्वीर ढूँढ़ रहे होते। थोड़ा नशा भी करने लगते तो कोई पहाड़ नहीं टूट जाता और न राई का पहाड़ हो जाता। एक मोबाइल तुम्हारे पास भी रख छोड़ते, जिसपर कभी किसी हवलदार की झन्नाटेदार लाठी खाने के बाद हो रहे दर्द और सूज गए पैर पर हल्दी लगा रंग तुम्हें बता रहे होते। उस पल हम दोनों को एक साथ जिंदगी जिंदगी न लगकर नर्क का एहसास करा जाती। तुम अगली गाड़ी से ही यहाँ आ जाना चाहती पर न हमारे पास इतने रुपये होते न उस कमरे में इतनी जगह कि हिम्मत करके तुम्हें तुरंत दिल्ली बुला लेते। एक-एक दिन पत्थर की तरह भारी लगते। जिन्हे उठाते-उठाते कमरदर्द ‘आयोडेक्स’ या ‘मूव’ से ठीक हो जाने की जद से काफ़ी दूर निकल आया होता। फ़िर रिक्शे वालों के सपनों में कभी पीएचडी करने के ख़याल नहीं होते। वहाँ किसी दुकान पर बीवी के लिए पेटीकोट सिलवाने में बच गए दस रुपये और किसी के हाथ माता-पिता के लिए कुछ पैसे भिजवा देने के सपने होते।

अगर ऐसा नहीं होता, तब वहीं बहराइच में पान वाली ढाबली बिठाने और शादी होने से पहले पटहरों की तरह बेरिया, जंगलिया बाबा, देवी पाटन से लेकर दरगाह मेले में फूफ़ा की तरह या तो झंडी लेकर घूम रहे होते या बाबा की तरह मोहर्रम में तहाजियों के जुलूस में जलेबी की दुकान पर चालीसवें तक उधार मिठाई तौल रहे होते। कभी नहीं जान पाते जैसलमेर, राजस्थान में कहीं ‘पटवा की हवेली’ भी है। कोई सुंदरलाल पटवा नाम से किसी सरकार में मंत्री भी रहे हैं। इसी दिल्ली के पहाड़गंज में रामनाथ पटवा गली  है। जनसत्ता में कभी-कभी शुभू पटवा  नाम से लेख आते हैं। जमना पार की दिल्ली में कितनी धर्मशालाएँ, सामुदायिक भवन छितरे पड़े हैं। सदर बाज़ार में इनकी इतनी बड़ी-बड़ी दुकाने हैं कि चले जाओ तो सीधे मुँह बात भी नहीं करते। इधर कई पटवा अपने नाम के आगे ‘देवल’ लगाने लगे हैं। एमएन श्रीनिवास इसे ही ‘संस्कृतिकरण’ की प्रक्रिया कहते हैं। यह देवल ‘देओल’ का अपभ्रंश है। पता नहीं इन्हे कब सनी और बॉबी देओल की तरह माना जाने लगेगा? या शायद कभी किसी फ़िल्म में स्पॉटबॉय के नाम से रोल होता रहे और हमें पता भी नहीं चल पाये।

पटहरों का इतिहास  कभी नहीं लिखा गया। प्रो. तुलसीराम की मुर्दहिया में टिकुली-बिंदिया वाले पटवा सिर्फ़ एक पंक्ति में सिमट कर रह गए। सतीश पंचम  पता नहीं कैसे इस बिसाती  तक पहुँच गए। कुछ तस्वीरें उनके पास भी हैं। उनके गाँव की हैं। नाम पता नहीं। वह मैसूर के किसी अनाम से मंदिर के बाहर सोने के बूंदियों के साथ माला गूथने में लगे हुए हैं। हम लोग पता कभी दो तीन-पीढ़ी पहले बनारस से चलकर बहराइच क्यों पहुँचे थे? अब उसी बनारस से साल में दोबार फूफा सामान खरीदने जाते हैं। कितना अजीब है न। दादी  होती तो ज़रूर कुछ बतातीं। जैसे पता नहीं कितने साल पहले एकबार फैज़ाबाद के भण्डारे की बात बता रही थीं और हम सुन नहीं रहे थे।

{जारी..}

{चौदह जनवरी, आज खिचड़ी है। इसका संशोधित संपादित अंश, आज दैनिक हिंदुस्तान में आया है। पढ़ने के लिए इधर क्लिक करें..फ़िर आई तारीख़ बाईस जनवरी, आज जनसत्ता में, अपने पुराने अड्डे, समांतर पर। }

{बस वहाँ एक गलती रह गयी। प्रो. तुलसीराम की मणिकर्णिका की जगह उनकी आत्मकथा के पहले खंड, मुर्दहिया में वह एक पंक्ति थी। }

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