जनवरी 31, 2015

कानपुर सेंट्रल

कानपुर कभी किसी याद का हिस्सा नहीं रहा। सिर्फ़ एक छोटी-सी धुँधली तस्वीर में दादी के चले जाने के बाद, रात दो बजे कानपुर से लखनऊ की तरफ़ भागती रोडवेज़ बस में बोनट पर गुजरी असहाय यात्रा के अलावे कुछ याद नहीं। उसमें कानपुर कहीं नहीं है। सिर्फ़ लंबी काली सड़कें, घूमते पहिये और चमकती लाइटें हैं। अंदर सुनाई दे रही अनगिनत अनसुलझी आवाज़ों में मन कहीं दिल की तरह डूब गया है। आँखें धड़कनों की तरह चुप हैं। मेरे हाथ कहीं गुम हो गए हैं। मैं भी कहीं सयास गुम हो गया हूँ। कुछ दिख नहीं रहा है। पता नहीं वह कौन सी रेलगाड़ी थी, जो हमें हमारे गाँव से इतने किलोमीटर पीछे छोड़कर कहीं चली गयी। इसतरह अँधेरा हमेशा अपने साथ डर नहीं लाता, अकेलेपन का एहसास भी लाता है। हम छह लोग रहे होंगे। पर सब अपने अपने दुखों में नितांत अकेले थे।

पता नहीं क्यों हम कहीं जाने से पहले उस जगह को जान लेना चाहते हैं? किसी नयी जगह को जल्दी से जान लेने की हड़बड़ाहट बहुत अजीब है। पर मेरी इस छोटी-सी याद में ऐसा कुछ भी नहीं था। कि कहीं गुम हो जाने के एहसास से भर जाता। जेब में इतने दिन भी नहीं थे कि इत्मीनान से शहर का मिजाज़ देख पाते। हमारी गिनती कुल मिलकर एक दिन पर रुक गयी थी। फ़िर आने वाली अगली सुबह से पहले जितनी भी कल्पनायेँ अंदर थीं, वह बाहर आने लगीं। पता नहीं कहाँ से गणेश शंकर विद्यार्थी और प्रताप प्रैस मन पर छा गए। दीप्ति कक्कड़ की फ़िल्म कँटियाबाज कानपुर में बिजली की कहानी याद आने लगी। पंद्रह-पंद्रह घंटे लाइट नहीं आती। लोग परेशान हैं। तब वहाँ चमनगंज में लोहा सिंह का उदय होता हैं। इधर पता नहीं कितने साल पहले गंगा किनारे किस बड़े कारखाने के बंद होने की ख़बर अख़बार में आई। बड़े-बड़े कारखाने बंद हो चुके हैं। उनके गेट पर ताले लग चुके हैं। गंगा किनारे पूर्व के मेंचेस्टर का मिथक टूट रहा था।

इतनी निर्ममता से अंदर ही अंदर एक शहर की बुनावट को दूर से देखते हुए उसके रेशे-रेशे उधेड़ रहा हूँ। शायद मेरे लिए यह इसलिए भी आसान है क्योंकि यह मेरा शहर नहीं है। और यह असल में यह सब बातें यादें नहीं, तथ्य हैं। हमारे अंदर नहीं, हमसे बाहर। अभी तक कानपुर नहीं पहुँचा। यहीं एक ठंडी शाम को दिल्ली में हूँ, जब जबलपुर से अनूप जी से फ़ोन पर बात हो रही है। वह कानपुर को यूपी का कलकत्ता बताते हैं। अब मेरा कानपुर कैसा होगा? मुझे बिलकुल नहीं पता। एकदम से मेरा दिमाग रुक गया, जैसे कोई शहर ठहर जाता हो। यह एक ऐतिहासिक नगर की औपनिवेशिक व्याख्या है। हमारे मनों में कलकत्ता का मतलब अतीत में कहीं ठहर गया शहर है। हमारे अंदर का यह कलकत्ता, वह कलकत्ता कभी नहीं होता अगर ब्योमकेश बक्शी से हम न मिले होते। हमें तलाश है किसी कानपुरीए जासूस की, जिससे हम प्यार कर सकें। उसकी नज़र से शहर देख सकें। तनु  भी कानपुर दिखाते-दिखाते लखनऊ चली गयी।

पर कानपुर कैसा होगा? एक कानपुर देहात है। एक कानपुर शहर है। अपनी भी दो दिल्ली हैं; एक नयी, एक पुरानी। भोपाल और लखनऊ भी एकसाथ नए और पुराने शहरों को अपने अंदर लिए ख़ुद को लगातार बदल रहे हैं। इनके बीच कोई कर्क रेखा नहीं होती। वह हमारे मन में होती है, जो इन शहरों को बाँटती है। वह बराबर एक-दूसरे में आवाजाही करते रहते हैं। घुलेमिले होते हैं। लेकिन जब हम इतनी बड़ी-बड़ी श्रेणियाँ बनाकर किसी जीवंत शहर या ऐसी ही किसी संज्ञा का वर्गीकरण करते हैं, तब समस्याग्रस्त हो जाते हैं। उसी क्षण हम बारीक परतों को अनदेखा कर देते हैं, जिनके बीच अतीत और वर्तमान अदृश्य रहकर भविष्य को निर्मित करने में लगे रहते हैं। वह तब शहर नहीं रहता टेक्स्ट बन जाता है। एक पाठ, जिसे कोई किताब की तरह पढ़ने की ज़िद लिए रहता है। वैसे कभी-कभी लगता है, इतने सवाल सिर्फ़ हम जैसे एक-दो दिन शहर से ऊपर से उड़ने वाले कबूतर ही पूछते हैं, वहाँ रहने वालों को कभी इनसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता।

{जारी..} 

{आज दैनिक हिंदुस्तान में। तारीख़ छह फरवरी। साइबर संसार। कैसा होगा कानपुर। }

4 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर प्रस्तुति !
    आज आपके ब्लॉग पर आकर काफी अच्छा लगा अप्पकी रचनाओ को पढ़कर , और एक अच्छे ब्लॉग फॉलो करने का अवसर मिला !

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    1. प्रस्तुति किस तरह सुंदर है (?) उसका भी अपना सौंदर्यशास्त्र है। यह शाब्दिक, भावनात्मक, दृशयात्मक, चित्रात्मक या ऐसी किन्ही और प्रकारों की हो सकती है।

      बस थोड़ा कहने का मन किए रहता है, इसलिए कहते रहने की आदत को यहाँ बनाया हुआ है। आप आए उसका आभार। आगे भी आते रहेंगे, इसी कामना के साथ..:)

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  2. भाई नमस्कार , हिंदी के विभिन्न ब्लागों को खंगालते हुए आपके ब्लॉग पर पंहुचा.मै भी आपके इलाके का हूं इसलिए चपरहपन बुझने में ज्यादा दिक्कत नहीं हुई .आपका कथ्य और शिल्प दोनों मनोहारी है ;सबसे उम्दा है ब्लॉग का नाम.जल्दी जल्दी लिखो भाई ताकि लगतार मजा मिलता रहे ...आपका शिव कुमार शर्मा

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  3. 'बूझना' अवधी में है या नहीं पर यह मुझे 'भोजपुरी' का शब्द जादा लगा।
    फ़िर आप जिसे मज़ा कह रहे हैं, उससे आपका क्या तात्पर्य है, उससे थोड़ा और स्पष्ट करेंगे तो उचित रहेगा।

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