जनवरी 10, 2015

वापसी..

एकबार एक कहानी में एक स्टेशन मास्टर होते हैं। उनकी उमर इतनी लगती कि लगता अभी कल ही नौकरी से जा रहे हैं। पर सालों से कहीं गए नहीं थे। तब हमारे पास बुलेट ट्रेन का सपना दिखाने वाले जादूगर नहीं थे। यह तबकी बात है जब हमारे पास ठीक-ठाक रेलगाड़ी के डिब्बे बनाने वाले कारखाने नहीं थे। मालगाड़ियाँ भी गिनती की थीं और सवारी-गाड़ियाँ उनसे भी कम थीं। जितनी पटरियाँ थीं, सब खाली थीं। उन खाली पटरियों से दिनभर ख़ूब खाली वक़्त निकलता रहता। यही खाली वक़्त इत्मीनान और सुकून बनकर स्टेशन को चारों तरफ़ से घेरे रहता। स्टेशन मास्टर का स्टेशन से अलग कोई अस्तित्व नहीं था। अगर कोई अस्तित्व था भी, तो उनका अस्तित्वबोध अभी जागा नहीं था। फ़िर इसे समझने के लिए उनके पास इतनी पढ़ाई नहीं थी। उनके घर की अलमारी में कभी नीत्से, सार्त्र के नाम वाली कोई किताब नहीं थी।

उनके पास सिर्फ़ एक घर था। ऐसा वह अक्सर सोचा करते। सोचा करते, वह एक दिन अपने घर लौट जाएँगे। वैसे अधिकतर उनका दिमाग कभी खाली नहीं रहता। हमेशा दूध जलेबी के गरमा-गरम स्वाद से भरा रहता। उनका नौकर, नौकर न होकर उन खाली क्षणों को सुखद अनुभूतियों में बदलने वाला सहायक बन जाता। ख़ूब आनंद के दिन थे। इसलिए एक दिन वह रिटायर हो गए। सब खाली पटरियाँ वहीं रह गईं। सब रेलगाड़ियाँ वहीं छूट गईं। छूट गए सब जलेबी वाले दोने, दूध और मलाई से लबालब भरे गिलास। कुल मिलकर सुख छूट गया। वह घर वापस आ गए। उस घर वापस आ गए, जहाँ इतने सालों में वह पत्नी, बच्चों, बहुओं के साथ कभी नहीं रह पाये थे।

इससे मिलती-जुलती कहानी सालों पहले कभी उषा प्रियंवदा ने भी लिखी थी। कहानी पुरानी है और कहीं इंटरनेट पर मौजूद भी होगी। इसलिए आगे क्या हुआ (?) यह नहीं बताने वाला। शायद इतना कहना काफ़ी होगा कि वह चीफ़ की दावत  वाली बूढ़ी माँ नहीं, स्टेशन मास्टरी से रिटायर हुए पिता हैं। पता नहीं इस बात का कोई मतलब है भी या नहीं। पर कहीं-न-कहीं लगता है, कहानी में एक घोड़े की कमी है। वापसी सिर्फ़ स्टेशन मास्टर की नहीं, एक घोड़े की भी होनी चाहिए थी। कैसे भी करके वहाँ एक घोड़ा होना चाहिए। भले वह काला होता, सफ़ेद होता, फ़र वाला होता या कैसा भी होता (?) पर होता ज़रूर। उसका होना ज़रूरी था। मेरी कहानी में मेरा ब्लॉग, मेरा घोड़ा है।

यह घोड़ा उस दिन मुझे फ्योदोर दोस्तोएवस्की  की कहानी में मिला। कहानी में एक आदमी है। वह अंदर से जितना दुखी है, बाहर से भी उतना ही दुखी है। कभी वह चिल्लाता, कभी किसी से झगड़ने लगता। उसने कभी अपने दुख को किसी से नहीं छिपाया। इस कारण लोग उससे कटने लगे। कोई सीधे मुँह बात नहीं करता। जैसे-जैसे दिन बीतने लगे, उसका व्यवहार असामान्य होने लगा। सब उसे पागल कहने लगे। उसने भी इस छवि को ओढ़ लिया और पागलों की तरह रहने लगा। एक शाम, किसी बात पर वह शहर छोड़ देता है। उसके साथ सिर्फ़ एक घोड़ा है। दोनों शहर से बहुत दूर जंगल में कहीं भटक जाते हैं। चलते-चलते दोनों थक जाते हैं और थककर रुक जाते हैं। तब वह व्यक्ति अपनी सारी बातें उस घोड़े के सामने बुदबुदाने लगता है। घोड़ा भी आदत के मुताबिक अपनी गर्दन हिलाने लगता है।

हिलती गर्दन देखकर उसे लगता, घोड़ा बहुत ध्यान से उसकी बातें सुन रहा है। इसतरह वह बोलता रहा और घोड़ा गर्दन ऊपर-नीचे करता रहा। वह पहला जीव था, जो चुपचाप उसकी सारी बातें सुन रहा था। यह देखकर वह लगातार बहुत दिनों तक बोलता रहा कि बर्फ़बारी के कारण घोड़े के सिर पर बर्फ़ जमा हो गयी। बर्फ़ घोड़े की आँख के आसपास इसतरह इकट्ठी हो गयी कि जैसे वह उन बातें सुनकर रो रहा हो। यह देखकर वह आदमी भी द्रवित हो जाता है। अपने आँसू रोक नहीं पाता। और ख़ूब रोता है। ख़ूब रोता है।

उसे अपनी ज़िन्दगी में सिर्फ़ एक घोड़े की ज़रूरत थी। हम सबके पास भी अपने-अपने घोड़े होते हैं। हम इसे कभी घर, सपने, दोस्त, मन, डायरी या ऐसे ही किसी भाववाचक संज्ञा में तब्दील कर लेते हैं। लेकिन सबसे ज़रूरी है, इनकी पहचान। अट्ठाइस दिसंबर के बाद दिन में कितनी बार मुझे कुछ खाली-खाली सा लगता। लगता कुछ छूट गया है। मेरा मन कहीं रह गया है। कहने का मन करता, पर कह नहीं पाता। अंदर-ही-अंदर रिसता रहता। ऐसा नहीं था, कहने के लिए बहुत सारी बातें होतीं। चुप रहता तो भी मन करता, उसे कह पाता। बार-बार लगता, कहीं बहुत दूर चला आया हूँ। वहाँ से लौट आने का मन करता। मन करता, झट से सब कह दूँ। मन के अंदर कोई सिलवट बनने से पहले, बोलने जैसा। जैसे, कभी कहीं बहुत दूर जाकर लौट आने का मन हो, उसे घर कहते हैं। उसी तरह मैं भी धीरे-धीरे लौट रहा हूँ।

फ़िर इधर तीन दिन पहले अशोक वाजपेयी की कविता पढ़ रहा था। दरवाज़ादरवाज़ा खुल सकता था। कोई खोले तभी नहीं। अपने आप भी, क्योंकि पूरी तरह बंद नहीं था। किसी ने किया ही नहीं। सबको जाने की जल्दी होती है, ठीक से बंद करने की नहीं। जाने के बाद दरवाज़ा भुला दिया जाता है। अगर न जाते और वहीं बंद या घिरे रहते तो दरवाज़ा बना रहता। दरवाज़ा घेरे हुए को रोकता है और अनघिरे को अंदर आने से थामता है। दरवाज़ा न हो तो घिरा-अनघिरा गड्डमड्ड हो जाये। आवाजाही दरवाज़े से होती है: पर फ़िर भी थोड़ा सा बाहर अंदर और थोड़ा सा अंदर बाहर फिसल ही जाता है क्योंकि दरवाज़ा कभी पूरी तरह से बंद नहीं होता। हम ऐसा करना जानबूझकर भूल जाते हैं

यह हमें तय करना है, हम दरवाज़े के किस तरफ़ हैं? और इसतरह मैं दोबारा लौट आया, इसी दरवाज़े से अंदर।

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