जनवरी 30, 2015

गाँधी का होना..

पता नहीं यह कैसा भाव है। पर यह ऐसा ही है। गाँधी होना कितना मुश्किल है। कितनी कठिन हैं वह परिस्थितियाँ जिनके बीच सौ साल पहले दक्षिण अफ्रीका से वह लौटे होंगे। ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन अपने शासित उपनिवेशों की कीमत पर अभी प्रथम विश्व युद्ध लड़ रहा है। अगले तीन सालों में वह विजयी दल का महत्वपूर्ण सहयोगी बनकर उभरने वाला है। कोई अनुमान नहीं लगा सकता कि परतंत्र भारतीय राजनैतिक परिदृश्य में गाँधी कहाँ खड़े होंगे? सब कितने सैद्धांतिक से सवाल हैं न! अनुशासनबद्ध, तथ्यात्मक से। इनमें से कई जवाब विपिन चंद्र या रामचन्द्र गुहा की लिखी किताबों में आसानी से मिल जाएँगे। नहीं मिलेगी तो हमारे अंदर छिपी गाँधी की छवि। कभी हम मौका ही नहीं देते, थोड़ा ठहरकर ख़ुद से बात करें। थोड़ा देखें, हमारे किस हिस्से में कितने और कैसे गाँधी छिपे हुए हैं? हमने उनके प्रति किन अवधारणाओं, किन मान्यताओं को सबसे ऊपर वाले ताखे में रखा हुआ है। वह कहीं अंदर ही खो तो नहीं गए हैं। इतने सालों में कहीं ढक गए होंगे शायद।

तब इस छब्बीस जनवरी की तरह लोकसभा टीवी नहीं होता था। तब सिर्फ़ दूरदर्शन था। दो अक्टूबर ठंड थोड़ी-थोड़ी आहट के साथ धीरे से दरवाजे के पीछे कहीं छिपी होती। पूरी तरह आने में अभी वक़्त होता। जैसे दिवाली अभी आई नहीं होती। हम तीसरी चौथी क्लास में रहे होंगे, जबसे कई साल लगातार हम इस दिन टेलीविज़न पर ‘गाँधी’ को देखते। फिल्म में अभिनय कर रहे उस विदेशी कलाकार का असली नाम कुछ भी रहा हो, वही हमारे सबसे पहले गाँधी थे। बैन किंगस्ले वह कई सालों बाद बने। फ़िर पता नहीं हम स्कूलों में कौन-सी किताबें पढ़ रहे थे कि दसवीं तक आते-आते हम यह भी नहीं जान पाये, गाँधी किस तरह भारत को देखते थे? उनके सपनों का भारत कैसा था? 

इसके बाद गाँधी पता नहीं कहाँ गायब हो जाते हैं? वह कभी किसी किताब में नहीं मिलते। कहने को हम बीए में इतिहास पढ़ रहे थे पर हमारे लिए ज़रूरी था, योरप का इतिहास। वैश्विक परिदृश्य को जानना-समझना, उनसे परिचित होना। शायद ‘ग्लोबल विलेज’ का नागरिक होने के लिए यह पहली शर्त रही होगी। अपने परिवेश से परिचित होना, राष्ट्र के अतीत या उसकी निर्माण प्रक्रिया की व्याख्याओं से हमें कभी अवसर देना उस पाठ्यक्रम का उद्देश्य नहीं रहा होगा। पता नहीं यह कैसे हुआ होगा के स्वतन्त्रता आंदोलन से निकली सत्तासीन उत्तराधिकारी पार्टी के रहते, हम उनकी भूमिका बिलकुल भी नहीं समझ पाते। उल्टे उन विचारों से घिर जाते हैं, जहाँ बिना प्रतिरोध विभाजन के इर्द-गिर्द उनकी एक अलग ही छवि सयास गढ़ी जा रही थी। उनकी यह रूपाकृति एक खलनायक की थी।

इन सब परिघटनाओं के मध्य वह राष्ट्रपिता बने रहे और हर राष्ट्रीय पर्व या विशेष अवसरों पर गणमान्य नेता अतिथि सब राजघाट आते रहे। हम सब भी टीवी सेटों पर उन लोगों के वहाँ एकबूढ़ी महिला विशेष के साथ देखने के अभ्यस्त होते गए। वह सन् छियानवे में पहली बार किताबों में छपे अपने जंतर और राजघाट की परिधि से बाहर आते हैं, जब सरकारी नोटों पर उनकी तसवीरें छपने लगी। इसने गाँधीवादी विचारों और उनके अवदान को किन रूपों में प्रभावित किया, यह अभी अन्यत्र शोध का विषय है। फ़िर एक साल आया जब गाँधी से एक बार फ़िर मुलाक़ात होती है। यह ‘इतिहास’ के रास्ते नहीं बल्कि ‘शिक्षा’ के जरिये संभव होती है।

विषय के रूप में ‘शिक्षा’ गाँधी को उनकी राजनीतिक व्याख्याओं और पाठों से अलग वृहद व्यक्तित्व में उपस्थित करती है। अगर हम उम्मीद करते हैं कि शिक्षा के द्वारा हम समाज को बदलने, उसमें आमूलचूल परिवर्तन की निर्णायक भूमिका देखना चाहते हैं, तब वैचारिक रूप से शिक्षा को समाज की स्थापनाओ के विपरीत कार्य करना होगा। गाँधी उस समाज में नयी तालिम का प्रस्ताव करते हैं, जो अपनी संरचना में इतना जातिवादी है, जहाँ जीविकोपार्जन के लिए अपनाया गया पेशा आपको आसानी से ‘अस्पृश्य’ बना देता है, वहाँ दिमाग और हाथ की शिक्षा समाज का विपर्यय ही थी। शायद उन्हे पता था, उनकी नीति विफल होगी पर इस तरह वह औपनिवेशिक शिक्षा का प्रतिविचार उपास्थित करते हैं। वे किसी अनभिज्ञ, अपरिचित संसार को नही रचते, न उसमें प्रविष्ट होते हैं। वे समाज की समस्याएँ इसी समाज के भीतर से निकालते हैं। ‘ग्राम स्वराज’ इसी अवधारणा से निकला ‘यूटोपिया’ था, जो ‘आधुनिक’ बनने की इच्छा से भर गए गाँवों द्वारा शहरों की भौंडी नकल करने में कहीं पीछे छूट गया। आज यह अभेद हमारी विविधता के लिए सबसे गंभीर जातीय संकट है।

यह पहला अवसर था, जब सच में गाँधी के विचारों उनकी मान्यताओं को इतनी पास से देखना शुरू किया। वे हमेशा जटिल, विवादास्पद, गंभीर, वैविध्य विचारों-दृष्टिकोणों में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप की तरह मौजूद रहते हैं। आज जब किसी को गाँधी की नकारात्मक, तथ्यहीन, दुराग्रहपूर्ण आलोचना करते देखता हूँ, तब उनसे सिर्फ़ एक सवाल करता हूँ; क्या उन्होने कभी गाँधी को पढ़ा है? इस प्रश्न के बाद उनके हिस्से सिर्फ़ चुप्पी आती है। वे कुछ नहीं बोलते। बस आगे बढ़ जाते हैं। अगर उन्होने कभी पढ़ा होता, तो वह कभी ऐसी क्रियाओं में संलग्न नहीं होते। गाँधी के विचारों की परिधि इतनी विस्तृत है कि कोई भी उन्हे सिरे से नकार नहीं सकता।

इधर हम इस उत्तर आधुनिक परिघटना को घटित होते देख रहे हैं। कैसे उनके चश्मे से ‘स्वच्छ भारत’ देखने की कोशिश हो रही है। बार-बार ख़ुद को उनसे जोड़कर अपनी वैधता प्रमाणित करने की कोशिशें आक्रामक हो गयी हैं। पर काश, अपने नाम वाले सूट को पहनने से पहले वह चश्मे वाले गाँधी का जंतर पढ़ लेते तो कथनी और करनी में फाँक ज़रूर कुछ कम होती। पर यह भी तो है, सिर्फ़ नाम लेने से क्या होता है? परत उघड ही जाती है। जब आप सिर्फ़ किसी विचार को चादर की तरह ओढ़ते हैं, तब ऐसा ही होता है।

जो गाँधी का जंतर देखना चाहें:
मैं तुम्हें एक ताबीज देता हूँ। जब भी दुविधा में हो या जब अपना स्वाार्थ तुम पर हावी हो जाए, तो इसका प्रयोग करो। उस सबसे गरीब और दुर्बल व्यक्ति का चेहरा याद करो जिसे तुमने कभी देखा हो, और अपने आप से पूछो- जो कदम मैं उठाने जा रहा हूँ, वह क्या उस गरीब के कोई काम आएगा? क्या उसे इस कदम से कोई लाभ होगा? क्या इससे उसे अपने जीवन और अपनी नियति पर कोई काबू फिर मिलेगा? दूसरे शब्दों में, क्या‍ यह कदम लाखों भूखों और आध्या त्मिक दरिद्रों को स्वराज देगा? तब तुम पाओगे कि तुम्हारी सारी शंकाएं और स्वार्थ पिघल कर खत्म हो गए हैं।
जंतर, श्रीश के ब्लॉग से। तारीख़ इक्कीस मई, दो हज़ार दस। 

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