जनवरी 11, 2015

इस तरह मैं भी एक विस्थापित हूँ..

दिल्ली। एक जनवरी, दो हज़ार पंद्रह। रज़ाई में बैठे। पैर में मोज़े पहने। वक़्त सुबह के दस बजकर बीस मिनट। कभी-कभी हम बहुत सारी बातें खुद से करते रहते हैं जिनका हमसे बाहर कोई मतलब नहीं होता। हम ऐसे ही कहीं किसी खाली कमरे में बैठे होते हैं। आहिस्ते से अपनी डायरी में बेतरतीब लिख रहे होते हैं:

इसतरह मैं भी एक ‘विस्थापित’ हूँ। अपनी ज़मीन छोड़कर चला आया हूँ। जैसे सब शहरों के गाँव होते हैं, मैं भी अपना गाँव छोड़कर आया हूँ। उन जगहों को अपनी रगों में ले आया हूँ। असल में वह मेरा गाँव ही है। मेरे लिए गाँव का मतलब, जड़ें हैं। जहाँ से मैंने लिखना शुरू किया। आड़ा-तिरछा उल्टा-सीधा जैसा भी था, वह मन के अंदर कहीं गहरे अपनी छाप के साथ बैठा है।

हो सकता है, किसी दिन किसी पुरानी याद की तरह उस जगह पर लौट जाऊँ। लौट ही जाऊंगा कभी, कह नहीं सकता। कभी नहीं लौटूँगा, यह भी नहीं कहूँगा। जहाँ मैं था, वहाँ मेरे पास एक-एककर रुके रहने के बहाने कम होते जा रहे थे। बहाने ख़त्म हो जाने के बाद एक दिन मुझे वहाँ से चल पड़ना था। ठहरे रहना, उन्ही बातों में फँसे रहने जैसा था। इतना लिजलिजा होकर मैं कह नहीं पाता। इसलिए एकदिन, अचानक बिन बताए, गायब हो हाने से अच्छा था, सबको कहकर आना। हरतरह के इंतज़ार को ख़त्म कर देना। वहाँ एक चिट्ठी छोड़ आया हूँ। उसमें लिख दिया है। लिख दिया है, इंतज़ार मत करना। बहुत हल्के से, कान में कह दिया है। 

इस नयी जगह का भी कोई नक्शा मेरे पास नहीं है। कौन-सी चीज़ किस जगह रखनी है, सब नए सिरे से देखना होगा। नीचे के ताखे में कोई कतरन छूट जाने पर चूहों का डर नहीं रहेगा। किन्हे बिल्ली के कारण ‘सिकहर’ पर ऊँचे टाँगना होगा। ‘डेहरी’ में क्या-क्या आगे आने वाले दिनों के लिए बचाकर रख लेना है? ‘मसेहरी’ पर किस वक़्त कौन आजाता है, यह भी नहीं पता? ‘दुआरे’ किसे खड़ा करने से काम चल जाएगा? सब एकदम खाली घर के अकेले कमरे की तरह है। लगता है, अभी-अभी किसी भरी गाड़ी से उतरकर खड़ा हुआ हूँ।

इसे अभी किसी खाँचे में नहीं डाल रहा। हो सकता है, शायद यह भी पिछली डायरी की तरह बनती जाए। कई सारी चीज़ें हूबहू वहीं हों। मैं चाहकर भी उनसे कभी बाहर न निकल पाऊँ। इसमें कुछ भी नया न कर पाऊँ। और एकबार फ़िर लगने लगे कि ख़ुद को दोहराता रहूँ, तब यहाँ भी वैसा ही एक दिन यहाँ भी आएगा, जब यहाँ से लौट जाऊँगा। यह दोहराव उन्ही मनः स्थितियों के इर्दगिर्द घूमते रहने के बाद निकली खीज है। ख़ुद को कहीं भी ‘फ़िट’ न करपाने के बाद उपजी ‘टीस’ है। अंदर-ही-अंदर रिसती बातों का बाहर आकर ‘बेतरतीब’ हो जाना है। उन्हे कहाँ, कौन, कैसे, किस तरह उठाकर अपनी जेब में रख लेगा, पता नहीं। क्या पता मेरी तरह उनकी जेब भी फटी हो?

यहाँ आकर एकबार फ़िर अपने जैसे लोगों को ढूँढ़ने की तकलीफ़ देह पड़ताल शुरू कर रहा हूँ। फ़िर बनाऊँगा सपनों की दुनिया। एक यादों की किताब। मेरे अनछुए दिनों की याद। छुटपन की दुपहरियों की याद। छोटे भाई के साथ छत पर खेलते रहने वाली शामों की याद। तब घड़ी देखने से कहीं आज़ाद ख़याल था, खेलते हुए ढलती शाम देखना। उन शामों के बाद उतरती रातों में तारों को दिल में उतरते देखना। इसतरह यह एकबार फ़िर लिखने की ज़िद का अंदर से बाहर की तरफ़ आ जाना है। अंदर से बाहर देखने के लिए खिड़की की ज़रूरत है। बाहर से अंदर झाँकने के लिए भी यह उतनी ही ज़रूरी होगी। आज से इसका नाम ‘दीवार में खिड़की रहती है’ रख देते हैं।

5 टिप्‍पणियां:

  1. Nice article sir. Thanks a lot for sharing with us. I am a regular visitor of your blog.Online GK Test

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    1. आने। लगातार आने। पढ़ने। लगातार पढ़ने के लिए आभार।

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  2. मनः स्थितियों के इर्दगिर्द घूमते रहने के बाद निकली खीज है। ख़ुद को कहीं भी ‘फ़िट’ न करपाने के बाद उपजी ‘टीस’ है।
    बिलकुल ऐसा ही होता है। मन की बात बढ़िया तरीक़े से लिखी है। :)

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    1. मन ही तो है, जो कह देता है, वरना हम तो न जाने कब से चुप रहने की आदत लिए अंधेरे बंद कमरों में बैठे हुए थे। अगर नहीं कहूँ, तो क्या करूँ। मजबूरी है। मजबूर हूँ।

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  3. मन की बात बढ़िया तरीक़े से लिखी है। :)

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