जनवरी 17, 2015

एक अधूरा डरा घोषणापत्र

बड़े दिनों से यह सारे सवाल अंदर-ही-अंदर उमड़ते रहे हैं। कहीं कोई जवाब दिखाई नहीं देता। उन सबका होना हमारे होने के लिए पता नहीं कितना ज़रूरी है? पर यह समझना मुश्किल है कि इधर नींद न आने का असली कारण क्या है? शायद हमें अपनी पहचान छिपाये रखनी है। कोई हमें देख न ले, हम कौन हैं। उनका देख लेना हमारे अस्तित्व के लिए ख़तरा है। ख़तरा पहचान के मिटाये जाने का है। सबसे पहले वह हमें पहचानते हैं, हमें पास से देखते हैं। तब उनका हमला होता है। फ़िर हम कहीं नहीं होते। हमारी आवाज़, हमारे रंग, हमारी सहमति, हमारी असहमति, हमारा विरोध सब वहीं अलगनी के बगल वाले पटरे पर धरा रह जाता है। कोई वापस आकर देख नहीं जाता के हम लौटे हैं कि नहीं। क्योंकि शर्तिया वहाँ से कोई लौट ही नहीं पाता होगा।

यहाँ ऊपर जितनी भी बाते हैं, सब जितनी अमूर्त दिख रही हैं, उनकी वाक्य संरचना बड़े करीने से ऐसे रहने दी है। वहाँ कोई यह नहीं कह रहा कि अब हम सबको कहीं छिप जाना है। हम यहीं हैं। यह कोई डर भी नहीं है। यह बस है। यह बहुत ही सैद्धांतिक बात है के इधर एक ऐसे अधिनायकवाद को हम देख रहे हैं, जो कई स्तरों पर इतिहास की पुनरावृति है। वर्तमान की पुनररचना है। यह नए अर्थों में उसका विस्तार है, जहाँ उन विविध स्वरों के लिए कोई जगह बची नहीं दिखती। तंत्र का ऐसा रूप जहाँ इस राष्ट्र-राज्य के प्राकृतिक संसाधनों पर लोक का अधिकार लगभग शून्य की अवस्था में पहुँच चुका है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि शून्य से निम्न किसी संख्या का आविष्कार हमसे कभी नहीं हो पाया। ऐसी स्थिति में हमने अपने समाज, अपनी संस्कृति को ही उस निम्नतर स्तर में स्थित कर दिया है।

बिलकुल अभी मैंने एक पोस्ट पूरी की पूरी लिखकर ड्राफ़्ट में रख दी हैं। पता नहीं क्यों? शायद उसका कोई मतलब नहीं रह गया। या यह उन मूल्यों से पीछे खिसकने से जादा उन मूल्यों की पहचान को छिपाये रखने की विवशता हो। पता नहीं यह क्या है। हम जिसे प्रतिरोध कहते हैं, उसका संगठित होना क्यों ज़रूरी है? फ़िर इधर इस भाव, विचार, स्थिति, अवस्था के लोप को भारतीय संदर्भों में किन अर्थों के साथ लिया जाना चाहिए? इसके अवसर इधर जितनी तेज़ी से हमारे समय सामने आ रहे हैं, उतना ही बड़ा संकट हमारे समाज के सामने विकराल रूप ले रहा है। यह बात उतनी ही समझ में नहीं आने वाली, जितना हम उन आग्रहों-दुराग्रहों को अपनी आँखों के सामने देखते हुए भी नज़रअंदाज़ करने के अभ्यासी हो चुके हैं। हमने एक समानान्तर एवज़ी व्यवस्था को इन परिदृश्यों में इस तरह पैठ जमाने का अवसर दे दिया है; जो हमारी रुचियों, मतों, मतांतरों को पदस्खलित कर खुद उसकी ठेकेदारी में संलग्न कर लिया है।

यह बिलकुल विरोधाभासी बात है कि वह एकतरफ़ अपने समाज की बहुलता, विविधता को पूरी दुनिया में डुगडुगी की तरह पीटते हैं, वहीं दूसरी तरफ़ ऐसे किसी भी प्रति विचार को सहने, उससे परिचित होने, अपने अंदर घुलने देने के किसी भी मौके को बनने नहीं देना चाहते। यह उनके अंदर निर्मित हुआ द्वंद्व है, जिसे वह मुखौटे की तरह इस्तेमाल करते हैं। ख़तरा इन्ही से है। यह व्यक्ति, विचार, संस्था, समूह, संगठन किसी भी रूप में परिवर्तित होकर उन दूसरे, तीसरे, चौथे तरह की निर्मितियों को या तो नष्ट कर देना चाहते हैं। या अपने जैसा बना देना चाहते हैं। इसके अलावे कोई और विकल्प या अवसर वह उन्हे नहीं देना चाहते। यह वही हैं जिनकी याददाश्त पता नहीं कितने पुराने ऐतिहासिक तथ्यों तक जाती हैं, जो किताबों को लुगदियों में बदल देते हैं, किसी चित्रकार को देश से निकल जाने के लिए विवश कर देते हैं, मुफ़्त में देश से निकल जाने के लिए टिकट बाँटते हैं, फ़िल्मों के पोस्टर फाड़ते, पुतले जलाते हैं।

दूसरी तरफ़ शार्ली एब्दो से लेकर हर उस मौके पर मुखौटा ओढ़कर सामने आते हैं और अपने द्वारा आयोजित साहित्य उत्सवों में प्रति विचारों के प्रयोक्ताओं के दाँतों, नाखूनों, औजारों के पैनेपन को कम करने में संलग्न रहते हैं। अब यही मुखौटा उन सब लोगों को पहन लेने का वक़्त आ गया है, जो बचे रहना चाहते हैं। जिसके पीछे की पहचान आवाज़, रंग सबकुछ छिप जाये। यह डर नहीं है, कहीं पिछले दरवाज़े से भाग जाना नहीं है। ख़ुद को बचाए रखने की जद्दोजहद है। इस संक्रमण काल में बचे रहने की लड़ाई है। इसे शायद हम इसी तरह से शुरू कर सकते हैं। इसलिए इस शहर में जो अराजक है, और जो जंगल की तरफ़ नहीं जाना चाहते, यहीं इस संक्रामक शहर को जंगल की तरफ़ बढ़ने से रोके रहना चाहते हैं, उन्हे यहीं इस तरह यहाँ रुके रहना होगा। यह मुखौटा ही उनकी ढाल और उनका बहाना है।

4 टिप्‍पणियां:

  1. यह बिलकुल विरोधाभासी बात है कि वह एकतरफ़ अपने समाज की बहुलता, विविधता को पूरी दुनिया में डुगडुगी की तरह पीटते हैं, वहीं दूसरी तरफ़ ऐसे किसी भी प्रति विचार को सहने, उससे परिचित होने, अपने अंदर घुलने देने के किसी भी मौके को बनने नहीं देना चाहते।
    बहुत सार्थक और सच।

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    1. इधर प्रकारांतर से यह और विकट स्थितियों की तरफ बढ़ते जा रहे हैं। देखते हैं, आगे क्या होता है।

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