फ़रवरी 17, 2015

चुप घर..

उसने अपने एक कमरे वाले शहर के बाहर कई कमरों वाले शहर की संभावनाओं से कभी इंकार नहीं किया। पर उसे पता था, कोई जितना भी कहे, बाहर का शहर उसके अंदर कभी दाखिल नहीं हो सका। उसने अपने शहर को नाम दिया, घर। घर ही उसकी छोटी-सी दुनिया थी। वह बाहर कहीं भी रहता, वापस इस दुनिया में लौट आने के लिए बेचैन होने लगता। उसकी पत्नी चूल्हे पर पतीली रखकर रोज़ भूल नहीं जाती। बस यह उसकी इधर की सबसे नयी आदत बन गयी। पिता अख़बार में बगुले की तरह सिर घोंटे रहते। माँ घुटनों के दर्द में अपने पुराने दिन याद किए रहती। भाई उसकी तरह ही मास्टरी करता था, पर छुट्टी नहीं करता। उधर छुटकी जाती हुई ठण्ड में बाहर कुर्सी लगाकर, गणित के सवालों से भिड़ रही होती।

सब एकसाथ कभी बाहर नहीं निकलते। बारी-बारी निकलते थे। बाहर निकलना वापस आने के लिए ही होता। कहीं कोई एकरात रुक जाने की मज़बूरी में भी आख़िरी गाड़ी से लौट आना चाहता। किसी को भी अगर रहना पड़ता तो सब एकही बात कहते। इसबार नहीं अगली बार सब आएंगे, तबरात क्या पूरे हफ़्ते रुक जाएँगे। इस तरह वह छहों हमेशा एकसाथ एकदुनिया में रहना चाहते। भले घर में सिर्फ़ एक कमरा था, पर लौटना किसी ठंडी दोपहर बैंगन के भरते में पड़े अदरक की तरह, उनकी जीभ और दाँत के बीच पड़ गयी किसी सुखद अनुभूति से कम न था। उस फूले की हँडिया में चुरती खिचड़ी के साथ उबलते टमाटरों की तरह होते। उनका हरदिन उरद भात बरिया खाने की खुशी से भरा होता। आम के गलके की मिठास लिए होता। गुड़ से भी जादा। बताशों से भी मीठे।

सब बारीबारी घर से बाहर निकलते और बलब की रौशनी में अपने चुप घर को देखते। जो बाहर नहीं निकलते वह घर के अंदर से ही देखते रहते। उनके घर में इस रौशनी के अलावे और कोई उजाला नहीं होता। बाहर छज्जे पर लगे बल्ब में बिजली नहीं थी। बिजली सिर्फ़ उनके घर में नहीं पूरे मोहल्ले में नहीं था। इसलिए हरशाम ढबरी के धुएँ से घर ढक जाता। वह दूर से इस धुएँ के ढकने को देख समझ जाता शाम हो गयी और वह वापस घर लौट पड़ता। एक शाम उसकी साइकिल पंचर हो गयी। थोड़ी देर वहीं दूर पेड़ के नीचे इंतज़ार करतेकरते वह थक गया। अचानक उसने देखा इसबार धुएँ के बादलों ने घर को ढक लिया। वह समझ गया। घर में ढबरी नहीं जली है। 

कहते हैं, उस शाम के बाद वहाँ कभी कोई वापस नहीं लौटा। तब से वह घर, चुप घर है।

{चुप घर की पिछली किश्त }

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