फ़रवरी 18, 2015

एक छोटी-सी झोपड़ी थी

वह एक छोटीसी झोपड़ी थी। उन सबने मिलकर उसका नाम झोपड़ी ही रखा था। शहर और सड़क कही जाने वाली संरचनाओं से बहुत दूर। हमारी परछाईं से भी बहुत दूर। कहीं दिखाई न देने वाली जगह के पास। वहाँ तक जाने वाले रास्ते को वह कितना भी याद करतीं, वह कभी याद नहीं रहता। यह भूल जाने के बाद याद आती याद की तरह था। अपने भीतर झाँकने के बाद दिखाई देती रौशनी की तरह। ख़ूब झाड़ी झंखाड़ थे। घास घास न रहकर नुकीले काँटों में तब्दील हो गयी। मिट्टी का मुलायमपना पानी के न रहने पर उसे और खुरदरा बनाता गया। गेंहुआ किराट साँप केंचुए बन गए, अजगर बिच्छू में बदल गए, मिट्टी इतनी भुरभुरी हो गयी के दलदल बनती गयी। उसमें तारकोल की गंध नहीं थी, पर एड़ी बिलकुल वैसे ही फट जाती। नसों में ख़ून वहाँ की हवाओं में सूख गए पानी की तरह सूख गया। इसलिए किसी के भी लिए फटी बिवाइयों के दर्द महसूस करने की किसी भी संभावना के लिए कोई जगह नहीं थी। फटी एड़ियों के लिए कोई दर्द वहाँ मौजूद नहीं था। सच में वहाँ ऐसी कोई भाषा भी नहीं थी, जिसमें वह अपनी बात कह सकें। यह अबोलपन चुप रहना नहीं, चुप रह अपनी साँसें सुनते जाना था। 

सब उस रास्ते पर चुप धीर शांत होकर अपना रास्ता पूरा करते चलती जातीं। कतार में। कतार से बाहर। साथ में। साथ से बाहर। किसी को एकबार छूकर देखने, पास आकर महसूसने का भी वक़्त नहीं था। वहाँ पहुँचने वाली सभी औरतों के पेट अगले कुछ घंटों में अपना-अपना बच्चा लिए आहिस्ते सेपच लहरय निकल पड़ती। सब सदियों से सुनती आ रही थीं, उस सूरज की पहली किरण के साथ पैदा हुआ बच्चा अपनी ज़िन्दगी में कभी बीमारी नहीं होगा। उनके ससुर, उनके पिता, उनके पति, उनके भाई सब यहीं पैदा हुए। आजतक कोई नहीं समझ पाया, वहाँ होने वाले बच्चे हमेशा लड़के ही क्यों होते? यह जानने की कोशिश सब करते, पर जान कोई नहीं पाता। जो जानने के लिए जाते, वह कभी लौट नहीं पाते। जानना उनके लिए ज़रूरी भी नहीं था। ज़रूरी था जच्चा-बच्चा का वापस लौट आना।

उस महादेश में थकी हुई औरतें ही एकदूसरे का सहारा होतीं। उनके साथ आए सब लोग इस जगह से कोसों दूर एक झोपड़ी के इर्दगिर्द डेरा डाले, सिवाए इंतेज़ार के कुछ नहीं करते। वहाँ सूरज कभी नहीं ढलता। जहाँ उनकी यह सब औरतें जा रहीं थी, वहाँ सूरज कभी नहीं उगता। सब बदहवास से, पसीने से तरबतर होते रहते। दर्द सीने के नीचे उतर पेट से होते हुए गुज़र जाता। सब एकसाथ उस पीड़ा से गुजरते। कोई किसी से कुछ नहीं कहता। बस आँखों में लौट आने का संतोष दिखता। वह कहने को होतीं। पर दर्द के मारे खड़ी नहीं हो पातीं। सब अचानक दीमक लगे पेड़ की तरह भरभरा कर ढह जातीं। उनके निढाल पीले मुरझाए चेहरों पर गुलाबी पसीने की बूँदें फूलों की ख़ुशबू लिए होते। अब सब यहाँ से ज़िंदा लौटने के लिए वापस तय्यार होने लगते। सब एकबार फ़िर उस सूख गए तालाब की मिट्टी से अपना सिर भिगोते हुए ख़ूब रोते। रो रोकर बेहाल हो जाते। यहाँ से कोई जिंदा पैदा लड़की वापस नहीं ले जा पाता। वह माँस के लोथड़ों को वहीं गाढ़ देते।

सब अपनी दुनिया के ख़त्म होने की कहानी जानकर रोते। उन्हे पता चल गया, उनकी दुनिया अब नहीं बचेगी। इसलिए बारबार रोते। रोना ही उनकी भाषा का पहला और आख़िरी शब्द था। वहाँ से जिंदा लौटकर वह अपनी कहानी बता रहा है। लौटकर रेत में मिले खून की गंध हम तक ला सके। कह सके थोड़ी देर में हाँफने के बाद उनकी आँखों में छा गए सच की बात। वह ज़िंदा भी शायद इसलिए रहा। के लौट सके।

3 टिप्‍पणियां:

  1. रोना ही उनकी भाषा का पहला और आख़िरी शब्द था।

    बहुत खूब!

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    1. इसमें पहले मैं थोड़ा और लिखना चाहता था, पर लगा जितना भी उन दिनों अंदर था सब इसमें उतर गया; इसलिए चुप हो गया। चुप होना भी कभी-कभी ज़रूरी होता है। इधर ऐसे ही कम लिखना हो पा रहा है।

      ख़ुद नहीं समझ पा रहा, 'चुप घर' के बाद यह कैसे बन पड़ी। अभी भी समझ रहा हूँ।

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