फ़रवरी 11, 2015

उस रात की सुबह नहीं

ऐसी रात फ़िर कभी न आए। पूरी रात मम्मी के बाएँ पैर में दर्द इतना असहनीय बना रहा कि एक पल के लिए भी कहीं सुकून नहीं मिला। पैर फैला लेना तो दूर की बात है। रह रहकर उस अँधेरे कमरे में रोने को हो आता। कि मम्मी का पैर सवा नौ बजे के बाद ऐसा होता रहा। ग्यारह बजे बिजली की तरह कमरे में आया और घर की चाभी लेकर निकल गया। कुछ उन्होने कहा भी होगा तो पंखे की आवाज़ उसे खा गयी होगी। होते-होते रात के बारह बज रहे थे। इंतज़ार की भी हद है। मैं बगल में नहीं था। मम्मी बार-बार देखती होंगी दरवाज़े की तरफ़। पर घंटे भर बाद भी नहीं लौटा। दरवाज़ा बंद करने से पहले भी एकबार नाम सुनाई दिया तो लगा, कान बज रहे हैं। थोड़ी देर बाद फ़िर मम्मी ने तेज़ से कहा। छुटकी बोली- क्या हुआ मम्मी? इतने में नीचे से घबराता में ऊपर भागा आया।

पहली बार उनके बगल में लेटने का मतलब समझ आया। जबकि मुझे वहीं होना था, पर नही हो पाया। नीचे लैपटॉप पर चिपका मकड़ी के जाले बुन रहा था। हम लोग एक पल के लिए भी चैन से नहीं बैठे हैं। ऐसा क्या कर दें कि दर्द कम हो जाये। कितनी बार नीचे गया। कभी केसरी मलहम लाया, कभी उस लाल झोले से अजूबी टैबलेट। वापस पापा के कहने पर पटरे पर रखी अँग्रेजी दवाई लाया। दोबार ऑफिस के फ्रिज़ से दूध लाया। एक बार फ़िर उस गरम सिकाई वाले पाउच को लाया। पर किसी से भी राहत नहीं मिली।

मम्मी कहतीं घुटना नहीं मुड़ रहा है। अंदर टिप-टिप हो रहा है। हम बस बोलते ठीक हो जाएगा। पर नहीं। पहले भाई को जगाया। उसने पैर दबाना शुरू किया। फ़िर करीब पौने एक बजे पापा को भी मम्मी ने बुला लाने को कहा। पापा भी वहीं छुटकी वाले दीवान पर पलाथी मारकर बैठ गए। हम सब मूकदर्शक बने उस पीड़ा को अपने अंदर महसूस कर लेने की कोशिश करते रहे। कितने सालों से मम्मी अकेले ही इस दर्द को सहते जा रही हैं। यह पहली रात है, जब हमसब उसे छू पाये। कितनी विकट कातर-सी आँखों से बारी-बारी मम्मी हम सबकी देखतीं। शायद ऐसा करने से भी दर्द कुछ कम हो जाता होगा। भाई लगातार मालिश करता रहा। पर पैर दर्द कर रहा था। सारी तरकीबें, इलाजों का हासिल कुछ नहीं। इससे जादा क्या कर सकते थे हम सब? पैर भी भाई इधर-उधर कर रहा था। इतना दर्द था।

हम सबका कमरे से भाग लेने का मन रहा होगा। भाई सबसे पास था। कभी उसकी आँखों से पढ़ने की कोशिश करता। हम सब कितने असहाय हो जाते हैं, इन क्षणों में। जो कर रहे हैं, उससे कुछ फ़ायदा क्यों नहीं हो रहा? यह टूटना बिखरना सतह पर नहीं, कहीं दिल की गहराई में काफ़ी नीचे घटता रहता है। पापा मम्मी के लिए क्या कर सकते हैं? कुछ नहीं। यही सोच रहे होंगे। एक दस पर खाई दवाई अपना असर नहीं दिखा पायी थी। अभी बुधवार डॉ. सुजाता से मिल आना। दवाई बदल देंगी। तब और जल्दी असर होगा। मैं बच्चों की तरह कहता रहा, सब ठीक हो जाएगा। मम्मी भी बस देखती रहीं। बीच-बीच में पापा कभी दही तो कभी काले रंग वाले कैम्पा को दोबार पीने को इस दर्द का कारण बताते। भाई कुछ भी नहीं कह पाता। बस वहीं चुपचाप बैठा रहा। देखता रहा। 

हम सब मिलकर उस कारण पर पहुँचना चाहते थे, जहां से यह दर्द चलने नहीं दे रहा था। मम्मी के सामने तब छोटी हो गयी तार को पार करना कितना अश्लील लगने लगा। यह कितना अमानवीय है। हम जो अपने हाथ पैर इतनी सहजता से हिला डुला पा रहे हैं, वह दिखता भले कितना आसान हो, पर हमारे सामने बैठी माँ उतनी गतिविधि करने में भी असमर्थ थीं। पूरी रात पता नहीं किन किन यादों में डूब गई होंगी। हमने किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा। हमारे साथ यह क्यों हो रहा है? एकबार बोलीं, जब पूरे शरीर में दर्द फैल गया, तबतो हम डॉक्टर के पास गए। इतनी जल्दी फ़ायदा कहाँ से होगा। नानी भी कितनी याद आई होंगी मम्मी को। और भी पता नहीं कितनी सारी बातें घटाटोप की तरह अंदर ही उमड़ती-घुमड़ती रही होंगी। कहने का मन होगा पर कहने से और जादा दर्द होगा। 

बस रात से इस शाम की तरफ़ आते हुए हुआ इतना है कि बगल वाले कमरे में बीच-बीच में मम्मी की आँख लग जाती है। पूरा दिन लेटी रही हैं। अभी भी घुटना मुड़ नहीं रहा है। करवट हो जाती थीं पहले, अब रात से वह भी नहीं हो पा रहीं। बस लगता है दवाई का थोड़ा असर है। दर्द रात से कम है। छुटकी को जब अभी तीन बजे नीचे से भेजा तो अख़बार लेकर आई। मुँह पर अख़बार चढ़ाये सारा वक़्त पढ़ती रही। मम्मी का दर्द नहीं देख पाती। उसे भी दर्द होता है। रात में थोड़ी थोड़ी देर के लिए जागती, फ़िर जलती लाइट में सोने की कोशिश करने लगती। पापा नीचे वहीं लेटे हैं। छुटकी के बगल। सारी जगह उसने ले रखी है। पापा फ़र्श पर हैं। वह दरी पर। भाई यहीं रात की नींद पूरी कर रहा है। चार बजे लगभग लेटा है। फ़िर वहीं कुर्सी पर भी ऊँघ रहा था। बस यह कमरा रात के इस कमरे की तरह अस्पताल का जनरल वार्ड लग रहा है। हम सब बीमार हो गए हैं। अंदर से खाली-खाली। उदास। अनमने। कोहनी में सिर छिपाये। 

(डायरी में बीते साल; चार अगस्त, शाम साढ़े पाँच बजे।)

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