मार्च 10, 2015

दोनों की दुनिया में हमारे क़दम

दोनों अगल-बगल बैठे अपनी दुनिया में पहुँच गए। ऐसी दुनिया, जहाँ सब वहीं होते हुए कहीं छुप गए। हम भी छुपने की तरह दिखते रहे। दोनों का प्यार भी छुपने की तरह दिखता रहा। चाहते हुए भी कह न पाने की कसक के बाद, अकेले होने की टीस से उपजी गाँठ की तरह। उस सेमर के पेड़ पर लगे लाल फ़ूल की तरह। दोनों एकदूसरे में न दिखते हुए डूबते रहे। यह डूबना इश्क़ के दरिया में डूबने के बाद डूबने की तरह था।

उधर हम अपनी पुरानी ज़िरह में खोते रहे। छूने न छूने के द्वंद्व के बाद बनी बातों से लेकर उन प्रेमकथाओं से निकली परियों की दुनिया तक। हमसब उन्हे पता नहीं कितनी सदियों से सुनते आते रहे। प्रेमिका का पत्नी बन जाना उस प्रेम की सबसे बड़ी हार है। वह प्यार जो ताकत बनता, बोझ बनने लगता। हमारे अंदर इसकी जितनी भी पुरुषसत्तात्मक व्याख्या निकलती रहीं, पर वह इसी बिन्दु पर टिका रहा। 'वह' मतलब कोई नहीं।

लड़का किसी बहुत बड़ी लड़ाई के बाद जीत गए ग्लैडीयेटर  की तरह उभरकर आया। उसे लगने लगा उसकी ज़िन्दगी के सबसे निर्णायक मोड़ पर अगर 'वह' नहीं होती, तो 'वह' आज कितना अकेला होता। यह सोचते हुए उसकी कोहनी बिलकुल नहीं मुड़ी, न उँगली कलाई मुड़ने के बाद सोचने की मुद्रा में आई। बस उसका चेहरा सूरज की तरह दीप्तिमान होता रहा। उसकी परछाईं में हम हमारी छाया में ख़ुद को ढूँढ़ते रहे। इसतरह सब एकबार फ़िर गायब हो गए। गायब होना, लौट आने से पहले छिप जाने की तरह होता गया।

गायब होकर लौटने के बाद कोई उससे कोई सवाल नहीं करता। वह भी किसी को कोई जवाब नहीं देता। हम सब भी बैहरे होकर उसकी तरह गूँगे हो गए। पर इसबार वहीं सामने थे। सब इसबार लौटकर एकदूसरे के सामने गायब नहीं हुए। यह सपनीली दुनिया का एकदम सामने आ जाना रहा। उस दरवाज़े के पार की दुनिया में हमसब बदल जाने वाले थे। ऐसा हम सब सोच रहे थे। पर कह नहीं रहे थे। क्योंकि हम सब गूँगे थे। हम बोलते नहीं, बस गुनते रहे। अपने अंदर से बाहर जाने से पहले, रचने तक उसमें ख़ुद को सोखते रहे।

वह सोचता रहा काश वह इतने आगे पहुँच कर भी हार जाये। उसे लगता कहीं पहुँच जाने के बाद हम उन दिनों की याद में कभी नहीं लौटते। लौटना, पीछे मुड़ थोड़ी देर वहीं ठहर जाने की तरह इंतज़ार में बेक़रार होते रहने जैसे होता। हम कभी कल बीत गए क्षणों में नहीं जाते। हम झाँककर देखते भी नहीं। उसे पता है, वह भी नहीं देखेंगे। कभी नहीं देखेंगे। इसलिए वह चाहता रहा वह दोनों हार जाएँ।

{इस लगाई तस्वीर में चमकती आँखें मेरी भी हैं। कहीं से भी यह नहीं लग रहा लौटकर ऐसी कोई चिट्ठी लिखने वाला हूँ। पर इसके आगे भी बहुत है और उससे भी जादा पीछा बचा रह गया है। उसने हमेशा रोके रखा। पीछे देखा तो पिछली मर्तबा चार साल पहले की पोस्ट दिखी। उसने कहा है, इसलिए भी कोई हवाला नहीं दे रहा। बस लिख दिया है। आगे के दिनों के लिए। कि कभी किसी दिन हम यह सोच रहे थे। इसलिए इसकी सत्यता जाँचने के लिए कोई आयोग बिठाना बेकार है। बस मेरा मन है, याद है, उसे पढ़ने की एक तरकीब है। }

1 टिप्पणी:

  1. आपका blog अच्छा है। मै भी Social Work करती हूं।
    अनार शब्द सुनते ही एक कहावत स्मरण हो आता है-‘एक अनार, सौ बीमार।' चौंकिए मत, अनार बीमारियों का घर नहीं है, बल्कि यह तो हमारे शरीर के लिए काफी फायदेमंद होता है। इससे उपचार और अन्य आयुर्वेदा के टीप्स पढ़ने के लिए यहां पर Click करें और पसंद आये तो इसे जरूर Share करें ताकि अधिक से अधिक लोग इसका फायदा उठा सकें। अनार से उपचार

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