मार्च 20, 2015

कभी-कभी दिल में

उधर कोने वाली बरसाती में वह अचानक आकर छिप जाता। वहाँ अँधेरा इस कदर काला रहता के उसमें सिवाए साँसों के किसी भी चीज़ का कोई एहसास नहीं रह जाता। रह जाना कुछ छूट जाना था, उसकी यादें छूट रही थीं। ख़ुद वह कहीं पीछे किसी लाल छतरी वाली सपनीली दोस्त की परछाईं में गुमसुम-सा रह गया। आँखें लाल सुनहरी, दाँत थोड़े बाहर निकले बेतरतीब से। उसे उसकी कही बात बार-बार याद आती। कुछ टूटने से ही कुछ नया बनता है। उनके बीच यही कुछ था, जो टूट नहीं रहा था। यह कुछ टूटा नहीं फ़िर टूटकर कुछ नया बना नहीं।

बात यहाँ आकर टूट गयी। और उसका बिखरना शुरू हो गया। या कहें उसने चुप रहने के बाद इस तरह उस चुप्पी को अपने अंदर घर करने दिया। उसने चाहा के एकसाथ उसके सुनने और बोलने की ताकत एकदम से गायब हो जाये। अपने गले के पास हलक में रच रहे थूक को निगलने की हरकत भी किसी से न कह पाये। इस तरह यह क्रिया उसके भीतर ही घटित होकर उसके अंदर रह जाने की हद तक वह समेटना चाहता रहा। पर उसके चाहने से क्या होता?

वह एक दिन सपने में ऐसे ही अकेला रह गया।उसे तबसे नींद नहीं आई। करवट-करवट उसे तस्वीर नज़र आती। तबसे वह कुछ भी कहीं नहीं लिखता। बस मेरे कान के बस आकर कुछ-कुछ कहता रहा। जो मैं सुनता रहा उनमें से भी बहुत कम समझ में आता। बाकी उसके लिए फ़िर बचाकर रख लिया। कि कभी फ़िर नहीं कहूँगा। वह पागल नहीं है, वह हमारे जैसा ही है। बस हम उससे थोड़े अलग से हैं।

{सोलह मार्च, लगभग सवा चार बजे। इसतरह कभी-कभी उसके दिल में भी ख़याल आता, और चुपके से वह कह जाता }

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