मार्च 22, 2015

ख़त, सपने और हम

मेरे बगल मेज़ पर दो कागज़ के टुकड़े रखे हुए हैं और मन में कई सारे ख़त। मन इस मौसम में कहीं खोया-खोया सा कहीं गुम हो गया। धूप इतनी नहीं है, पर आँखें जादा दूर तक नहीं देख पा रहीं। उनके नीचे काले घेरे किसी बात पर अरझे रहने के बाद की याद की तरह वहीं रुके रह गए। रातें हैं, पर नींदें नहीं हैं। कुछ गला भी ख़ुश्क होकर बैठ जाता, पर नहीं बैठा। उसमें कई सारी अनकहे अनछुए एहसास भरे रह गए। कुछ भी करने का मन नहीं होता। बस खोये-खोये से गुमसुम उन पेड़ों के झरते पत्तों में अपने सपनों को खोते रहने जैसे भाव से भर गया। अभी भी हरसाल इन दिनों गायब हो गयी डालियों में मन कहीं रह गया। बात कुछ भी न हो तब भी खाली कमरे में बैठे रहने, वहीं रचते जाने की ज़िद से ऊबकर भी कुर्सी से हिल नहीं पाता।

पुराने दिनों को याद करता हूँ, तो लगता है, कहीं वही फ़िर लौट आए हैं। खाली-खाली। अकेले। बेमन से। अजीब तरह की खामोशी गुस्से में बदलकर मुझे चारों तरफ़ से घेरे रहती है। कहीं भी कुछ भी कह जाने की वजह से कभी मन करता है, कभी एकसाथ न बोल पाऊँ न सुन पाऊँ। इसतरह से उखड़ा-उखड़ा रहने लगा हूँ के इस इच्छा में कुछ भी अजीब नहीं लगता। मन करता है, लिखते-लिखते सच में ऐसा हो जाये। बहुत सारे ख़याल एकसाथ ऊपर नीचे होकर रह जाते हैं। पर जब उन्हे कभी कह ही नहीं सकता, उन्हे हमेशा अंदर ही रहना है, तब यही सबसे ठीक रहेगा कि सब एकबार चला जाये। सब छूट जाये। भले उसके बाद कहीं भाग जाऊँ। पर..पता नहीं क्या?

कोई भी ऐसा एहसास मेरे अंदर नहीं रह गया, जिसे बाँट सकूँ। क्योंकि मुझे पता है, जब तक यह मेरे अंदर हैं, उनकी कशिश, उनके भाव मुझे ऐसे ही परेशान करते रहेंगे। पर, एकबार, जब यह सब बाहर निकल जाएँगे, तब किन बातों से उन खाली जगहों को भरूँगा? वह सब मेरी डायरी में क़ैद हैं। जिसमें लिखने का मन स्याही ढूँढ़ने के दरमियान कितनी ही बार मरता रहता। हरबार मेरे अंदर की खिड़कियाँ ऐसे ही बंद होकर परेशान करती रहतीं। उन्हे हरबार याद करने में हफ़्तों बीत जाते कि उन्हे खोलने वाली सिटकनी कहाँ गुम हो गई? जब याद आती हैं, तब उन कुंडियों को खोलने के तरीके भूल जाती। ऐसे ही न जाने कितने ख़याल मेरे परछाईं के साथ इन दिनों साथ चल रहे हैं। अँधेरे में भी वह ताकत ख़त्म हो गयी है कि वह ऐसा होने से उन्हे रोक सके। बिलकुल मेरी तरह। वह भी चुप है। गुम है।

सच इधर मेरा मन बहुत सारे ख़त एकसाथ लिखने को कर रहा है। पर पता नहीं वह किन्हे लिखे जाने हैं? मेरे पास शायद इतने पते भी न हों, जिनतक अपनी बातें पहुँचाने का मन होता रहता है। पर यह एकदम ऐसा ही है। मैं शायद दुनिया के हर उस शक्स को चिट्ठी लिखना चाहता हूँ, जिसके ख़्वाब उसके साथ ही धीरे धीरे मरते रहते हैं। उसे पता है उसकी पलक के नीचे पिछली रात कोई सपना अधूरा ही रह गया, पर वह भी मेरी तरह कुछ नहीं कर पाया होगा। उन सबका चले जाना अंदर तक खाली होते जाने जैसा है। यह आत्महंता हो जाने से पहले का विचार भी हो सकता है पर ऐसा सपना उसने कभी नहीं देखा होगा। वह किसी दूर देस का रहने वाला कभी उन तक साबुत पहुँच भी नहीं पाया होगा। तब मेरी क्या बिसात? मैं कौन-सा बहुत चाक-चौबन्द तहखाने में अपने ख़्वाबों को इकट्ठा किए जा रहा था। उन्हे ऐसे ही धीरे-धीरे चकनाचूर होते रहना था। मेरे साथ ही उन्हे ख़त्म होना था। दीमक ने उन्हे ऐसे ही कुतर दिया। मेरे अंदर।

मुझे यह भी पता है, इन पंक्तियों को पढ़कर किसी को भी किसी तरह की ताकत नहीं मिलने वाली। कोई कमज़ोर दिलका मेरी तरह होगा, वह अवसाद में भी जा सकता है। जो न कुछ कहने की हालात में होगा और न समझने की। वह बाद मज़बूर-सा, अपनी सपनीली आँखों के सामने उनका पंचनामा होता देखकर रो पड़ेगा। आज उस ऊपर वाले कमरे को बहुत याद कर रहा हूँ, जहाँ इन सपनों को बचाए रखने के लिए छिप जाता। कुछ देर अँधेरे में बैठकर रो लेता। थोड़ा सुकून मिलता के चलो कुछ नहीं कर सकने के बावज़ूद एक काम तो कर लिया। अब वह बच जाएँगे। पर नहीं। यह सब अपने आप को धोखा देने वाली तरकीबें थीं, जिनके चुक जाने पर अब ख़त लिखने वाली तरक़ीब पर आकर ठहर गया हूँ। मुझे यह भी पता है, वह सब ख़त मैं ख़ुद को अपने पते पर ही लिखूँगा।

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