मार्च 21, 2015

खिड़की वाले पेड़..

धूप-छाव सामने खिड़की से लगे शीशे के पार लगातार आँख-मिचौली खेलते दिखते रहे। उनका दिखना आँखों से नहीं रौशनी से है, जो बादलों को चीरकर अंदर तक दाखिल होती जाती। दुनिया उन लकड़ी के कब्जों  से बहुत दूर भी रही होगी, जो इस वक़्त दीवार से कहीं भागे जाने को नहीं दिख रहे। वह धुँधली खिड़की से बाहर कुछ जादा देख नहीं पाता होगा, ऐसा भी नहीं रहा होगा।

उसे कमरे के बाहर नहीं अंदर की पड़ी बेतरतीब मेज़ की करीने से रखी चीज़ों का ख़याल आता। वह किसी को भी छेड़ नहीं रहा। बस उठाता, देखता, वापस रख देता। यह चौकोर-सी लकड़ी कभी किसी पेड़ का हिस्सा रही होगी। जो दुनिया उस खिड़की के बाहर रही रही होगी। वह भी कभी वहीं का रहा होगा। यह किसी भी तरह लकड़ी, उसकी छुअन से उपजा संताप नहीं था। बस उसका मन ही कुछ ऐसा हुआ होगा। इधर वह ऐसे ही होता रहा। लगातार कई रातों, कई सुबहों तक। 

वह हरबार इसी तरह डूब जाता। जैसे सामने कोई सपना निकलकर चलने लगा हो। हूबहू उसके दिल से फेफड़ों की ओर जाती खून की बूँद रहकर पूछने लगती हो जैसे। जैसे खून कटे होंठ से निकलकर जीभ पर लग जाने तक। उसके रोएँ सो गए हों। अब उसके गालों पर अब कोई बात नहीं बची रहती। उसका हाथ मन की तरह बिलकुल खाली होते रहते। वह ऐसे ही बेसबर होता जाता। कुछ कहने से पहले। कुछ कहने के बाद। कुछ कहने से पहले और कुछ कहने के बाद की स्थिति में रुककर, थम जाने वाली दुनिया को वैसे ही देखता रहता। अपलक।

{अट्ठारह मार्च, सुबह दस पचास। कमरे में खिड़की के पास कोई लड़की बैठी है। पर उससे मेरी कोई बात नहीं होती }

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