अप्रैल 06, 2015

पहली अप्रैल का प्यार उर्फ़ मारे गए गुल्फ़ाम

अचानक वापस लौटता हूँ उस सीन पर जहाँ सबकुछ ठहर चुका था। वहाँ थोड़ी देर में आसमान से कोई बर्फ नहीं गिरने वाली थी। न हम दोनों अचानक बाहों में आकर एक दूसरे को भूलने वाले थे। कितना भी चाहता, मेरे कमज़ोर से हाथ तुम्हारी कलाई पकड़े उस बड़े से गेट से बाहर निकल जाने की कोशिश कर लेते पर इसका भी कोई ख़ाका दिमाग में नहीं बन पाता। इस क्षण से कई गुना तेज़ रफ़्तार से मेरे दिल में तुम्हारा चेहरा मेरे साथ डूबता गया। कभी वापस लौटने की बात दिल में सूख गयी मिट्टी की तरह उखड़ने पाती तो एकबार कुछ भी करके वापस लौट आता। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। मैं बस थोड़ी देर वहीं ठिठका खड़ा रहा। तुम भी शायद बड़ी देर से मुझे देख लेने की राह देखते हुए पलकों में उन क्षणों को अपने अंदर महसूस कर रही होगी। मेरी तरह कहीं चुपके से। बिन बताए। 

भले तुम्हारे अंदर ऐसे कोई भी भाव पैदा न हुए हों, पर वह तुमसे मुझतक इसतरफ लगभग हर रोज़ आते रहे। फिर इन बीतते सालों में हम कितने बदल गए कह नहीं सकते? वक़्त ही कितना हुआ है। लगता है, जैसे अभी दूर ही कितने हैं। एक फ़र्लांग होता ही कितना है। पर सब झूठ है। उस दिन की तरह सब झूठ है। हो सकता है वह दिन जिस तरह मेरे अंदर भरा रह गया है, तुम्हारे अंदर उसकी तस्वीर बिलकुल भी वैसी कभी न रही हो। हम दोनों एक ही साथ अलग-अलग तरह के सपनों को बुनते हुए बड़ी दूर चले आए हैं। और इस मर्तबा मैं तुम्हें इसमें शामिल नहीं कर रहा हूँ। क्योंकि मुझे पता है, तुम मेरे घर से कई सौ मील दूर कहीं अजानी जगह पर मेरे ख़यालों से कभी भी भर नहीं पाती होगी। यह बातें भी बिलकुल उसी तरह कहीं से भी सच नहीं हैं जैसे मैं और यहाँ लिखे मेरे बेमतलब से ख़याल।

हम कितनी तरहों से बदल रहे होते हैं, हमें पता भी नहीं चलता। मुझे सबसे पहले तुम्हारी उस बात ने बदला, जहाँ तुम ‘लिव लाइफ क्वीन साइज़ ’ टाँक आई। यह जैसे मेरे दिल को बेधने लगा। मेरे जैसे ‘सबऑल्टर्न’ को ऐसी ही किसी बंद गली में आकर ठहर जाना था(?) पर क्या करता, यह तुम्हारे हिस्से का ‘विमन डिस्कोर्स’ रहा होगा, यही मानकर तुम्हारे साये में कुछ देर बैठने की ज़ुर्रत करने का मन किया होगा। पर तुमसे कभी कहा नहीं। मैं कभी तुमसे कुछ कहता भी कहाँ करता था। मेरे हिस्से कोई भी अख़्तियार नहीं रहा, सिवाय तुम्हें पल भर देखने और तुम्हारी आँखों में डूब जाने के। तुम्हें बिन बताए इन्होने ही उन दिनों को रात होने से बचाए रखा। वैसे यह मेरे हिस्से का सपना ही रहा होगा, जिसमें तुम कुछ देर आकर थोड़ा सा मुस्कुरा जाती। वरना मेरे हिस्से तुम्हारे कोई याद बची भी कैसे रह जाती।

यह बहुत अजीब नहीं है कि मैं आज भी तुम्हें इसतरह याद करता हूँ। शायद तुम मेरे प्यार का राजघाट हो, जहाँ इस तारीख को तो एकबार आना बनता है। यह भी हो सकता उसमें बचे रह गए तत्वों की तलाश में इन गलियों में वापस लौट पड़ता होऊं। कुछ भी हो सकता है। या हो सकता है कोई भी कारण न होकर तुम ही सबसे बड़ा कारण बन जाती होगी। तुम्हारे अंदर भी उन दिनों की किसी भी तरह के एहसास बचे रह गए होंगे। फिर जिसकी सबसे जादा संभावना है, मैं इन सीमाओं को उस हद तक लाकर तोड़ देना चाहता होऊंगा, जहाँ मेरी छवि तुम्हारे अंदर इतनी धूमिल हो जाये जहां मेरी कोई भी याद बची न रह जाये। बिलकुल इसी तरह मैं हम-दोनों के बीच इस दिन के किसी भी एहसास को अपने दिल के हर कोने से निकाल बाहर फेंक देना चाहता होऊंगा। या यह सारी बातें हर बात की तरह पूरी तरह सिर्फ़ झूठी हो और कुछ नहीं। हम बस बहाने बनाकर एक पल उन यादों की छाव में बैठे रहने की आदत से मज़बूर होकर यहाँ बार-बार लौटते रहें।  

तुम इसमें ख़ुद को पाकर नाराज़ मत होना। मैं आदत से मज़बूर हूँ। वैसे इसे आना तो पहली अप्रैल को ही था, पर मन थोड़ा दुखी है, इन दिनों। कुछ खास कर पाने की हालत में नहीं दिख रहा। अगर आज दोपहर पूजा की किताब तीन रोज़ इश्क़  न आती तो शायद यह लिख भी न पाता। शायद यह उसे भूल जाने के पहले यहाँ लिख लेने से बाद के दिनों तक की याद की तरह है।

2 टिप्‍पणियां:

  1. कहाँ मालूम चलता है ना इश्क़ कैसे, कहाँ छू जाता है किसको...मगर कैसे तो उसकी खुशबू बची रह जाती है...जाते हुये दुपट्टा खींचती...रुक जाने का मनुहार मनाती...द नंबर यू आर डायलिंग इज नौट इन सर्विस से परे हटाती भी करती जाती उम्मीद...डिलीट नहीं करती उसका इकलौता ठिकाना. मुझे नहीं मालूम कि किताब कैसी लगेगी तुम्हें...सकुचा रही हूँ, पर बताना...अच्छी बुरी जैसी भी लगे.

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    1. बस जो ख़ुशबू की तरह बचा रह गया है, उसे ही बचाने की कोशिश ऐसे ही होती रहनी चाहिए। तुम्हारी किताब शायद ऐसी ही कोशिश का एक छोटा-सा हिस्सा रही होगी.. दिल के टुकड़े की तरह.. हम सब थोड़े ही कह देते हैं, कितना कुछ बचा रह जाता है वहाँ..

      सच में किताब ऐसे ही लगी तुम्हारी.. चोर दरवाज़े के जैसे। अंदर भटकने की तरह। कोई समझे न समझे हम ऐसे ही हैं.. अभी इतना ही अपने अंदर से बाहर कह पाया हूँ..

      बाकी कभी किसी मोड़ पर..मुड़ते चलते बैठते सपने देखते फ़िर कभी..:)

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