अप्रैल 10, 2015

प्यार पर कुछ बातें और थोड़ी बकवास..

पता नहीं क्या लिखने बैठा हूँ। पर बैठ गया हूँ। शायद कुछ और बातें होंगी, जो कभी इस दुमाले से नीचे नहीं उतर पायीं। फ़िर बकवास करने में भी हम खुद को इतना तो मान ही लेते हैं कि किसी को कुछ नहीं समझते। खुद को भी नहीं। वह शादी करने के बाद उस मेहनतकश जानवर के सींग की तरह गायब हो गया। फोन पर बात तो ख़ैर हम सोच भी नहीं रहे। हम दोस्त लोग थोड़े पागल किस्म के थे, जो दो साल पहले उससे लड़की भगाने की बात करते और कोर्ट में गवाही देकर उसमें कुछ हवा भरते। पर वह हमसे जादा समझदार निकला। लड़की ने कहा, शादी होगी तो परिवार की मर्ज़ी से। उसके परिवार की मर्ज़ी से। इसतरह हमसब एकबार फ़िर ‘साइड-लाइन’ हो गए। उसने हमें उतना ही बताया, जितना उसके मन में रहा होगा।

वह मार्च के दूसरे इतवार  हम सबके बीच से निकल एक लंबी छलाँग मारकर हमारी आँखों के सामने ओझल हो गया। जो कई साल पहले ऐसी कूद में पहले नंबर पर था, उसे बताने की जहमत भी इसने नहीं उठाई। ‘कंपीटीशन’ में एकतरफ़ा मुक़ाबला रहे, शायद इसलिए। वह  इतने ‘शॉर्ट-नोटिस’ पर कौन-सा छिंदवाड़ा से आ पाता(?) पर बताना तो बनता था। वह इस अर्थ में भी हमसे आगे निकल गया कि हम प्यार थोड़ा बचकर करने में विश्वास करते रहे। उसे एक असफ़ल कोशिश की तरह लेते रहे। पर कभी उससे आगे नहीं बढ़ पाये। जहाँ हमारी ‘थियरी’ से कोई जवाब देते नहीं बना और वह फ़ेल हो गयी, वहाँ से उसके डैने खुलने शुरू हुए। अपने दिन आँखों के सामने आज भी झिलमिलाते रहे  हैं। मैं धीरे-धीरे ऐसी जगह पहुँच रहा था, जहाँ मुझे आकर रुक जाना था। पर यहाँ यह बात ध्यान रहे, यह सिद्धान्त मेरे सामने उस समय भी इसी रूप में साफ़-साफ़ नज़र आ रहे थे, ऐसा कोई भी दावा करना शेख़ी बघारने जैसा होगा। इसलिए चुप हूँ। आज जब उसके कई महीन रेशे मेरे अंदर धँसे दिख जाते हैं, तब लगता है, हम प्यार नहीं, उस पर किताब लिखने की तय्यारी कर रहे थे जैसे।

एक कमरे का घर, सपने, उसका दिल्ली में बीता बचपन, माता-पिता की मर्ज़ी, हम दोनों का किसी भी नौकरी में न होना। आज यह सब बातें एक ‘असफ़ल प्रेम का समाजशास्त्र’ बुनने में मेरी मदद करते ‘टेक्स्ट’ लगते हैं। ऐसा पाठ जिसमें मैं सन् अस्सी के बंद अर्थव्यवस्था वाले भारत का एक बेरोज़गार युवक अपनी ज़िंदगी के कई फ़ैसले इसलिए भी नहीं ले पाता कि मुझे मध्यवर्ग की जटिलताओं की इतनी समझ है कि एक झटके से पीछे की तरफ़ मुड़ जाता हूँ। वह मध्यम वर्गीय परिवार जो पूर्वोतर यूपी के छोटे  से गाँव से यहाँ दिल्ली में तीस सालों से रचा बसा है, उसके अंतर्विरोध मुझे साफ़ नज़र आने लगे। क्या वह अपनी जाति इतनी सहजता से तोड़ेगा? वह लड़की कैसे इस एक कमरे वाले हमारे घर में व्यवस्थित हो पाएगी? मेरी माँ से उसकी कैसी पटरी बैठेगी? उसके सपने इन चारदीवारों के बीच साँस ले पाएंगे? उसे खाना तो बनाना आता होगा न..? चाय बना लेती हूँ से काम नहीं चलने वाला। अगर घर वाले नहीं माने तब? उसकी तरफ़ से कुछ अड़चन आई तब क्या हम भी कहीं भाग जाएँगे। पर जाएँगे कहाँ? इस एक कमरे वाले घर में अचानक सब कैसे आश्चर्यचकित रह जाएँगे। पर मैं इन सबका सामना किए बगैर किसी कहानी के प्लॉट का समान जुटाने में लगा रहा। बेवकूफ़ कहीं का..!!

जिन सवालों के अनसुलझे जवाबों से मैं आज तक नहीं निकल पाया वह अभी भी मुझे घेरे हुए हैं। उनकी भाषा और प्रकृति भले बदल गयी हो, पर लगता है, वह इन बीते सालों में और पैने होकर जादा चुभने लगे हैं। आज भी मेरी हालत गली के कुत्ते से कम नहीं है। जिन-जिन लड़कों की शादियाँ बिन नौकरी लगे हो गयी है, वह अपने अर्थों में इस बिम्ब की अर्थव्याप्तियाँ खोजने में स्वतंत्र हैं। और हो सकता है, उनके पास इससे भी रचनात्मक बिम्ब और छवियाँ हों। अगर मैं इधर अपनी पीएचडी को निकाल दूँ, तब मेरी हालत और गयी गुज़री है। यह भी एक ख़ास किसम की विलासिता है। बिना जेआरएफ़ यह मुझ पर बोझ है। अभी भी सपने देखता हूँ, इसबार निकाल लूँगा। पर उसके लिए पढ़ना और मेहनत करना भी ज़रूरी है, यह मुझे सपने में कहीं दिखाई नहीं दिये। आज भी किसी तरह सवाल नहीं बदले हैं। वही एक कमरा है। नौकरी अभी भी वेटिंग लिस्ट में है। उसका चार्ट बना नहीं है। गाड़ी प्लेटफ़ॉर्म से छूट चुकी है। कहाँ जाकर लगेगी। पता नहीं। बस जो किरदार कहीं तब नहीं जुड़ पाया था, वह पिछले साल इसी अप्रैल, हमारे परिवार में आ गया है। इसे ही ऊपर किसी और तरह से पहले ही कह आया हूँ। दोबारा का मतलब दोहराव ही है। और इसका एक ही मतलब है, दिमाग ठीक तरह से नहीं चलता। उसमें कुछ ‘डिफ़ेक्ट’ है। अर्थात् शादी के बाद लड़कों का ‘फ़्यूज़’ उड़ चुका होता है। वह किसी लायक नहीं रहते।

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