अप्रैल 11, 2015

दुःख की कथा

वह खाली कमरे का एहसास अपने अंदर भरकर पीछे कई मिनट से अपनी डायरी में छिपाये उस ख़त के बारे में सोचता रहा। वह कुछ नहीं कर पाया। ऐसा सोचकर फ़िर कुर्सी में धँस गया। छतपंखे की फाँकें उसके अंदर निकल आयीं। वह रोने को हुआ, पर रो न सका। इधर कुछ नींद में जाने से पहले के ख़यालों में डूबते हुए उसे उसकी याद आई। वह साथ होती तो अब टीवी पर कुछ देखते हुए एकदूसरे में खो जाते। पर वह कहीं से भी पास नहीं मिली। शायद कहीं छिप गयी होगी। वह भी दूसरी करवट लेटना भूल चुकी होगी। मन किया बात कर ले। पर सुबह के तीन बजे सब परेशान हो जाते, इसलिए रुक गया। मन में उसे फ़िर कुछ कहने को हुआ, पर चुप रह गया। यह एक रात की बात नहीं रही। उसकी हर पिछली याद दिल के धड़कने के साथ शुरू होती। सोते-सोते वह सोचने लगता कल सुबह न हो। वह सपने में ही उससे मिल आए। उसका दिल इस खयाल से भी भर जाता के ज़िंदगी भर उसका सपना चलता रहे। कभी कोई उसे अलग न कर सके। उसने कितनी मेहनत से उसमें अपने खून से बनाए रंग डाले, के उसकी सारी जेबें खाली हो गईं। उसके हाथ भी बिलकुल अकेले रह गए।

उन्हे उस गली के आखिरी मकान में किरायेदार बने वक़्त भी कितना हुआ। कुल दस महीने। घर जमाने में वक़्त लगता है। उस चार-दिवारी में सब होने पर भी कुछ कम लगता। इसी कुछ  की तलाश वह दोनों साथ-साथ करते। कभी वह उसे सुख  कहते, कभी किसी शाम साथ घूमना । दोनों में कितनी ही कमियाँ बची रह गयी हों, पर दोनों एकदूसरे को मुकम्मल बनाते। कोई कसर नहीं छोड़ते। एक शाम इण्डिया गेट जाने के बहाने से वह इन दीवारों से निकल आए। दूरतक साथ चलते हुए उन्होने महसूस किया, हर स्पर्श को कोई भाषा नहीं कह सकती। उन्होने इस स्पर्श को अनुवाद करने की ठानी। दोनों ने सोचा हम इस एहसास से अपनी ज़िंदगी भर लेंगे। उन्हे यह इच्छा सबसे ज़रूरी चीज़ लगी। दोनों तब से ख़ुश रहने लगे। ख़ुश मतलब एक नयी दुनिया में बस जाने से पहले की तय्यारी में डूब जाने तक मुसकुराते से। अजन्मे एहसास को छूने के बाद पैदा हुए स्पंदन की तरह। इसतरह दोनों एकदूसरे की छाया बने।

पर कहते हैं, इस दुनिया में नज़र भी लगती है। उनके सपने को नज़र लग गयी। वह अल्लहड़ लड़की कहीं चौराहे पर किसी गंदे कपड़े को नाँघ आई। उस रात दोनों सो नहीं पाये। दर्द इतना के सहन नहीं होता। यह उनके दुख की रात ठहरी। उसने मन में सोचा, बुला लेना था उन्हे। पर लगता देर हो गयी। रात जैसे-तैसे दोनों अकेले बिन किसी को बताए एक अजनबी से दरवाज़े के सामने खड़े अंदर दाखिल होने से डरते रहे। डर अंदर जाकर कहीं खो जाने का रहा होगा। सच। जब वह चार दिन बाद वहाँ से लौटे तो पुराने वाले दोनों वहीं किसी लाल नीले डिब्बे में कुछ ढूँढ़ते रहे। पर उन्हे कुछ नहीं मिला। उन्हे पहली बार पता चला उनके ख़ून का रंग भी वही है। दोनों घंटों वहीं पेड़ की परछाईं में खिड़की के बाहर देखते सोचते रहे,‘काश, उनके ख़ून का रंग आज लाल न होता, तो वह अकेले वापस न लौटते..!!’ पर उनके साथ जो आया था, वह वहीं छूट गया। वह दोबारा खाली हाथ हो गए। उनके हाथ से वह गुम हो गया। वह खो गया कहीं। दोनों भी वहीं खो गए।

इस शहर ने जो खुशी उन्हे दी थी, वह उसने वापस छीन ली। यह उनसे जादा इस शहर की त्रासदी थी। पर वह कभी इस कमरे में नहीं आया, शायद इसलिए उसे कभी पता भी नहीं चल पाया। जिस शाम उसकी ट्रेन थी, वह उसे छोड़ने स्टेशन तक भी नहीं जा पाया। वह उसे ऐसे अलविदा नहीं कह पाता। भाई रिक्शे पर बिठाकर चुपचाप ले गया। वह नीचे से अकेला कमरे में लौटा, तबसे उसका इंतेज़ार कर रहा है। खाली कुर्सी उस कमरे की तरह उसे अपने अंदर छिपाये रहती। वह मगर छिपना नहीं चाहता। आज तीन हफ़्ते हो गए, उसने वही कमीज़ पहन रखी है। वह उस सपने की याद है। इसे पहने वह हर जगह चला जाता। लोग कहते इसमें सिर्फ़ पसीने की गंध नहीं आती। बल्कि सूख गए ख़ून से लेकर आँसू, नाक-थूक सबकी अजीब-सी बदबू निकलती रहती। वह लोगों को कभी नहीं समझा पाया, ऐसा क्यों हुआ। वह कहेगा भी तो क्या? कोई समझ भी पाएगा। उसके पास दुख की कहानी कहने के लिए शब्द नही बचे हैं।

पता है, इधर उसके साथ क्या हो रहा है? वह नींद में चलने लगा है। नींद में चलकर वह हर रात उसी काले भयानक से दरवाज़े के पास जाकर उसे चिपककर उससे ख़ूब रोता है। अपनी हर बात बताता है। इसके अलावे उसके पास कोई नहीं बचा जो उसकी बात समझ सके। वह दरवाज़ा उसके दुख के दिनों का साथी है। असल में उसके पास कोई नहीं जो अनगिन बार उसकी एक ही कहानी सुन सके। बिना कुछ बोले। बिना कुछ कहे। वह उसे पूरी रात कुछ-कुछ कहता रहता है और सुबह से पहले ही लौट आता है। चुपचाप। अकेला। सिर झुकाये। 

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