अप्रैल 14, 2015

कुछ ब्लॉग किरदारों की बात

सब कुछ वैसा ही है, जैसा कभी नहीं सोचा था। इस पंक्ति के बाद एकदम से सुन्न हो गया हूँ। आगे क्या कहूँ? कुछ कहने के लिए हैं भी या ऐसे ही दोहराव में हम अपने बिगड़ने को देखते रहते हैं। कई सारी बातें हैं, जिन्हे कहना है पर समेटने का सलीका थोड़ा भूलता गया हूँ। अभी खिड़की के बाहर अँधेरा इतना नहीं हुआ पर दिल कुछ बुझा बुझा-सा है। यह ऐसा न भी हो पर थोड़ा तो उदास मान ही सकते हैं। फ़िर एक तो हमारे सपने भी बड़े अजीब से होते हैं। अधूरे से। कभी वहाँ तक पहुँचने के पूरे नक्शे नहीं दिखाते। यह वैसा ही है जैसे रात हो पर अँधेरा न हो। दूसरे यह कि आँख खुलते ही उनका भूला हुआ संस्करण बाद में ख़ूब बेतरतीब किए जाता है। चीज़ें ऊपर नीचे आगे पीछे सब तरफ़ से हम पर उड़ेली जा रही होती हैं। पर हम कुछ नहीं कर पाते। सिर्फ़ एक दो बातें बुदबुदाते हुए उकड़ू बैठ जाते हैं।

यह एक कहानी का बढ़िया प्लॉट हो सकता है, पर इतनी काबिलियत मुझमें अभी नहीं लगती। लिखने को माँज रहा हूँ। रोज़ तय करता हूँ कि कुछ ऐसा लिखने की कोशिश करूँगा, जो न पहले कभी लिखा हो न ही कहीं पढ़ा हो। शायद इसलिए भी किताबों को लाने के बावजूद पढ़ने का मन नहीं हुआ करता। बस उन्हे इकट्ठा करने का शौक-सा बनकर रह गया। इसे एक अजीब क़िस्म की विलासिता भी कह सकते हैं के हमें पता है, कभी ज़िंदगी में हमारे पास इतनी जगह और वक़्त दोनों इतने होंगे, जहाँ हम किसी झूलती आराम कुर्सी में धँसे उन किताबों के अस्तरों पर लिखी कुछ-कुछ बातों को यादकर हल्के से पीछे मुड़कर किसी याद में अरझ जाएँगे।

इसके साथ ही लगता है ऐसा आसपास बहुत-सा है, जो छूटता जा रहा है। जो एकमुश्त पास नहीं भी है, पर उसका ख़याल ऐसे ही अंदर बना हुआ है। जैसे एक वो सागर है, जो अब यहाँ से गुम होकर कहीं छिप गया है। पता नहीं वह कुछ लिखता भी होगा या नहीं। लिखना मजबूरी नहीं, एक पागलपन है। और जैसा वह लिखता है, उसमें इसके सबसे जादा होने की संभावना है। वह कहीं मेरी तरह दिल्ली के किसी खाली अकेले से कमरे में बैठा, दीवार के उखड़ते पलस्तर को देख कविता लिखने को होता होगा, पर बल्ब की रौशनी में कुछ देर और खोने का मन बनाकर उस ख़याल को भी जाने देता होगा। फ़िर इधर एक और से मुलाक़ात हुई। एक दौर छद्म नामों से लिखने का भी रहा। पता नहीं यह उसका असली नाम है भी या नहीं। महेन मेहता। उसकी डेढ़ साल पहले की आख़िरी पोस्ट में फटी डायरी के कुछ सफ़े दिखे तो थोड़ी देर रुक गया। कैसे एक-एक वाक्य में इस छूटते जाने के बाद खाली हो जाने का भाव दिलो-दिमाग दोनों को उनकी जगह रहने नहीं देता। यह भी पता नहीं कहाँ किस उजाले में ख़ुद को पहचानने की कोशिश कर रहा होगा। शायद जैसे सागर जयशंकर की डायरी पड़ते हुए उसे शेयर करके अंदर झाँककर वापस लौट रहा है। बिलकुल वैसे। या पता नहीं किसी और तरक़ीब से।अंदर बाहर होते हुए। 

ऐसे ही अनुराग  मेरठ में डर्मेटालॉजिस्ट’गिरी करते हैं। लिखना पता नहीं किस तरह इनकी रगों में घुसा होगा। पता नहीं कभी किसी कमेन्ट में पूजा  इनकी कोई गंभीर-सी बात बता रही थी। कोई वनलाइनर रहा होगा शायद। किसी गाने या फ़िल्म को लेकर कुछ कह रही थी। एकबार रेल के कम्पार्टमेंट से सीधे आँखों देखा हाल सुना रहे थे। दोस्तों के साथ। ऐसे ही एक मोहतर्मा हैं, तीसरे या चौथे माले पर रहती हैं। एकबार ऐसे ही उन्नाव से मगरवारा तक पैसेंजर ट्रेन की कोई बात बताते हुए जंगलीजलेबी की बात में गुम हो गईं। जो अकेला है, वह खाली है। अकेले होना, खोखले होते जाने की तरह है। यह सब ऐसे किरदार हैं, जो इस लिखने वालों की दुनिया में अपने जैसे लगने लगे। इनके पास कहने को बहुत है, पर इनके पास न इतने मौके हैं न इतने वक़्त की फ़ुरसत। कहने को होते भी होंगे, पर ज़ुबान साथ न देती होगी। 

पता नहीं यह जो आज लिखा है किस रौ में लिख गया। जब-जब मेरे अंदर की हरारत बुखार बन जाती है, तब-तब मेरा दिमाग दिल की जगह शिफ़्ट हो जाता है और सोचने का काम दिल के जिम्मे आते ही बहकी-बहकी बातें करने लगता है। मैं अपने अंदर घर कर गए इस कमरे से बाहर निकलने की कितनी भी कोशिश करूँ निकल नहीं पाता। बस एक आदत ख़त लिखने की शुरू हुई है, देखो उस दुनिया में कौन-कौन से किरदार शामिल होते आते हैं। अभी के लिए इतना ही। लिखने बैठा था, तो सोच रहा था, लिखुंगा कुछ रह गयी बातों पर। शायद यही रह गईं होंगी। या नहीं भी कह पाया तो भी कुछ था जो अब कहीं नहीं है। इसे भूलना कहते हैं। शायद।

2 टिप्‍पणियां:

  1. बाकी तो बाद में लिखेंगे, पहले, अनुराग डेंटिस्ट नहीं डर्मेटौलौजिस्ट हैं...सुधार लो, वरना किसी ने दांत तोड़ दिये तो कौन ठीक करेगा?

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    उत्तर
    1. वहाँ सुधार दिया है, पर वे हैं कौन वाले डर्मेटालॉजिस्ट हैं बाल वाले, खाल वाले, नाखून वाले.. वैसे ये तो कुछ नहीं मैं तो मेरठ का बरेली कर आया था।

      और अगर किसी से दाँत तुड़वाने की नौबत आई तो डेन्टिस्ट का पता भी तुम बता देना। चुपचाप वहाँ चला जाऊंगा।

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