अप्रैल 27, 2015

कुछ क़तरे..

अब ठीक हूँ। वो जैसे ही मौसम बदलता है, सबसे पहले मुझमे दिखने लगता है। हम कभी कुतुब के बाहर बची रह गयी जगहों पर नहीं जा पाये। जमाली-कमाली भी उनमें से एक है और भी पता नहीं ऐसे कितनी जगहें होंगी कहाँ-कहाँ। फ़िर दिल्ली का यह मौसम तो माशाअल्लाह। इधर अप्रैल पिछली बार की तरह रंग बदल रहा है, वरना अब तक तो पारा और चढ़ जाता। कुछ बचा हुआ है, इस बार भी..पर सब हम अपने अंदर ही नहीं देखते जैसे यह मौसम। यह बाहर से अंदर आते हुए हमें लगातार बदलता रहता है, अनकहे, अनचाहे।

ख़ैर, एकबार हस्तीनपुर जाने की बात हो रही थी, वह बात ही होती रही। पाँच-छह साल पहले। तबसे हिम्मत नहीं हुई के रोडवेज़ बस में चढ़कर कभी मेरठ के आस-पास इस जगह को ढूँढते। न कभी हम दोस्त लोग इस जगह पर राजी ही हो सके।

नौकरी की तय्यारी मन में चल रही है साथ-साथ। जैसे किताब का सपना चल रहा है साथ साथ। अभी थोड़ा व्यस्त भी था, वहाँ क्लास में हम लोगों को एक प्रेजेंटेशन देना होता है, उसी सिलसिले में। बाकी सब तो यहाँ है ही। कल अख़बार में अपना एक टुकड़ा आया था, उसी को देख रहा हूँ तब से। यह हमारी शादी की सालगिरह के दिन आया। पहली सालगिरह। तब उसने ख़त लिखा

वैसे हस्तीनापुर जाकर फोटो न लेना वैसा ही जैसे हम इधर लखनऊ गए और बिना खींचे लौट आए। मन ही नहीं किया कि कुछ उतार कर कैमरे में रख लूँ। शायद मन कहीं और बातों में उलझा हुआ-सा रहा होगा। रात के दो बजे चारबाग़ स्टेशन का भरा भरा-सा प्लेटफ़ॉर्म। लोग बिखरे पड़े हैं। बिछे पड़े हैं। वैसे आपकी गाजीपुर फूलमंडी वाली तस्वीरे काफ़ी अच्छी हैं। हम तो उसमें जैसे गुम हो गए..

8.
दिल्ली में कहीं कहीं कुछ क़स्बा बचा रह गया है। वह अभी भी कच्चा है, अधूरा है। सच यह कहना मुश्किल है कि वक़्त के किन क्षणों को जोड़कर इस घूमने वाली मद में ख़र्च किया जाये। मेरा पासपोर्ट भी नहीं है, न मुझे पता है, वीजा मिलता कैसे है? पर मुझे पता है एक दिन सारी दुनिया घूमकर वापस इस देश लौटूँगा। यह कब होगा पता नहीं। पर होगा ज़रूर।

और बिलकुल हौज़ खास की वह झील बहुत प्यारी है, कुछ ही ऐसी जगहें दिल्ली में बची रह गयी हैं। एक नजफ़गढ़ में थी, वह इसी साल गायब हो गयी। हमसब भी ऐसे गायब हो रहे हैं। धीरे-धीरे। एक दिन हम भी गुम हो जाएँगे। 

इंसान सिर्फ़ अपने लिए करने की सोचता है, फिर भी कितना अधूरा-अधूरा सा करके बैठ गया है। सबकुछ जैसे ख़त्म होने की कगार पर हो.. ख़ैर, हम दिल्ली से ही हैं, पर बाकी सब गाँव में भी हैं। मम्मी-पापा, भाई-बहन, मैं और वे। एक कमरे के घर में किसी तरह इन दिनों से भागने की फ़िराक में हों जैसे। पर ज़िन्दगी के कितने साल हम लोगों ने यहाँ बिता दिये। हम वापस लौट जाना चाहते हैं। पर इस लौट जाने की सघनता को हम इतना महसूस नहीं करते इस तरह के तुरंत लौट जाएँ।

हम कभी इस कमरे से बाहर खुद को महसूस नहीं करते। बाहर जाना लौट जाने के लिए ही है।

{पीछे के कुछ क़तरे: एकदोतीन।  }

4 टिप्‍पणियां:

  1. चलिए आशा होगी की आप को आपकी मंजिल मिल जाये

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  2. आपकी शुभकामनाओं के लिए शुक्रिया।

    वैसे आप अपने ब्लॉग से नहीं अपने नाम से यहाँ आते तो जादा ख़ुशी होती। नीचे इस पुरानी बस्ती बिछाने बनाने वाले का नाम होता तो और बढ़िया लगता।

    उत्तर देंहटाएं

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