अप्रैल 24, 2015

कुछ क़तरे..

मेल से आई चिट्ठी जादा सबर और वक़्त मांगती है, लोग कहीं अरझे नहीं रहना चाहते होंगे। शायद इसलिए हमारी दुनिया इससे बचती रही होगी। पर मुझे आश्चर्य है कि आप कैसे वहाँ तक पहुँच गईं (?) के मैं इतना लिखते हुए भी चुप्पा किस्म का हूँ? बहुत मानीखेज लगा मुझे। पता नहीं यह क्या है, मैंने इसे कभी कोई शब्द नहीं दिया। बस बेचैनी अजीब किस्म से मुझे, मेरी ज़िंदगी को घेरे हुए है, उसी में साँस लेने की कोशिश में वह लिखने वाली खिड़की खुलती रही है। मैं शायद लिखते हुए भी बहुत ‘रिज़र्व किस्म’ का बनता गया हूँ, शायद। शायद हम सब अपनी सीमाओं में ऐसे होते होंगे। पता नहीं..

फिर भी मुझे लगता है, हम चाहते तो हैं, पर सुकून से रह नहीं पाते। अंदर इतनी आपाधापी मची रहती है कि कोई ठिकाना नहीं। मैं भी चाहता हूँ घूमूँ, पर.. पता नहीं क्या?

वहाँ कभी आना नहीं हुआ। मुझे लगता है, वो सपनों को ‘कमॉडिफ़ाय’ करता शहर है। असल में न भी हो, पर मुझे ऐसा ही लगता है, दूर से। और वो अब शायद गुम भी हो चुकी है जो घरौंदा या बासु चेटर्जी या ऋषिकेश मुखर्जी कि फिल्मों में कभी रहा होगा। पारसियों वाला शहर। दिल्ली भी मुझे ऐसी लगती है कभी, चश्मेबद्दूर वाली कभी नहीं मिल सकती कभी। उसका ‘नॉस्टेलजिया’ मेरे अंदर पता नहीं कब दाखिल हो गया, पता ही नहीं चला। शायद मेरा सुकून वहीं कहीं छुप गया होगा। इधर मेरा शहर  एक खाली कमरा  है, जहाँ घंटों अकेले बैठे रहता हूँ, बेवजह। चाहता हूँ, कहीं गुम हो जाऊँ.. काश हो पाता..!!

मैं सपनों में खुश रह लेता हूँ, असल में जैसे ही वह मेरे सामने गुजरते हैं तो जैसे लगता है, पतझड़ आ गया। मेरा कभी कोई सपना पूरा नहीं हुआ। जो हुए उनमें पैबंद लगा लगाकर हार गया। फ़िर जितना वक़्त मैं उन तसवीरों को ढूँढने में लगता हूँ, काश मुझे मेरी ज़िंदगी चुनने के लिए भी मौके मिलते..पर उनको होना ही नहीं था। शायद। 

लगता है, कुछ जादा कह गया..

2.
पता नहीं इन बीतते सालों में लगातार कैसा होता गया हूँ? शायद असफलताएँ और उनका लगातार मेरी ज़िंदगी में सघन होते जाना, इसका कारण रह गया होगा। रह गए होंगे कुछ कतरे। कुछ अनकहे सफ़े। कुछ ऐसी और बातें। उनको कहने न कहने से कुछ नहीं होने वाला। 

तब उस अकेलेपन की बात न होती तो शायद कभी सोचता भी नहीं, इस बिन्दु पर। या शायद हो सकता है, हम उन पन्नों को जल्दी से कहीं बिस्तर के नीचे रख छोड़ भूल जाना चाहते हैं, जहाँ हम कहीं नहीं हैं। ऐसे ही मैं कहीं नहीं हूँ। कहीं किसी कोने में भी नहीं। अकेले।

कुर्सी में धँसकर अपने दोस्त ठीक-ठाक संख्या में तो नहीं कह सकता। दोस्त वह, जो हमें, सुन सके। हमारे अंदर झाँक सके। एक था, वह दिल्ली सन् दो हज़ार ग्यारह में छोड़ गया। शादी के बाद उसके पास यहाँ रहने के बहाने कम रह गए इसलिए। एक दूसरा, जो अभी बीते साल मुकम्मल रूप से वापस हो गया। इनसे कभी फोन पर बात हो जाते हैं। पर दोनों मेरी तरह अपनी ज़िंदगियों की उलझनों में ऐसे होते रहते हैं के जादा परेशान करे का मन नहीं करता। ख़ैर। वह भी कैसे करके बचने की कोशिश करते हैं। चीज़ें सतह पर न तैरने लगें।

फ़िर यह लिखना बचा, जो मुझे लगातार सुनता रहता है। पर दिक्कत है बोल नहीं पाता। दीवार के सामने बोलने की तरह। मेरी तंगनज़री में दुनिया जैसी लगती है, उसे वैसे ही कहता चलता हूँ। इधर मेरे साथ वे भी हैं, जिनके सपने किसी भी तरह से ज़मीन पर नहीं उतर पाया, इसलिए टूटना- बिखरना इसतरह दिख जाता है। उसके लिए मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर पाता। नौकरी न होना शायद इस दुनिया की सबसे खराब चीज़ हैं। वह कितने सपने लेकर आई थी मेरी ज़िंदगी में.. और मैं कुछ नहीं कर पा रहा.. यही सोच घुट रहा हूँ.. पीएचडी तो बहाना है, एक पैबंद। अभी बहुत बाकी है। पर उम्र न तो रुक रही है, न कहीं से भी धीरे चल रही है.. देखते हैं नाव कहाँ जाकर लगती है।

ख़ैर, छोड़ते हैं इन बातों को।

{अगले सफ़े: कुछ क़तरे: दोतीनचार। } 

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