अप्रैल 26, 2015

कुछ क़तरे..

तबीयत कल के मुक़ाबले काफ़ी दुरुस्त है। बस अब मन ठीक करना रह गया है। अभी इतनी उम्र नहीं हुई पर बचपन की यादें अब गड्ड-मड्ड होने लगी हैं। मुझे बचपन की कहानियाँ पढ़ना पसंद हैं, जैसी उदय प्रकाश ने लिखी हैं। तिरीछ या डिबिया या मौसा जी या ऐसी बहुत। शायद ख़ुद की नहीं लिख पाया इसलिए भी। हम शायद कहानियाँ ही तो ढूँढ रहे होते हैं, अपने अंदर, अपने बाहर। आपने बिज्जी को पढ़ा है? विजयदान देथा या इधर एक किशोर चौधरी हैं, उनका ब्लॉग है हथकढ़। देखिएगा। अभी मालचंद तिवाड़ी की बोरुंदा डायरी भी आई है। नए तरह का गद्य है, भाषा प्रयोग पर भी कुछ नया है शायद। किताब देथा पर है।

अभी दवाई खानी है, और बहुत सारी तय्यारी करनी है। और वो पाँच साल पहले कहीं अक्टूबर दो हज़ार नौ में हम रोहतांग, केलॉन्ग तक गए थे। वैसी शांति फ़िर कहीं नहीं मिली मुझे। उसकी यादों में चार दिन ही थे पर अभी भी लगता है जैसे सब सामने से गुज़र रहा हो। उसके हाथ पर पट्टी और मेरा इस बात को डायरी में लिख लेना और उसका पढ़ जाना।

बाकी सब तो बाकी रह ही गया मुझमें।

6.
दोस्ती तो दोस्ती रहती है। बस हो सकता है, वह सघनता न हो। मुझे दोस्तों के छूट जाने ख़ुद के छूट जाने का एहसास भरा मिलता है। कभी उन्हे पढ़िएगा, आमोल पालेकर की फ़िल्म है एक 'दुविधा' जिसे बाद में 'पहेली' के नाम से किसी ने बनाया और शाहरुख की खराब एकटिंग के बावजूद कहानी फ़िर घर कर जाती है।

कभी मेरे एक साथी मित्र ने कहा था, तुम कभी कहीं घर मत बनाना, तुम ऐसे ही घूमते रहना। तब मेरे पैरों में बिलार बंधे थे। खूब घूमना होता था। अब उसकी हद में रहकर कहीं कहीं हो आते हैं। आप क्रिकेट देखती हैं, मैच शुरू होने वाला है। मन नहीं करता पर मन ठीक करने के लिए यह आदत भी ठीक खतरनाक से कुछ कम है। अभी सात सालों से कहानी लिखने की सोच रहा हूँ, कभी वो भी लिखी जाएगी।

आपको ऐसा नहीं लगता कि मैं अपनी ही कहता रहता हूँ.. आप पुराने दोस्तों को नए सिरे से देखिये, कुछ नया मिलेगा।

{कुछ क़तरों की बकाया किश्ते: एकदोचार।  }

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