अप्रैल 25, 2015

कुछ क़तरे..

मुझे कहीं-न-कहीं ऐसा ही लगा था, जैसा आपने बताया। आप बाद में यहाँ से बंबई गए होंगे। मैं तसवीरों में अपनी ज़िंदगी में छूट गए रंगों को ढूंढता रहा हूँ। मेरे यहाँ भी रंग हैं पर सब मिलकर काले में तब्दील हो गए हैं। मुझे लगता रहा है अभी मेरी ज़िंदगी मेरे मन की नहीं है, इसलिए सपने देखता हूँ। सोचता हूँ, कभी किसी मोड़ पर पीछे पलट कर देखूंगा, शायद कोई तो पूरा होकर मेरे इंतेज़ार में खड़ा होगा, तब लौट चलूँगा, वापस। धीरे-से। आहिस्ते-आहिस्ते। बिना किसी हड़बड़ी। आराम से।

शायद जो आज नहीं है, उसी की कोई तस्वीर वहाँ छूट गयी होगी। मेरा सुकून मुझे वहीं ले जाता है। जो आज में नहीं है। या तो वह बीत गया या फ़िर इतनी आगे कहीं है, जो दिख नहीं रहा। मैं भी चाहता हूँ आपकी दुआ जल्द पूरी हो जाए। कुछ हो जो सच हो। इस झूठ की तरह सच।

बस इससे जादा नहीं.. है तो बहुत.. पर सब बेकार है..

4.
हम कोशिश करते हैं बचने की। पर बच नहीं पाते। वो तमाम ख़याल जो ज़िंदगी से गायब हैं, सपने बनकर घेर लेते हैं। हम कभी मुन्नार नहीं गए। दो साल हुए ऊटी तक जाकर लौट आए थे। प्रकृति किन्ही उन रूपों में अच्छी लगती है, जब वह अनछूए का एहसास दे। ऊटी में तो आवाजाही बहुत है, फिर वहाँ से रेस्ट हाउस भी किसी तरह नहीं खींचते। लाहौल स्पीति, रोहतांग भी अब सबकी पकड़ में आने लगा है। पाँच साल पहले जब गए, तब के हर पल को अंदर ही रखे हुए हूँ। जिसे भी बताऊँ, उसे सब बताना पड़ेगा।

आप इस तरह ही अलग अलग रंग की तस्वीरें खींचती रहिए और हमेशा ऐसे मौके आपकी ज़िंदगी में लौट-लौट कर आयें।

किसी जमाने में फिल्मों को छोड़ता नहीं था, पर अभी बार डेढ़ साल बाद पिछले बुधवार ‘ब्योमकेश बक्शी’ देखी। वैसे भी दिल्ली में गैर-हिन्दी या अँग्रेजी फिल्मों की बातें कभी सुनाई नहीं दे पाती। वरना अधिकतर टोरेंट से डाउनलोड करके देखता रहा हूँ। आप कुछ के नाम सुझाईए, जिन्हे देखे बिना काम न चले..

बाकी बस वही इंतज़ार। किसी सपने से लौट ज़िंदगी तक वापस आने तक। फिर एक सपना किताब लाने का भी रहा, पर इतना सोच नहीं पाता। कौन छापेगा, इसी सवाल का जवाब नहीं मिल पाता। फिर यह भी लगता है, लिखने का सहूर और सीखने की जरुरत है।

{कुछ बाक़ी सफ़े: कुछ क़तरे :एकतीनचार।  }  

4 टिप्‍पणियां:

  1. अभी कल ही फिल्म देखी है 'द गोल्डन एरा'. चाइनीज में है. लेखिका की कहानी है. मुझे वैसे भी बायोपिक पसंद आते हैं. खास तौर पर इस तरह के किरदारों के. उसके समय का देश जापान के हमले से जूझ रहा है और लेखिका है कि जोश भरी देशप्रेम की कहानियां और कवितायें लिखने की जगह गरीबी पर लिखती है...दुःख पर लिखती है...नदी के बारे में लिखती है. नदी पर लिखना जरूरी क्यूँ है? क्यूंकि जंग ख़त्म हो जाती है, सिपाही अपने घरों को लौट जाते हैं मगर नदी अपनी जगह बहती रहती है...क्यूंकि नदी का गीत, उसका सौन्दर्यबोध हमारे जीने के लिए जरूरी है और सतत ऊर्जा का श्रोत है? आखिर क्यूँ जरूरी है इक नदी पर निबंध/आलेख लिखना. हमें कुछ सिर्फ इसलिए लिखना चाहिए कि हमें कोई बात कहनी होती है? कहानी मुश्किल उतार चढ़ावों में ऐसे ही कुछ सवालों से उलझती है. देखना. बहुत बेहतरीन नहीं है मगर कई लेवेल्स पर महसूस किया है फिल्म को...अच्छी लगी है.

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    1. पता नहीं यह कैसा भाव है?

      इधर ख़ुद ऐसी ही बुनावट वाले सवालों-जिरहों से हम सब जूझ रहे होते हैं। कभी न कभी ऐसे दौर भी आते होंगे, जब हम अपने लिखने को परख रहे होते हैं। वह भी और काफ़ी हद तक तुम और मैं या हमारे जैसे बहुत से और लोग भी कभी ऐसे ही प्रश्नों से घिर गए होंगे।

      फ़िल्म डाउनलोड करनी पड़ेगी, पर वक़्त निकाल कर देखुंगा। पर आज तुम्हारी बात को दोबारा-तिबारा पढ़कर थोड़ा सुकून मिला। पता नहीं क्यों। शायद जल्दी या देर से यह मेरे अंदर भी उग आई नहीं के बारे में हो।

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  2. हम कोशिश करते हैं बचने की। पर बच नहीं पाते।

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    1. बस ज़रूरी है, लगातार कोशिश करते रहना।

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आवाज़ें..

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