मई 21, 2015

शादियाँ उर्फ़ जब ज़िन्दगी ‘सारा आकाश’ हो जाये

1. खाली पन्ने
डायरी। आखिरी पन्ना। तारीख़ चौबीस अप्रैल। इसके बाद के सारे पन्ने खाली। बिलकुल सफ़ेद। आज कितने दिन हो गए? अभी गिने नहीं। पर तीन दिन बाद पूरा महिना हो जाएगा। कहीं कुछ नहीं लिखा। ऐसा कैसे हो गया। पता नहीं। बस लगता है, जैसे दिनों को रात के पहिये लग गए हों। सब सोने लगे। भरी दोपहरी। पता नहीं मन में क्या चलता रहा। वहाँ उसबार ऊपर वाली मंज़िल पर बैठे रवीन्द्र कालिया की कहानी पढ़ता रहा। नौ साल छोटी पत्नी । पता नहीं कहानी  कैसी है। उसमें न तुम थी, न मैं था। एक अकेला कमरा लेकर माता-पिता से दूर कहीं किसी जालंधर शहर में हम दोनों रह रहे होते। कितना अजीब है न। मेरे लिए यह सोचना भी मुश्किल है। मैं विनोद कुमार शुक्ल के ‘दीवार में खिड़की रहती थी’ का रघुवर प्रसाद ठहरा। सड़क पर किनारे खड़ा। इंतज़ार करता।

कहते हैं, जब उन्होने कहानी लिखी तब वे अविवाहित थे। यह भी के उनके उस्ताद मोहन राकेश बहुत नाराज़ हुए थे, इसके बाद। अगर आज मैं ऐसी कोई कहानी लिखूँ और उसमें राजेन्द्र यादव के ‘सारा आकाश’ की छवियाँ दिख जाएँ तो हमारी ज़िंदगियों मेंसे छटाँक भर झूठ ही ऊपर-नीचे होगा। बाकी सब थोड़े बहुत रद्दो-बदल के साथ रफ़ू कर चुका होऊँगा। कुशल बनकर ‘प्रेत बोलते हैं’ लिखना मुश्किल है। मुश्किल है, ऐसी ज़िंदगी को जीते रहना। जीते हुए ऐसे लिखते रहना। लिखना बहाना है, जीने का जैसे। 

2. सपने सब देखते हैं
सपने सब देखते हैं। उन्होने यह सपना मिलकर कतई नहीं देखा। दो महीने पहले आई लड़की, जो अब उसकी पत्नी है, हमेशा अपनी जेठानियों के नीचे, दिनभर रसोई में मिसराइन की तरह रहने लगी। जेठानियाँ उन्हे दबा ले गयी हैं। 

उनकी आँखें भी खाली नहीं रही होंगी। वह जब छह साल पहले आई होगी। तब सोचा नहीं होगा, हरसुबह नौबजे मामाजी के नाश्ते का टिफ़िन तय्यार करने में उनके सारे सपने, अधखुली आँखों से ऐसे ही उड़ते जाएँगे। कहने को यह नौ बजे है पर जब इसके लिए उठना तड़के पाँच बजे पड़ता, तब पता चलता, उन दर्दकरती कड़वी आँखों का दर्द। बिटिया भले उठ जाये। रोने लगे। पर रसोई छोड़कर वापस ऊपर कमरे में नहीं जा सकती। और एक वह है, दो महीनों में ही पीछे हटने की नौबत आगयी। उन्हे क्या जेल से कम लगती है यह जगह। शायद कम है भी नहीं शायद। सबको लगता मर्जी है। पर है इस घर में किसी की पत्नी बने रहने की मजबूरी।

3. कानपुर: उत्सव गेस्ट हाउस
ऐसा नहीं है, शादियों के सपने नहीं होते। वह दोनों अपने मन से दोनों एकदूसरे के सपनों में दाख़िल हुए। कानपुर दिल्ली जैसा नहीं पर फ़िर भी ‘उत्सव गेस्ट हाउस’ कोई छोटी जगह नहीं थी। क्या बारात आई थी। हम लोग भी गए। बड़े डाकघर से मुड़कर कैंट तक। पनकी से लड़का पढ़ने आया और दोनों पहलीबार गोमती एक्सप्रेस में आमने-सामने की सीट पर मिले। कोई पेपर था, लखनऊ में। कल। इतवार को। बक्शी का तालाब के पास। वापस उसे भी चार बाग लौटना था। साथ में। उसके बाद पता नहीं कितनी बार ऐसे मिलते रहे। बेमकसद। रेल में।

मिलते रहे सपनों में भी। बिन बताए। बिन कहे। अनगिन बार। के कोई देख ले उन्हे। साथ-साथ।

4. नौकरी
आज जब एयरटेल का रिटेल काउंटर संभालते वक़्त कोई बड़ी गाड़ी से उतरकर वह सामने आ जाती, तो उसे लगता, गलत जगह चला आया। उसे इसके बगल होना चाहिए था। थोड़ा और इंतज़ार कर लेता।

एक बड़ी नौकरी के लिए शायद वह इतने पैसे कमाने कहीं चला जाता। शायद दिल्ली। या फ़िर लखनऊ। बंगलोर। सिर्फ़ वह दोनों होते। पर आज अब कोई नहीं कहता, उन दोनों ने लव मैरेज की है। सब यही कहते, लड़की क्या ख़ूब खाना बनती है। उसे लगता, उसकी ज़िंदगी खाना बनाने में ही निकल जाएगी। पर वह क्या करे। उसने भी तो शादी का सबसे बड़ा तोहफ़ा घर की बड़ी रसोई दी। आज भी हररात उसे सपने आते। पता नहीं क्यों उसे सपने में जो भी घर नज़र आता, उसमें यह रसोई घर ही गायब रहती। बिलकुल गायब। नदारद।

5. यह अजीब बात है
पर यह अजीब बात है, इनमें से किसी की कहानी किसी ने किसी कहानी में नहीं कही। कोई इन तक कभी पहुँच भी नहीं पाया। शायद वह जो लिखते हैं या तो ऐसी ज़िंदगी नहीं जीते या उनके शिल्प में यह किस्से कहीं नहीं अटते। जो भी हो, हमसब गायब हैं। हमारी जिंदगियाँ गायब हैं। हमारी शादियाँ कहीं नहीं हैं। उनका गायब होना हमारी घुटन का गायब होते जाना है। हमारे सपनों की रुकी हुई किश्तों का रुक जाना है।

इसलिए ज़रा बचके। यहीं रुके रहो, घास के मैदान के पास। पानी के झरने के किनारे। घात लगाकर बैठे रहो।

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