मई 01, 2015

जो यहाँ छिप-छिपकर आते हैं, उनके लिए. .

कई दिनों से सोच रहा हूँ मेरे लिखने में ऐसा क्या है(?) जो चाहकर भी गायब होता रहा है। इस खाली कमरे का एकांत पता नहीं किस तरह अपने अंदर भरकर यहाँ बैठा रहा हूँ। दीवारें बदल जाती हैं पर मन वहीं कहीं अकेले में रह रहकर अंदर लौटता रहता है। यह बहुत अजीब है कि जब कहीं चेहरे और नाम दोनों को पहचानने वाले मिल जाते हैं, तब एकबात हरबार सुनाई देती हैं। वह सब आहिस्ते से पूछते हैं, आप अकेले रहते हैं? मैं धीरे से कहता हूँ, नहीं। इस पूछने और कहने के बीच न जाने सवालों की जिरह दोनों तरफ़ उठती रहती होगी। यह कैसे(?) हुआ होगा के लिखने में मेरा घर कहीं पीछे रह गया। उन सबको कैसे लगता होगा कि इस शहर में मैं भी उनकी तरह अकेला, किसी दूर के सपनों के लिए लड़ रहा हूँ। फ़िर मेरे अंदर से ही यह बात आती कि इस लिखने में ही ऐसे धागे रह जाते होंगे, जिनमें मैं सिर्फ़ मैं  बनकर उन सबके सामने आता।

शायद यह हमारी सहूलियत-सलाहियत का भी सवाल है। हम कैसे अपने आसपास की दुनिया रचते हैं। यह जो मेरा अकेले रह जाना है और जो भावों का मिल जाना है, सब आपस में गड्ड-मड्ड होता रहता है। पता नहीं मेरे अवचेतन में कहीं कुछ रहा होगा जो लिखने के दरमियान उन सबको बाहर आने से रोकता होगा। रोकना इस जगह की अपनी सीमाओं में आकार लेता रहा और मेरी कागज़ की डायरी कभी सामने नहीं आ सकी। जब कोई वहाँ पहुँच ही नहीं पाया तब कैसे जान पायेंगे के जो भी मैंने यहाँ उतार कर रख दिया है, वह कितना अधूरा है। पर नहीं, शायद एक हद तक हम सभी अपने इर्दगिर्द एक ऐसा घेरा बना लेते हैं या वह हमको देखकर स्वतः हमारा ‘कमफ़र्ट ज़ोन’ बन जाता है, जिसको तोड़ने की हिम्मत या कोशिश हमारे मन में कभी नहीं होती। ऐसी हिम्मत या कोशिश उसे नहीं, खुद को तोड़ने जैसा है। 

यह बिलकुल वैसी ही बात है कि लिखने वाले ने कभी यह नहीं सोचा के उसे पढ़ने वाले उन पंक्तियों से गुज़रकर अपनी दुनिया में लौट जाते हैं। वहाँ जाकर कोई भी क़तरब्योंत कर पाना किसी रचनाकार के लिए संभव नही है। अगर ऐसा होता तब वह लेखक नहीं कोई जादूगर है; जो अपने मन से उनके घेरों में अपने तरह से रंग भरता हुआ सबकुछ नियंत्रित करता रहता है। मुझमें यह कला कुछ कम रह गयी जान पड़ती है। या हो सकता है ज़िन्दगी के जिस दौर में हम यह सब लिख रहे हैं, वहाँ के दबाव इस तरह से हम पर बनते रहे के शहर में रहने के बाद इसकी गलियाँ हमारे दिलों में उतरती हुई हमारे क़ाबू से बाहर होती गयी। हम कभी सोच भी नहीं सके के जब यह लिखा हुआ पुर्जा किसी के हाथ लग गया, तब क्या होगा? मुश्किल तब और बढ़ जाती है, जब उसमें उन्हे अपना चेहरा दिख जाता है। और एक हद तक यहाँ ‘मुश्किल’ एक गलत शब्द है, पर क्या करूँ मेरी भी एक सीमा है। उसे बाहर जाने का साहस मुझमें अभी नहीं है।

फ़िर यह भी पूछे जाने लायक सवाल है कि जब हम अपने पढ़ने वालों से बात कर रहे होते हैं, तब बिलकुल अलग तरह से ख़ुद को और अपने लिखे हुए को जान पाते हैं। वह बात जो हवा में कहीं पहुँचने के लिए टंगी हुई थी उसे अब एक मुकम्मल जगह मिल गयी है, वह धीरे-धीरे किसी के दिल में उतरते हुए उन कतरों में मिलते हुए, अनछुए एहसासों में तब्दील होती जा रही होती है। कोई बात थी, जो छू गयी। असल में यह न कह पाने की जद्दोजहद से निकली हुई अनकही बातों का वजन है जो किसी कोने में दिल के पास, बगल में, बाँछों के दरमियान छुपी हुई रह गयी थी। पर अब जो हमारे मन में एक ख़याल था, वही सामने है, तब हम ख़ुद को रोक नहीं पाते। रोकना चाहें, तब भी नहीं रोक पाते। क्योंकि कहीं भीतर की गहराइओं में डूबा हमारा मन अब इतनी देर बाद अपने को संभाल नहीं पा रहा होता।

इधर यहाँ लिखने के पाँचवे साल में चलते हुए बहुत से साथी मिले, जो कभी यहाँ किसी पोस्ट पर अपनी कोई पहचान नहीं छोड़ जाते, पर जब मिलते हैं, तब उनके चेहरों पर तैर जाती मुस्कान बहुत कुछ कह जाती है। वे सब कहीं न कहीं अपने अंदर इन एहसासों को महसूस करते हुए थोड़े और नज़दीक आ जाते हैं। फ़िर भी उनसे जादा बात नहीं कर पाता। शायद यह पहली बार है, इधर। उन सबको अपने आस पास देखकर लगता है, लिखना सिर्फ़ एक असामान्य घटना नहीं है। इसके घटित हो जाने के बाद बन रहे संबंध उस लिखने के कारणों की तरफ़ जाने का एक बहुत बड़ा कारण है। और ख़ासकर मैं तुम्हारा नाम नहीं दे रहा। पता नहीं तुम यहाँ उसे देखकर कैसे हो जाते। पर हम कम मिल पाते हैं। और अक्सर जब तुम होते भी हो तो सिर्फ़ बहुत कम देर के लिए बात हो पाती है।

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