मई 23, 2015

नानी घर

बचपन की यादों में सबसे अनछुई याद है नानी के घर की। हमलोग इसी मौसम में झुलसती गरमियाँ अपने गाँव में बिताने हरसाल लौट आते। वहाँ हमें छोड़कर सब रहा करते। वहाँ बस, हम ही नहीं हुआ करते। पता नहीं हम कितने छोटे रहे होंगे जब पापा हीरो मजेस्टिक  खरीदकर लाये। शायद मेरे मुंडन का साल रहा होगा। यह इसलिए याद रह गया क्योंकि उस तस्वीर में मेरे सिर पर बाल नहीं हैं और हम भाई और बुआ सब उसपर फ़ोटो खिंचवाने के लिए बेतरतीब चढ़ गए। तब रील वाला कैमरा होता था। कोनिका का। कोडेक बहुत बाद में आया। केबी टेन। पर जितना इनके नाम में कुछ नहीं रखा है, उससे जादा, उन एल्बमों में लगी तस्वीरें कह जातीं। सिर्फ़ दिखकर। अचानक। चुपके से। सहसा। 

एक-एक रील को कितने धीरेसे तस्वीरों में बदलते रहना है, यह हमने पापा से सीखा। आज हर मोबाइलफ़ोन कैमरा है। कितने सस्ते में सब डिजिटल कैमरे बेच रहे हैं। पर उस डार्करूम का नॉस्लेटजिया जाने भी दो यारों से निकलकर हमारे अंदर कब दाखिल हो गया, पता नहीं चला। वह ऐसे ही अंदर के अँधेरे कमरे में बंद है। बंद हैं उनमें, ऐसी बहुत सी तस्वीरें। अनदेखी। अनछुई। 

तो ऐसे ही एक गर्मियों की छुट्टियाँ रही होंगी, हम वहीं थे। पता चला, नानी के गाँव में आग लग गयी। सब सोच रहे थे घर वर सब जल गया होगा और वह बचे-खुचे समान के साथ कहीं किसी बगिया में खुले आसमान के नीचे पड़े होंगे। दादी ने नानी के लिए एक साड़ी और पेटीकोट मम्मी के हाथों में रख दिया। हम उसी हीरो पुक पर बैठे नहर किनारे ढलान से नीचे उतर रहे हैं। हम कहीं रुके नहीं। सीधे घर पहुँचे। घर जलने से बच गया था। तब मम्मी ने नानी को दादी का दिया झोला दिया। तब नानी ने उसे बिन खोले वापस कर देने को कहा। हम केवल मूकदर्शक थे, कुछ समझ नहीं रहे थे, ऐसा नहीं कह सकते। हम बस अपनी नानी को सोख रहे थे।

ऐसा हरबार होता के हम हमेशा वहाँ जाकर खो जाते। वापस लौटने के लिए मचलने लगते। लगता अभी रात खत्म हो जाये और हम वापस दादी के पास चले जाएँ। तबसे लेकर नाना-नानी के चले जाने तक पता नहीं किस भाव से भरा रहा। कभी कह नहीं पाया। सालों बाद आज भी जब जीने से उतरते हुए नानी का खाने के लिए बुलाना याद करता हूँ तो मन थोड़ा उदास हो आता है। वह फ़ूले की बटुली में अरहर की दाल पता नहीं किस स्वाद से भर देतीं कि आजतक उसे ढूँढता-ढूँढता जैसे थक गया। उनकी अंदर धँस गईं आँखों में कुछ ऐसा था के कभी वापस उस खपरैल वाले घर लौट आता। जैसे वह अभी-अभी छोटके मामा के साथ खुटेहना बाज़ार करके लौटी हों और इतनी दूर चलकर आने से उनके पैर और फेफड़े दोनों थककर चूर हो गए हों कि सामने हमारी अम्मा को देख थकान जाती रही हो। यह हमारी मम्मी का भी वापस लौटना रहता। साल भर में एक रात। सिर्फ़ एक रात। शाम के ढलते ही वह छोटी-सी खामोश रात। 

जैसे ही हम पहुँचते मामा बाल्टी लेकर ठंडा पानी भरने कुएँ पर चले जाते। घर में नल था नहीं। जितनी बार पानी की ज़रूरत पड़ती, उतनी बार वे वहीं से भरकर ले लाते। फ़िर नानी उस तांबे या फूले के लोटे में नींबू पानी का शरबत घोलने लग जातीं और मामा लौटकर चीनी लेने के लिए वापस ढाबली की तरफ़ लौट जाते। हम तबतक वहीं बाहर दुआरे पर बने मिट्टी के चबूतरे पर बिछी खटिया पर बैठे रहते। मन बार बार छत पर जाने को होता पर हम दोनों भाई उसे रोके रहते। उस छत की भी एक कहानी थी। वह फ़िर कभी। रात होती। हम खाना खाते। मैं पापा के बगल उन कुरमियों या अहिरों के अहाते में बिछी खाट पर इमली के पेड़ के नीचे, ट्रॉली के बिलकुल बगल लेटा रहता। मेरे सपनों में तब मैं बहुत ही छोटा रह जाता और वह पीछे खड़ा ट्रैक्टर बहुत बड़ा होकर मुझे रात भर डराता रहता। पर मुझे भी इससे बचने की तरकीब आती। मैं पापा के बगल लेटे लेटे डरता तो क्या बस आसमान के तारे गिनता रहता। जितनी बार नींद टूटती, उतनी बार पिछली बार याद रह गयी गिनती से शुरू हो जाता। कभी मुझे दिख जाते अपने आसपास के चेहरे। और मैं डर के सो जाता।

हम सबको पता होता, हम किसी भी हाल में कल सुबह वापस चले जाएँगे। हमसब सारी रात एकबार फ़िर साल भर की विदाई के लिए ख़ुद को तय्यार कर रहे होते। और हरबार की तरह इस तय्यारी में नानी और मम्मी दोनों कुछ कम तय्यार हो पाते। दोनों गले मिलकर ख़ूब रोते। इतना रोते कि एकबार हमारा रुक जाने को मन हो आता। पर रुक न पाते। उस ढलान पर पहुँचते-पहुँचते जो अब लौटते वक़्त चढ़ाई बन जाती, यहाँ आकर सबर की सीमा एकबार फ़िर टूट जाती। दोनों रहरह एकबार फ़िर घूँघट में छिपकर रोतीं और एकदूसरे के आँसू पोंछतीं। नाना और बड़े मामा वहीं दुआरे सबसे पहले छूटने वालों में होते। नानी साल भर के लिए वहीं फ़िर छूट जाती। मामा कुछ कदम और चलकर छूट जाते। हमारे साथ बस हमारी मम्मी होतीं। कितनी ही सारी यादें रास्ते भर उन्हे अंदर-ही-अंदर सालती रही होतीं। उनकी आँखों में बस चाचा के घर लगा अमरूद का पेड़ और उन इमलियों की उदासियाँ रह जाती, जो कभी वह ख़ुद इतनी ऊँचे चढ़ कर तोड़ लातीं। 

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