मई 22, 2015

पुल

वह पुल एक शांत पुल था। किसी नदी के ऊपर नहीं। दो इमारतों के बीच हवा में टंगा हुआ-सा। वह हमारे बचपन से पता नहीं कितने सारे तंतुओं को जोड़ता एक दिन गायब होता गया। उसका अस्तित्व हमारे लिए उतना ही ज़रूरी बनता गया जितना कि हमारे फेफड़ों में भरती जाती हवा। उसका चले जाना उन धागों का टूट जाना रहा। वह दिनों के बीतते जाने के साथ हमें बुनता जाता। उसने पढ़ने के लिए कहीं दाखिला नहीं लिया। हमें यह भी नहीं पता कि कभी उसने हमसे रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो, चटकाय सुना होगा। पर वह चला गया। उसका जाना उन नदियों के ऊपर बने पुलों से  पानी का रुक जाना रहा। वहाँ उमड़ते-घुमड़ते मौसम का ठहर जाना रहा। वह सब कुछ देर ठहरकर तस्वीर से बाहर आकर ठहर गए।

कई मौसमों के सही मतलब हम उसके ऊपर चहलकदमी करते हुए जानते रहे। कोयल से लेकर मोर तक वहीं हमारा इंतेज़ार करतीं। आम की बौरें सबसे पहले इससे ही पेड़ पर झूलती दिख जाती। उसकी छुपी हुई पखुड़ियों के बीच से झाँकते छोटे-छोटे अधपके आम, वहीं से हमें देखते रहते। हम उसे तबसे देखते रहे, जब उसकी डेढ़ फुट की दीवार, हमारी आँखें अपने पंजो के सहारे खड़े होकर भी नहीं लाँघ पातीं।  

यह दोनों इमारतों के बीच एक संवाद की असंभव संभावना बना रहा। जैसे दीवार में खिड़की रहती है। यह मानवता के इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धि रही होगी। इसने सैकड़ों पहाड़ियों के उतार-चढ़ाव नदी-नालों की दूरियों को समेटकर दूर दिखने वाली जगहों को कितने पास लाकर खड़ा कर दिया। पहाड़ इतने निकट आकर कितने खुश हुए होंगे। सदियों से चुपचाप खड़े थककर ऊबते रहे। अब वह उस एकांत को भर सकते थे। सुख-दुख के साथी बनकर जीने का मतलब उन्होने पहलीबार पुल के आने के बाद महसूस किया। महसूस किया के उनके अंदर कितनी बातें अनकाही रह गयी हैं। वह उनके अंदर दिल तक उतरने वाली सीढ़ी बनकर आया। यह कोमल क्षण उन दोनों के अनछुए एहसास की तरह उगता रहा। उगता रहा हमेशा कुछ कहने की संभावना का एहसास।

हम सबने मिलकर इसे रेलवे स्टेशनों की परिधि में बने उन ख़स्ताहाल ढहते कैबिनों की तरह प्रयोग के लिए कभी अयोग्य घोषित नहीं किया। हम उसपर रोज़ लगभग अनगिन बार गुजरते। पता नहीं कितनी बिखरी यादें उसके मलबे में पड़ी वहीं रह गईं। हम दसवीं के पेपर देकर फ़ुरसत से खाली थे। गर्मी में बेजान से कुछ जादा। पर बिलकुल उदास। उसने कभी हमें वहाँ आने से मना नहीं किया। यह उस पुल का वही दौर रहा, जब वह एक प्रेम कहानी अपने इर्दगिर्द बुनता रहा। पाँच साल हुए उन दोनों की शादी हुए। एक लड़का भी है उनका। नाम पता नहीं क्या रखा है। हम रात दो-दो बजे तक वहीं उसके साथ खड़े रहते। न वह थकता। न हम। न जाने कितनी रातें वह हमें हमारी बोझिल बातों को सुनता रहा। न हँसने वाली बातों को भी अपने अंदर समेटता रहा। समेटता रहा उन दिनों अकेले रह जाने का एहसास। 

एक हिसाब से वह हमसे उम्र में बड़ा रहा होगा। हम जब नहीं थे, तब वह था। उसदिन जब ठेकेदार के कहने पर वह मज़दूर भारी-सा हथौड़ा लेकर उसे तोड़ता रहा, तब भाई और मैं कमरे में सोते रहे। वह हमारी नींद में ही जाता रहा और हमें पता नहीं चल पाया। शायद यह उसके चुपचाप चले जाने की कोई चाल रही होगी। कि जबतक हम जागते, वह पूरा चला जाता। पर अचानक आँख खुली। बाहर आया। देखा। वह आधा जा चुका था। अब उसे कुछ मिनटों बाद पूरा चले जाना था। वह रोके से भी नहीं रुकता। उसने किसी को बताया नहीं कि वह जा रहा है। हम उसके जाने के दिन भी उससे नहीं मिल सके। उसने अपने जाने के ठीक पहले की शाम, अलविदा भी कहने नहीं दिया। वह उस ढलती शाम के अँधेरे में एक अधेड़ बूढ़े मेहमान की हैसियत ओढ़कर चुपचाप चलता गया और हमारी आँखों के सामने हमेशा के लिए ओझल हो गया। वह हमसे मिलने के लिए कभी लौट नहीं पाएगा। लौटना चाहे, तब भी नहीं। कभी नहीं।

सब उसके चले जाने के बाद अपनी साँसों की उलझनों को लेकर अपने अंदर छिप गए। पापा भी एकबार पूछ चुके हैं, कोई पहले की तस्वीर है उसकी। कल से पहले की। जब वह पूरा खड़ा है। रामसरन कहते, वह तो राख़ और चूने के जोड़ से बन था। यहाँ सबकुछ ढह जाता, पर इसे कुछ नहीं होता। यहसब बातें यहाँ इसलिए भी लिखे दे रहा हूँ क्योंकि यह कोई ऐतिहासिक पुल नहीं रहा। इसे यह इस किताब के अलावे किसी किताब में जगह नहीं मिलने वाली। फ़िर सारे इतिहास का समाजशास्त्र तो इसी जगह के छिकाए जाने, थोड़ा सरक जाने के बीच है।

{तस्वीर तबकी है, जब वह आधा जा चुका था। आधा जाने वाला था। पर अब कहीं नहीं जाएगा। वह यहीं रुक गया है। चुपचाप।}

2 टिप्‍पणियां:

  1. आज अतीत का कौनसा दरवाज़ा खुल गया।

    सब बेहतर। खूब बढ़िया।

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    उत्तर
    1. यह वर्तमान में घटित होता अतीत है। हमारी मर्ज़ी हो न हो, उसे होना है।

      हटाएं

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