जून 09, 2015

आज कल

बड़े दिनों बाद आज अपने बारे में सोचता रहा। सोचता तो हमेशा रहता हूँ। पर आज लिखने के लिए थोड़ा अलग तरह से अंदर की तरफ़ लौटने लगा। जून की तपती दुपहरे कहीं जाने नहीं देतीं। फ़िर भी दोबार निकल गया। हम लोग घंटों वहीं आर्ट्स फैकल्टी की अँग्रेजी मेहराबों के बीच में पुराने दिनों को पलटते रहे। कैसे-कैसे दिन थे। इन्ही गलियारों में क्लास ख़तम होने के बाद हमसब अपने-अपने दोस्तों के साथ होली के रंगों की तरह बिखर जाया करते। आज न जाने कौन, कहाँ, किस जगह पहुँच गया। जिसे हम देखा करते, जो हमें देखा करती। सब यहीं कहीं आस-पास की दुनिया में खो गए होंगे। लड़कियाँ अपनी शादियाँ टाल नहीं पायी होंगी और हम लड़के खींचते-खींचते उसे पिछले साल तक खींच लाये होंगे। पता नहीं इस छह सालों में फ़िर उन्ही कमरों में कौन-कौन आकर अपने अपने तहख़ानों में वापस लौट गए होंगे। हम भी वहाँ से सिर झुकाये, बीत गए पलों को बटोरकर वापस लौट आए।

उसकी ट्रेन इतवार शाम की रही होगी या सुबह की। वॉट्स अप पर इस बहाने से उसका पता माँग लिया के कभी ख़त लिखुंगा। मुखर्जी नगर मुझे ऑटो पर बिठाकर वह इतनी तेज़ी से चलकर भीड़ में गायब हो गया। यह बिंब मेरी आँखों के सामने अभी भी घूम रहा है। कैसे मैं लड़के-लड़कियों में जनपथ से खरीदी टी-शर्ट के उस लाल सफ़ेद रंग को ढूँढ़ता रहा। वह गायब कैसे हो सकता है? जबकि अभी थोड़ी देर पहले ही हम दोनों इसबात पर सहमत हुए थे कि पैर अब जवाब दे गए हैं। हम दोनों इस गर्मी में खूब चलकर थकने भर का थक चुके थे। अचानक मेरी नज़र उसके रेबैन के चश्में पर गयी। हाँ वही है। पर पता नहीं क्यों वह इतनी जल्दी उस भीड़ में गुम हो जाना चाहता है। शायद हम सब इस भीड़ में गुम होने ही आए हैं। एक दिन हम सब खुद से बचने के लिए ऐसे ही गुम हो जाएँगे। हम सब गायब हो जाएँगे।
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जब पढ़ते-पढ़ते ऊब जाता हूँ, तब सोचने लगता हूँ, हमसब एक ही दौड़ में भाग रहे हैं। कहीं कोई ऐसी जगह मिल जाए जहाँ हमसबकी ऐसी यादें इकट्ठी होती रहें, जो जब चाहें, हमें उन दिनों में दोबारा ले जाएँ। पर काश ऐसा हो पाता। कितना ही कोशिश करूँ, पर ऐसा कभी कर नहीं पाया। अगर होता तो सबसे पहले उसे अपने ख़्वाबों में लाता, जिससे मेरे दिन दिन न रहकर ठंडी शामों में तब्दील हो जाते। हम कहीं किसी सुनहरे से ढलते सूरज की चाँदनी एहसास में डूबते हुए कहीं नीचे गहरे उतर जाते। तुम अब भी मेरे पास हो पर न जाने क्यों यह शामें कहीं पीछे रह गईं। दो क़दम पीछे। तीन क़दम आगे। ऐसे ही बहुत सारे ख़याल वह भी अपने अंदर समेटते हुए बड़ी तेज़ी से ढक्का के अपने उस शांत से कमरे में लौट आना चाहता होगा। उसने मुझे बताया नहीं। पर उसके मन में चल यही रहा होगा। हमेशा, धीरे से।
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ख़ैर, मैं बहुत जल्दी इन ख़यालों से वापस आकर उस शाम से काफ़ी पहले अपनी एक पोस्ट पर आकर ठहर गया। उसकी शुरू की तीन पंक्तियाँ नवभारत टाइम्स के ब्लॉग होस्टिंग साइट पर हू-ब-हू देखकर लगा, कोई कैसे बिलकुल मेरी ही तरह उन एहसासों को अपने भीतर महसूस कर, उन्हे वैसे ही अपने अंदर से बाहर निकालकर सामने रख सकता है। बात करने पर उसने कहा, आपको साभार नहीं दे पाया। बात ख़त्म। क्या सच में बात ख़त्म हो गयी। पता नहीं। उसे शायद नहीं पता, उन पंक्तियों को लिखने से पहले कितनी घड़ियाँ मैंने उनका इंतज़ार किया होगा। वह जैसी दिखती हैं, उसके पीछे वह शायद ही कभी पहुँचकर मुझे देख पाएगा। उसे नहीं पता उसे लिखने के बाद भी कितना कुछ मेरे अंदर अभी भी उमड़ता घुमड़ता रहा है। यह हमेशा दिख जाए हो नहीं सकता। उसे नहीं पता। उसे कुछ नहीं पता।
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परसो राकेश की शादी की पाँचवी सालगिरह है। वह हम सबको बुलाने की फ़िराक़ में है। शायद यह दूसरी बार है, जब हमसब एकबार फ़िर दो साल बाद, यहीं दिल्ली में मिलेंगे। यह उनका तीसरा कमरा है। दिल्ली कभी उन दोनों का सपनों का शहर थी। अभी भी वह सपनों का शहर बनी हुई है। हक़ीक़त जल्दी होने वाली है। उसके लिए एक आख़िरी दौड़ बाकी है। दौड़ शुरू हो चुकी है। हम सब एक दिशा में भाग रहे हैं। भागते भागते थक रहे हैं। लगातार हाँफते हुए भाग रहे हैं। पर मान नहीं रहे कि थक रहे हैं। थक गए हैं। बस हाँफ रहे हैं।
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इधर मैंने कल से फ़ेसबुक पर हैशटैग के साथ लिखना शुरू कर दिया है। मेरा रूट हैशटैग है, किस्सा कोताह राजेश जोशी की किताब का नाम है। उसके बाद जो जब मनमें चल रहा हो वही छापने का मन हो तो उसे वहाँ शेयर करता रहूँगा। फ़िर यह भी तो देखना है, मुल्ला की सैर किस मस्जिद तक। अपने आप को टटोलने का एक तरीका यह भी है। देखते हैं, कहाँ तक अपनी सीमाओं को तोड़कर नयी सीमाएं कौन सी बनती हैं। अभी फिलहाल अपने फ़ेसबुक पेज पर एक सौ दस लाइक देखकर, थोड़ा उन सबके बारे में सोचने लगता हूँ, जिन्हे लगता है कि मैं कुछ ठीक-ठाक कह लेता हूँ। यह कुछ ऐसा ही भाव होगा जो हमारे अंदर तो रहता होगा, पर हम उसे कह नहीं पाते होंगे। शायद। उसे यहाँ देख थोड़ा रुक जाते होंगे। ठहरकर डूब जाते होंगे। डूब जाते होंगे उन छवियों में। शब्दों के पीछे रह गयी तसवीरों में। कहीं कोई आवाज़ सुनाई दे गयी होगी। उन सबको वहाँ कभी शुक्रिया नहीं कहा और शायद इससे बेहतर कभी उनसे कह भी नहीं पाता। कभी नहीं कह पाता। 

6 टिप्‍पणियां:

  1. लगातार हाँफते हुए भाग रहे हैं। पर मान नहीं रहे कि थक रहे हैं। थक गए हैं। बस हाँफ रहे हैं।

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    1. इस वाक्य को लिखने और समझने में ख़ुद उलझ कर रह गया था। पर संभाल लिया।

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन दर्द पर जीत की मुस्कान और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  3. मन के कोनों को छूती पोस्ट...
    आपका अपने ब्लॉग पर कमेंट पढ़ा तो यहां तक पहुंचा हूं। कई बार भीड़ में खोए हुए कितनी चीजें हमसे गुम रहती हैं..ये ब्लॉग कुछ वैसा ही ठिकाना लग रहा है जो अबतक छिपा था मुझसे।
    आपका शुक्रिया।
    फेसबुक पर आप मिल नहीं पाये..अगर ईमेल हो तो वही दें..संपर्क करने की इच्छा है।

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    1. 'छिपना' भी एक तरह से 'दिखाई देने की प्रक्रिया' का अनिवार्य हिस्सा है। ख़ैर, मैं फ़ेसबुक पर हूँ।

      अभी वहाँ गया तो देखा, मिल गया हूँ..:)

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