जून 15, 2015

अदम गोंडवी और बहराइच हमारा

मुझे पता है, इनके नाम के आगे जो गोंडवी लगा है, इसका कुछ भी लेना देना गोंड जनजाति से नहीं है। यह बहुत सरल-सा उपनाम है। गोण्डा के आटा परसपुर के अदम गोंडवी उर्फ़ रामनाथ सिंह का कोई कविता संग्रह अभी तक मेरी पहुँच में नहीं है। कुछ कवितायें कहीं पढ़ी थीं, उनमें एक जगह कबाड़खाना भी रही। एक लंबी कविता थी। अभी उसे गूगल पर ढूँढा तो मिल गयी। शुरवात ऐसे होती है उसकी:

आइए महसूस करिए जिन्दगी के ताप को/
मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको

पता नहीं हम कितने छोटे रहे होंगे, जब एक बारात में आटा परसपुर गए। तब की हमारी जानकारी भी कहीं नहीं रही होगी। मिलना तो बहुत दूर की बात है। जनसत्ता के रविवारी में भी कभी इनपर पूरा पन्ना आया था। पता नहीं वह अभी भी पीले पड़ते अख़बारों के ढेर में अलमारी के ऊपर है भी या नहीं। और यह भी नहीं पता इस वाणी से छप रहे कविता संग्रह में यह कविता है के नहीं कह नहीं सकता।

फ़िलहाल राजकमल से भारतेन्दु पर नए दृष्टिकोण वाली वसुधा डालमिया की अनूदित किताब (जिसे छवि भंजक भी कह सकने की सुविधा हम ले सकते हैं) का इंतेज़ार है। और इंतज़ार है, कभी हमारे बहराइच से भी कोई कहानी किसी बड़े प्रकाशक से छप जाये।

वैसे हुस्न तबस्सुम निहाँ की कहानियाँ कुछ हैं भी; तो उनमें न नानपारा है, न ठीक से रिसिया। पता नहीं शायद मैं किसी और चीज़ को ढूँढ रहा होऊंगा। कुछ कुछ नॉस्टेलजिया जैसा। या कुछ और। वरना हंस में छपी इनकी कहानी कुछ कम नहीं रही। ख़ैर आप कबाड़खाना  पर इनकी कविता पढ़िये।

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