जून 19, 2015

लुगदी साहित्य की वापसी का अर्थ

जिस तरह एकबार फ़िर साहित्य में 'लुगदी' साहित्य की 'यक्ष प्रश्न' की तरह वापसी हो रही है, उससे लगता है, हम कहीं-न-कहीं अपने अंदर किसी हीनग्रंथि से उबर आने के लिए छटपटा रहे हैं। इतने बड़े क्षेत्रफल में विचरने वाली भाषा के पास  कोई ढंग का बिकने वाला एक लेखक भी नहीं है। यह हमारे भीतर अपनी भाषा के 'पल्प लिट्रेचर' में एक चेतन भगत, अरविंद अडिगा, शोभा डे, पाओलो कोएल्हो, जॉन ग्रिशम, अगाथा क्रिस्टी तलाशने की मर्मांतक तलाश है।

इसतरह पहले दबाये गए नॉवेल की पूरी जमात के दोबारा उभार को अनुराग कश्यप और उस स्कूल से निकले फिल्म निर्देशकों की रौशनी में भी पढ़ा जाना चाहिए, तब हम समझ पाएंगे, यह खोज अचानक ही नहीं हमें सुरेन्द्र मोहन पाठक के 'कोलबा कॉन्सपिरेसी' और 'जो लड़े दिन के हेत' से होते हुए हार्पर कॉलिन्स तक पहुँचा देती हैं। रवि बुले की किताब 'दलाल की बीवी' उसकी अगली खिड़की है।

कई इब्ने शफ़ी, गुलशन नन्दा, वेद प्रकाश शर्मा सरीखे होंगे, जो कहीं किसी रेलवे स्टेशन की दुकान पर किताबों के बीच दबे रह गए होंगे, अब साँस लेने के लिए बाहर निकलेंगे।

{तहलका हिन्दी का लुगदी साहित्य पर विशेषांक

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