जुलाई 05, 2015

बातें बे-वज़ह

यह मेरे ऊपर किसी बोझ की तरह है। रूई के बोझ की तरह। मेरी रूई बार-बार भीग जाती है। बार-बार वापस आकर अपने लिखने को देखने की प्रक्रिया में लगातार उसे घूरते रहना, कितना पीड़ादायक अनुभव रहा होगा। ख़ुद अपने आप में यह कोई मौलिक सवाल नहीं है। कई लोग कभी इस पर बात करने की फुर्सत से भर भी नहीं जाते होंगे। उनके लिए यह बहुत ही गैरज़रूरी जवाब की तरह है। कोई क्यों लिखता है? इससे पहले हमें यह पूछना चाहिए, हम क्यों लिखते हैं। इस सवाल का कोई बना बनाया रेडीमेड जवाब नहीं है। यह शायद ख़ुद के भीतर डूबते-उबरते जाने के बाद हासिल होते रहने की अनदेखी घटना है। ज़रूरी नहीं इस मर्तबा भी हम उसी पिछली बार वाले मोड़ पर मिल जाएँ। किसी तरह उनसे दो कदम आगे बढ़ते हुए, एक कदम वापस लौट जाने की तरह। बिलकुल दोहराते हुए।

यह बात मेरे अंदर न जाने कब घर कर गयी। चींटीओं के अपने ऊपर रेंगते जाने की तरह यह जो सब यहाँ लिख जाता हूँ, वह सच रहता है या झूठ। दिबाकर बनर्जी के ब्योमकेश किसी से कह रहे हैं, ‘सच के पास वाले झूठ कभी पकड़ में नहीं आते’। पर क्या फ़रक पड़ता है। मालुम नहीं।

शायद हमसब इन बीतते सालों में ऐसे होते जाते हैं। हम चाहे न चाहें। यह होकर रहेगा। एक तरह से नियतिवाद की तरह। सच में झूठ की तरह। घड़े में रखे पानी के जैसे। हम सब परचून की दुकान के परचूनिये ठहरे। नमक में चीनी, अचार में कटहल कभी पकड़ में नहीं आते। मुझे भी कोई नहीं पकड़ पाएगा। कोई नमक का दारोगा भी नहीं। पकड़े जाना चोर-सिपाही के खेल का ख़त्म हो जाना रहेगा। अभी इतनी जल्दी पकड़े जाने का मन नहीं है। अभी तो ख़ैर, खेल शुरू हुआ है। ख़ूब खेलना है। छिपकर। बिन दिखे। इसलिए छिप जाओ, अपनी परछाईं के नीचे। अक्सर झख़रे से अढ़री झार के छत पर सुखाते हुए कोई देख भी नहीं पाता। बदरिया घाम में कौन आ रहा है ऊपर।

इसतरह एकबार फ़िर मेरी नज़रें, मेरी तरफ़ हैं। इलियट की नज़र में यह ‘निर्वैयक्तिकता’ होगी, पर मेरी दृष्टि से यह एक नितांत निजी परिघटना है। जितनी बारीकी से इसके सौन्दर्यशास्त्र को हम चिन्हित कर सकते हैं, दूसरा वहाँ की टोह भी ले पाये तो बड़ी बात होगी। इस पूरी रचना प्रक्रिया में भाषा और उसकी संरचना के भीतर जो वाक्य विन्यास ज़िंदगी के इस पड़ाव में मेरे अंदर दाखिल होते हुए, जिस तरह मुझे ख़ारिज करते जा रहे हैं, वह भी कुछ कम हैरतंगेज़ नहीं है। यह शिल्प, रूप (फ़ॉर्म), अभिव्यंजना के साथ व्यक्तित्व का भी प्रश्न है। यह दिन के रात और रात के शाम में तब्दील होने से पहले ख़ुद का और उन तमाम संरचनाओं का पुनरुत्पादन है।

यह सवाल लगातार उन सवालों को अपदस्थ करते जाने का है, जो हमारे बाहर भी एक दुनिया गढ़ रहे हैं। उस दुनिया के संकट, संघर्ष, जिजीविषा, उद्वेलन, भाव, संवेदनाएं बिलकुल भिन्न धरातल पर अपनी सामाजिक निर्मितियों के साथ उपस्थित हैं। इसके होने न होने से कोई फ़र्क नहीं पड़ रहा। ऐसा कहकर हम इसे खारिज नहीं कर रहे न ही इसका अवमूल्यन कर रहे हैं। बस उस दिन की बात से निकलती तकरीर यही थी कि हमारे अंदर पैदा होते सवालों में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि मैं अपनी अभिव्यक्ति में ऐसे औजारों को नहीं देख पाता, जो उसे किसी कालखंड विशेष में स्थित करते हों। पर शायद यह हमारी तंगनज़री है या भाषा की सीमा। लेकिन यह इतना ज़रूरी क्यों है? या फ़िर बात इससे कुछ और आगे जाना चाहती होगी पर उसके शब्दों से निकलते भाव इतना ही समझा पाये। वरना वहाँ आसानी से इन सारी बातों को पहचानने के उपकरण हमेशा से मौजूद रहे हैं। एक लड़का जो इन शहरों में ख़ुद को साबित करने की दौड़ में बेतहाशा तो नहीं पर भागते-भागते थककर इतना ज़रूर हाँफ रहा है कि उसका दम अब फूलने लगा है। अब भी वह अपनी मंज़िल तक पहुँचा नहीं है।

हो सकता है, वह कुछ दूर चलकर उसे छू ले; पर यह इंतज़ार उसे कचोट रहा है। अंदर-ही-अंदर वह पिघलता जा रहा है, पर इसका इस्पात बनता नहीं लग रहा। अतः वह लौह पुरुष भी नहीं है। फ़िर यह कोई सवाल भी नहीं है जो कभी परीक्षा में कभी पूछा जाएगा। यहाँ एक बात और उसके ज़ेहन में लगातार उमड़-घुमड़ रही है। वह यह कि उसके कमरे, चारदिवारी, मकड़ी के जालों, छिपकलियों, अकेलेपन, असफलताओं, अधूरे सपनों, शहर, उन बीत गए कलों में लौट-लौट जाने ज़िद, यहाँ कहीं न ठहरने का मन कभी किसी तारीख़ का हिस्सा बन पाएगा। उसकी इतनी बेतरतीबी, बेखयाली, उलझेपन को कभी कोई समझने के लिए वापस लौट पड़ेगा या तहरीर का हिस्सा बनने से पहले ही इसकी ‘सामाजिक उपयोगिता’ शून्य बताकर इसे भी कहीं नज़रबंद कर दिया जाएगा। या काला पानी की सज़ा देकर किसी अनजान से द्वीप की अकेली, कड़वी, शांत, चितकबरी, स्थितप्रज्ञ कालकोठरी में बंद कर भुला देने की साज़िश रची जाएगी।

उस चारदीवारी के भीतर भरी सीलन में मेरी बातें, मेरे सारे एहसास उमस बनकर या तो पसीने का नमक बन जाएँगी या भाप बनकर किसी बादल का हिस्सा। फ़िर उसे हवाएँ अपने साथ न जाने किन-किन दिशाओं में लेजाकर बरस जाएँगी। उस पानी से जो फ़सल बनेगी, वह किसी का पेट भरेंगी या उष्ण कटिबंधीय आमों की नाज़ुक-नाज़ुक कलमें तरतीब से कहीं बगिया में पेड़ बनकर किसी दिल को तपती गर्मी में छाया बनकर छा जाएँगी। या उस खाली कुएँ में एक बूँद बनकर गिर जाने में ही उसकी सार्थकता होगी। अगर इनमें से कुछ नहीं हो पाएगा तो मैं चाहूँगा वह सेमर का पेड़ बन जाये, जिसकी रूई से कोई तकिया बना ले। चाचा के पास है। नींद बहुत अच्छी आती है इसपर।

{04/07/2015: 10:30 a.m. }

1 टिप्पणी:

  1. फ़्रांज काफ़्का ने कहा था ' क़लम का प्रयोग हिम-कुदाल की तरह हमारे अंदर (जमे) समुन्द्र को तोड़ने के लिए करो।

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