जुलाई 07, 2015

तुम्हारी शक्ल के सपने..

शहरों में जो लोग अपने सपनों के साथ दाखिल होते हैं, कभी कोई उनसे उनके सपनों के बारे में नहीं पूछता। उन्हे कहीं कोई ऐसा भी नहीं मिलता, जो उन अधूरे सपनों को किसी किताब में लिखकर, किसी जगह कतरन बनाकर अपने पास रख ले। कभी कोई होता, जो उस किताब को पढ़कर अपने जैसे सपने देखने वाले की तलाश में निकल पड़ता। उसे ढूँढ़ता, मिलता, बात करता। सुख-दुख का साथी बनता। मैंने जो कोशिश की वह उस अनुपात में बहुत छोटी साबित हुई। जितना करना चाहा, नहीं कर पाया। एक दिन ऐसा आया जब अपने पास देखता हूँ, तब पता चलता है, एक एककर सब दोस्त यहाँ से चले गए हैं। किसी के सपने की याद मेरे पास जमा नहीं है। एक थी, वह पानी में भीग गयी।

दिल्ली तुम्हारे लिए कैसा शहर रहा होगा? इसे तुम्हारे अर्थों में ‘सपनों का शहर’ कहना, अपने अंदर के भावों को समेटकर कहीं चोर जेब में रखकर भूल जाना है। धीरे-धीरे तुम इस सपनीली दुनिया के बाहर निकलते हुए, बहुत निर्मम अमानवीय दुनिया में चले गए। जहाँ अधूरे, असमाप्य, अंतहीन सपनों की काली अँधेरी सुरंग है। सब ख़ुद को जिंदा रखने की जद्दोजहद में उन तमाम असफलताओं को अपने कन्धों पर रखे हुए तिल तिलकर मर रहे हैं। कन्धे थक जाते हैं, तो कहीं उतारकर रख भी नहीं सकते। वहाँ उन सपनों को टाँगने के लिए कोई सुविधाजनक खूँटी नहीं रहती। कील, हथौड़ी, अद्धा, सरिया कुछ भी ले जाओ, सबमें जंग लग जाता है। सब गल जाते हैं। पिघलकर मोम बन जाते हैं। मोम इतना गरम कि चिपक जाये तो खाल खींच ले। इसलिए ज़रा बचकर। इसका तिलिस्म इतनी जल्दी नहीं टूटता।

इन बीते सालों में लगता है, तुम कहीं डूबते रहे हो। जैसे उस शनिवार इटारसी होते हुए दिल्ली आते वक़्त तुम्हारी ट्रेन कैंसिल हो गयी, और जनरल बोगी में सफ़र करते हुए यहाँ पहुँचे, वैसे ही तुमने अपनी नींद से सारे सपने कहीं किसी और रूट पर भेज दिये हैं। वह भी अपनी मंज़िल पर पहुँचेंगे, पर थोड़ा वक़्त लगेगा। लेकिन इससे पहले, तुमने जो अपने ख़्वाब उन पटरियों से बहुत दूर कहीं छिपा लिये हैं, उन तक एकबार फ़िर लौट जाओ। पर मुझे पता है, तुम कभी कोई ख़ास कोशिश नहीं करते। शायद उन खचाखच भरे डिब्बों की भीड़ तुम्हारे मन में घर कर गयी। सोचते होगे, कैसे उनके बीच ख़ुद को ढूँढ़ता फिरूँगा। पर दोस्त, क़दम तो बढ़ाओ। धीरे-धीरे सही। पर बढ़ाओ।

लेकिन इसतरह सोचने पर तुम मेरी समझ में नहीं आते। तुम इन सबमें से क्या हो, पता नहीं। शायद लौट गए हो, एकबार फ़िर लौट आने के लिए। तुम ऐसे भी हो। इस भागदौड़ में अपनी उमर लगाने के बाद दोबारा से तय्यार होने में वक़्त लगता है। कर लो तय्यारी। हमें पता है, तुम एक दिन लौटोगे अपनी सपनीली दुनिया में। जैसे तुम लौटे थे प्यार में। तुम मनमौजी होते तो प्यार नहीं कर पाते। कितनी गलत-सी निर्णयात्मक पंक्ति है यह तुम्हारे लिए। तुमने अपने मनमौजीपन को स्थगित करके प्यार किया। शर्तिया उसका स्थगन काल बहुत लंबा रहा होगा। कुछ अटके होगे, पर रुके नहीं होगे। लेकिन मेरे लिए आज भी यह बहुत उलझा देने वाला सवाल बना हुआ है। कि हमसब मनमौजी पहले बने होंगे या आशिक? ख़ैर जाने दो, नहीं पूछता। नहीं पूछ रहा, ख़ुद से भी। कि अभी सही वक़्त नहीं है।

वैसे भी यह कोई वस्तुनिष्ठ प्रश्न तो है नहीं, जिसके चार चोर दरवाज़े दिये हों और हमें किसी एक से बाहर निकलने के लिए उनमें से एक को चुनने की आज़ादी हो। तुम्हारी कहानी दो दीवाने शहर में ’ से छटाँक भर भी कम नहीं है। रत्ती भर कुछ जादा ही रहेगी हमेशा। ऐसे ही तुम्हारे सपने भी है, कुछ रत्ती बार जादा। तुम भले ‘चश्मेबद्दूर ’ की स्क्रिप्ट में रुके रहो। तुम्हें अपनी ‘मिस चमको ’ मिल गयी है। यह अकेले तुम्हारी कहानी नहीं है। तुम दोनों की कहानी है। संभावनाओं को हमेशा बचाए रखने की असीम संभावनाओं के बीच बचे रहने की रूमानियत है। इसके किरदार तुम दोनों हो। पता नहीं यह कब शुरू हुई होगी। शायद उस जीप में बैठे तुम दोनों किसी और ही दुनिया में जा पहुँचे होगे। दोनों अवचेतन में कहीं उससे बहुत पहले बहुत दूर चल जाने के लिए तय्यार हो गए होंगे। या जब उस कुर्सी पर बैठे अपना पहले प्रेम पत्र लिख रहे होगे तुम। जन्मदिन तुम्हारा है, पर मुबारक़ दोनों को दे रहा हूँ। दोनों ऐसे ही साथ साथ बने रहो। हमेशा। मुसकुराते रहो। अब तो साथ जूनियर भी है। और ऐसा भी नहीं है कि इतना सब होने के बाद भी ज़िन्दगी कुछ कम रंगों वाली रही है।

{दो मिनट बाद सवा चार बज जाएँगे और पता नहीं तुम वहाँ क्या कर रहे होगे। तुम्हें पता है, यहाँ दिल्ली में कल से बारिश हो रही है। अभी भी बादल हैं। शायद कल की तरह जब पानी भरने जाऊँ, तो बरसने लगें। वहाँ बादल क्या करवट ले रहे होंगे, तुम जानो। }


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