जुलाई 11, 2015

बारिश

{यह भी बारिश में होने की एक स्टीरियोटाइप कहानी है। छोटी-सी कहानी। बारिश के पानी में भीगते हुए भागने की कहानी। उनके पास छाता नहीं है, जिसे हम छतरी कहते हैं। इसलिए दोनों भीग जाएँगे।}

 बूँदें थीं, कि रुक नहीं रही थी। उन्हे तीन दिन हो गए, लगातार। अपने वजन को सहन न कर पाने पर उन्हे बरसना पड़ता। बरसना, दिल धड़कना रहता। वह दोनों इस मौसम से सबसे जादा प्यार किया करते। ठंड के बाद यह दूसरा मौका आता, जब दोनों सिकुड़कर एक-दूसरे में आराम से समा सकते थे। दोनों इस धरती से भी जादा आपस में प्यार किया करते। दोनों कभी साथ नहीं पढ़े। इसलिए अब एक-दूसरे की आँखें पढ़ रहे हैं। यह उनके रोमेंटिक होने का पहला सबूत था,  अभी कुछ देर की वॉकिंग के बाद इंडिया गेट पहुँच जाना दूसरा सबूत होगा।

वह करें भी तो क्या करें? लड़का-लड़की जब साथ होते हैं, ऐसे ही मौसमों की अनदेखी खूबियाँ जान जाते हैं। यह दोनों भी जान गए होंगे।

होती हर मौसम की होंगी, पर इन बूंदों का मन पर कुछ इसतरह असर होता कि अंदर काली चींटियों की तरह कुछ रेंगने लगता। जैसे भुरभूरी मिट्टी से केंचुए रेंग रेंगकर निकलते और आहिस्ते-आहिस्ते लौट जाते। यह गुदगुदी इन बूंदों के अपने ऊपर पड़ने पर और भी महसूस होतीं। इसलिए आज वह गुलाबी सलवार पहनकर आई थी। जिसका मलतब था, आज बारिश में भीगना है।

हाव स्लेव्स में वह हमेशा पारियों की शहज़ादी लगती। आज भी लग रही थी। आज सुबह उसका सपनों का शहज़ादा नाई की ढाबली बंद होने पर दाढ़ी के साथ पूरे दफ़्तर में घूमता रहा। बात-बात में अपनी दाढ़ी चुभाता रहा। वह बहाने बनाने में एकदम शकुंतला देवी ठहरता। उसकी ऐलोवेरा क्रीम की तरह मुलायम, कोमल, गोरी-गोरी बाहों ने तांबे की खामोश चुभन में इस मौसम में पहली बार ख़ुद को सिकुड़ता हुआ महसूस किया। प्रतिक्रिया स्वरूप दोनों ने पहली बार महसूस किया कि अब दोनों तरफ़ समान समानुपात में एक दूसरे को पास लाकर, अपनी बाहों में भरकर किसी पेड़ के पीछे जाकर छिप जाने का वक़्त आ गया है। अब और देर नहीं।

पर नहीं। दोनों तो जुकरबर्ग के लिए प्यार करने यहाँ आए थे। कितना कहा था उसने, सेल्फ़ी-स्टिक ऑर्डर कर दो। पर वह टालता रहा और उसका खामियाजा अब दोनों एक-दूसरे की आँखों में पढ़ते पाये गए। नहीं खिंचवा पाते चिपक-चिपक के फ़ोटो और इससे जादा क्या होता? क्यों ज़िद करके उसे भी दफ़्तर से अपने साथ घसीट लाये। दोनों ने इस परिघटना को स्थगित करते हुए सबसे पहले उसे रवाना करना ठीक समझा। दोनों ने एकसाथ सोचा, मुनिरका की बस शिवाजी स्टेडियम से चल पड़ी होगी। पाँच मिनट में रेल भवन पहुँच जाएगी।

अचानक दोनों बेतहाशा भागते दिख रहे हैं। कैमरे वाला साथी वहीं बुत बना बारिश में भीगता रहा।

वह लड़की का छोटा भाई है। अभी यह बात दोनों के दिमाग में नहीं है। अभी बस एक खयाल है। भागकर इस बरसात में बस मिल जाये। वह एक बार ऐसा भोपाल में भी कर चुके हैं। तब पीछे छूटने वाली लड़के की बहन थी। बड़ा ताल से लौटते हुए न्यू मार्केट की दुकान पर। उनके पास पीवीआर ‘डीबी मॉल’ की टिकटें दो थी। यह गर्मी के मौसम की खोल थी। यह उन्हे वहीं बेमतलब खाली-सी मिल गयी थी।

2 टिप्‍पणियां:

  1. एक बार ऐसा भोपाल में भी कर चुके हैं। तब पीछे छूटने वाली लड़के की बहन थी। बड़ा ताल से लौटते हुए न्यू मार्केट की दुकान पर। भोपाल :)

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