जुलाई 27, 2015

मँझले बाबा नहीं रहे..

जिस उम्र में बाबा हमारी उम्र के रहे होंगे, तब पता नहीं कितने गरीब रहे होंगे। कहते हैं, गरीबी एक दिन सबको लील जाती है। यही आज सुबह उन्हे अपने साथ कहीं ले गयी है और अभी तक उन्हे वापस नहीं लाई है। घूमने के शौक़ीन तो वे शुरू से ही रहे हैं, चल पड़े होंगे। बेधड़क। बिन सोचे समझे। बाबा भी कितने चालक निकले। किसी शातिर सेंधमार की तरह। रात को सोते वक़्त ही मन में ठान लिया होगा, अब वापस नहीं लौटेंगे। लौट कर करेंगे भी क्या? कुछ करने लायक बचे भी तो नहीं। वह सच में बहुत बूढ़े हो चुके हैं। जब आदमी बूढ़ा हो जाता है, तब पता नहीं क्या-क्या सोचने लगता है। इस दो साल पहले की इस तस्वीर में भी कुछ सोच रहे हैं शायद। शायद तब भागने की योजना सफ़ल होते-होते रह गयी होगी। या पता नहीं क्या बात है, जो लड़के की शादी में भी ख़ुश नहीं हैं। बारात ललिया से लौट आई है। शायद वहाँ हुई मारपीट को याद कर दुखी होंगे।

ऊपर सबकुछ कितना धुँधला दिख रहा है। जब बाबा ने इसे देखा, तब उन्होने भी सबसे पहले यही बात कही। लेकिन कोई कितनी ही धुँधली तस्वीर हो, हम ख़ुद को पहचान लेते हैं। उन्होने भी ख़ुद को पहचान लिया। आज यहाँ मुझे सिर्फ़ वही दिखाई दे रहे हैं। कभी अधूरे, कभी धुँधले, कभी खोये हुए से। तस्वीर में गलत जगह होने की टीस से मन में बन गयी गाँठ गिरह बनकर उलझ गयी होगी। खोल रहे होंगे पर खुल नहीं रही होगी। सब कह रहे हैं, कल रात से बाबा इसी तखत पर सोते रह गए। सुबह आई, पर उनकी सुबह नहीं लायी।

बुढ़ापा अपने आप में मृत्यु का हमारी परछाईं की तरह स्पष्ट दिख जाना है। हमें पता है, वह बिलकुल हमारे पैरों के नीचे आ चुकी है पर हम बेख़बर रहते हैं। बाबा भी एक दौर रहा होगा, जब बेख़बर रहे होंगे। यह वक़्त हमारी युवावस्था के दिन होते होंगे, जब ज़िंदगी सबसे जादा ख़ुशनुमा होती होगी। वह भी क्या दिन रहे होंगे, जब वह अपनी पूरी पलटन के साथ बिना रिज़र्वेशन मैलानी से बरेली, बरेली से दिल्ली के लिए बिन सोचे समझे गजरा खरीदने चल पड़ते। सदर बाज़ार से इसी मौसम में घूमते, पैसे कम कराते पाकीज़ा ख़रीदते। कितने बड़े-बड़े पटहर वहाँ इन्ही धागों का काम करते हैं। वे उन्हे जानते भी होंगे, पर कभी उनके यहाँ गए हों, इसके बारे में हमें लौटकर कभी नहीं बताया। जहाँ तक मुझे लगता है, वह कभी गए ही नहीं होंगे। पैसा एक तरह के अलगाव का सृजन करता है। हो तो हम ख़ुद अलग हो जाते हैं, न हो तो हमारी यह इच्छा कोई अर्थ नहीं रखती। आप ख़ुद बख़ुद एक अलग तरह के एकाकीपन में सिमटकर रह जाते हैं।

बाबा शायद इसी से लड़ रहे थे। तभी नानपारा, बाबागंज, उतरौला, भिठीहा, बदला, जमनहा, गिरन्ट और पता नहीं कहाँ-कहाँ से उनके साथ बिरादरी के लोग स्टेशन के पास हमारा घर देख गए और कई सालों तक लगातार वक़्त बेवक़्त यहाँ एक कमरे के घर पर धावा बोलते रहे। यह एक तरह का हमला ही हुआ करता। बहुत सालों बाद जब इस आने-जाने की कवायद से यह स्पष्ट हो गया कि हमारे पापा उनमें से किसी की लड़की के साथ अपने दोनों बेटों की शादी करने में किसी भी तरह की आतुरता से ग्रस्त नहीं हैं, तब लड़कियों के तो ख़ैर दिल टूटने वाली उमर में क्या रहे होंगे, न जाने कितनी लड़कियों की माताओं के दिल टूटकर बिखर गए होंगे। इसतरह सारी बटालियन भंग हो गई होगी और न जाने काल के ग्रास में कहाँ बिला गयी होगी। बाबा ने भी वक़्त के साथ दिल्ली आना कम कर दिया। दिल्ली जो दो क़दम पर थी, वहाँ सालों बाद भी वह वापस नहीं लौट पाये। वह लौटकर एकबार यहाँ आना भी चाहते होंगे, तो भी आ नहीं पाये होंगे। 

पापा हर साल जाते हैं और सुरेस को कहते हैं, ज़रा ध्यान रखा करो। पता नहीं उसने कितना ध्यान रखा होगा। हमसे छोटा है, पर हमारा चाचा है। इधर पता चला उसके ध्यान रखने का अलग अंदाज़ है। चाची को लेने ससुराल जाना है इसलिए बाबा को दुआरे पड़े तखत से उठाकर अंदर लेटा दिया और बाहर से ताला लगाकर दो दिन के लिए गायब हो गया। न उठ पाते हैं, न चल पाते हैं। प्यास लगे तो किससे पानी माँगे। पेसाब लगे तो कौन उठाकर पिछवारे ले जाएगा। इन सवालों से बचने की कौन सी युक्ति उसने अपनाई होगी, अभी तक हमें पता नहीं चली है। पिछले साल हम वही थे, जब बाबा आसाम चौराहे पर चोटाय गए। अपनी पेन्शन लेकर बैंक से लौट रहे थे। सुरेस को कितना बोला था, ज़रा ध्यान रखा करो। एक एक कर पता नहीं कौन सी बातें याद आ रही हैं। गुधड़िया बाबा से लेकर मुहर्रम पर तहजिया निकलने तक। उनका छोटा सा बिसातखाना। कभी एक दौर ऐसा भी रहा होगा, जब कोई ऐसा मेला नहीं रहा होगा, जो उनके पहुँचने से पहले शुरू हो जाया करता हो। भले वहाँ कमाई से जादा ख़र्चा हो जाये पर कोई मेला नहीं छूटता उनका।

हमारे बाबा शांत स्वभाव के रहे। जैसे-जैसे बूढ़े होते गए चुप होते गए। कहते हैं, बोल भी नहीं पा रहे हैं कुछ। तभी रात में ही चुपके से चले गए होंगे। सोच रहा हूँ, अब वह मेले उनके न पहुँचने पर कैसे शुरू होंगे। मेरे पास उनकी कौन सी याद बची हुई है। बहुत सोचने पर याद आया, अभी पार साल उनके हाथों से काले रेश्मी धागों की बनाई करधन पहने हुए हूँ। यह दादी के बाद  दूसरी बार है, जब हम अभी पिछले बुधवार को टिकट बनवाने की बात कर रहे थे कि एक हफ़्ते के लिए सब गाँव चलते हैं। हम यहाँ लैपटॉप पर टिकिट ही देखते रह गए। इससे पहले कि हम वहाँ पहुँचते, आज सुबह गाँव से फोन आ गया। बाबा नहीं रहे। आहिस्ते-आहिस्ते सब जा रहे हैं। बहुत दूर। 

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