जुलाई 22, 2015

नौकर की कमीज़

वह रोज़ रात आधा पहर बीत जाने के आस-पास पसीने से तरबतर कपड़ों में ख़ुद को ढोते हुए लौट आते। लौटना कमीज़ को वापस घर लाने की तरह होता। वह कोई चित्रकार नहीं थे। पर उनके इस कैनवस पर रोज़ अलग-अलग तरह की चित्रकारी होती। कभी बनियान में अरझी सूखी घास का तिनका किसी किले की सबसे ऊँची दीवार पर लगी तोप की तरह लगता। दुनिया की सबसे ऊँची तोप बुर्ज़ खलीफ़ा की छत पर। पर वह किला नहीं है। वह एक झुलसते रेगिस्तान में खड़ी इमारत भर है। इसलिए तोप भी नहीं होगी, यही सोच सब चुप हो जाते। कभी ऐसा होता कि दीवार की सफ़ेदी उखड़े हुए पलस्तर के बुरादे में पेशाब की गंध भी आकर मिल जाती। फिर उसकी अगली सुबह अक्सर अधजली बीड़ी का धुआँ सुबह-सुबह अम्मा की आँखों में कोहरा बनकर बिखरता दिखाई देता। आँखें सिर्फ़ माँ की नहीं दुखती, छत भी उनके साथ रोने लगती। रोना कमीज़ को धोते हुए पानी में भिगोने की तरह सहज होता। वह कभी इसे धोना नहीं चाहती थी। वह इसके एक एक रेशे को उधेड़कर, उसे धागे में तब्दील कर, दोबारा बुनना चाहती। असल में बुनना वह अपनी इस बिखरी हुई ज़िंदगी को चाहती थी। पर इसमें सिर्फ़ वही विफल नहीं हुई थी। बहुत बड़ी दुनिया पहले ही किसी अँधेरे कोने में सिमटकर चुप हो गयी थी। चुप्पी चुप हो जाने के बाद भीतर सन्नाटे के फ़ैलते विस्तार का सूचक थी।

इस घर की दीवारों में चुप्पी सफ़ेदी की तरह पसरी बैठी रही। उसने घात लगाकर सबको अपने क़ाबू में कर लिया था। अब वहाँ कोई पिता से खाने के लिए नहीं पूछता। उनके आने पर सब चुप रहते। वह जब भी लौटते किवाड़ को पल्ला कम और अपनी पिछली दिहाड़ी में टूट गए ठेले की इकट्ठा पड़ी लकड़ी का ढेर समझते। उनके समझने का अगला हिस्सा उनके मन में घटित होता। जहाँ वह सोचते अभी उनके पिलपिले बाजुओं में असीम ताकत आ जाएगी और वह पुराने धर्मेंद्र बनकर उस टूटे हिस्से को उठाकर अम्मा पर टूट पड़ेंगे। यह कूट भाषा इधर कुछ जादा ही प्रयोग में आने लगी। बातचीत में भी उनकी रुचि दिन पर दिन खाना पानी माँगने तक सिमट कर रह गयी थी। वह सब मिलकर इस युग के भर्तृहरि बनते जा रहे थे। इस उत्पीड़ित भाषा का अपना सौंदर्यशास्त्र गढ़ रहे थे, जहाँ सिर्फ़ बेचैनी, हार, कुंठा, गरीबी, डेढ़ कमरों वाली झोपड़ी, घर से पौने सात वोट और उन दिनों में छह बोतल विदेसी शराब का तोहफ़ा मिलता। यहाँ बाकी चीज़ें साँसों के साथ मुफ़्त थीं। जिसने उनके भीतर निराशा, मौत, पीड़ा का मिला जुला दर्द भरा रहता। सपने देखने वाली आँखें फूट चुकी थी और दिल रो रोकर मर चुका था। यहाँ मरना किसी स्थिति को प्राप्त होना नहीं था। यहाँ ज़िन्दगी का ही दूसरा नाम मौत था।

वह रिक्शा चलाते हैं। उनकी आदत है, आखिरी मेट्रो के वापस लौट जाने के बाद आगे पीछे इत्मीनान से सीढ़ी से उतरते लोगों को अपनी आख़िरी सवारी के रूप में देख लेने की तसल्ली कर लेने के बाद, उनमें से किसी को उसके घर पहुँचाकर अपने घर लौटना। वह बीच में किसी लेम्पोस्ट के नीचे पढ़ रहे अपने बच्चों की तरफ़ ऐसे देखते जैसे देखा ही न हो। उनका बड़ा लड़का किसी इम्तिहान में बैठने की तय्यारी कर रहा है। उसने किसी से बात की है। वह कह रहा है, डेढ़ लाख में काम हो जाएगा। जुग्गी, टुटहे ठेले और रिक्शे के अलावे घर में दो बहनों के सिवा अधेड़ हो चुकी अम्मा हैं। कोई उसके पिता को कह रहा था, हरियाणा में उनकी दोनों बेटियों के लिए लड़के देखें हैं। आदमियों की उमर भी कोई उमर होती है। यह सुनने के बाद से अम्मा रो रही हैं और वह सोच रहा है, बहनों के चले जाने से उसका काम बन जाएगा।

{असल तस्वीर इससे भी भयानक है। सच में, सच कह रहा हूँ। इससे अमानवीय तस्वीर आज तक नहीं देखी। तस्वीर पर कर्सर लेजाकर बड़ा करके देखिये। पता चल जाएगा, आप इंसान हैं या इंसान होने का नाटक कर रहे थे अब तक। }

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