जुलाई 03, 2015

पापा खिड़की भूल गए..

क्या लिख दूँ ऐसा कि कभी फ़िर लिखने की ज़रूरत ही न पड़े। बड़े मन से कमरे में दाख़िल हुआ था के आहिस्ते-आहिस्ते मन की परतों को उधेड़ता, कुछ नीचे दब गयी यादों को कह जाऊंगा। कहना क्या इतना आसान होता है हरबार। जो मन में आया, कह दिया? पता नहीं। शायद कभी.. कुछ नहीं।

इसबार दो महीने बीत गए और हम कहीं नहीं गए। वक़्त किसी फुर्सत की तरह हमारी ज़ेबों में नहीं अट रहा था। हमारी जेब कहीं डीटीसी की बस में कट गयी। जेबतराशी ऐसे हुई कि हम जान न सके। अब आगे का सफ़र कैसे होगा इसी सोच में हम डूब से गए। चुंगी ऐसे भी ली जाती है, हमें नहीं पता था। अब पता चल गया। पापा बड़ी मुश्किल से गाँव जाने के लिए एक हफ़्ता निकाल सके। जब शहीद एक्सप्रेस पुरानी दिल्ली से छूट चुकी होगी और अगली सुबह गोण्डा जंक्शन पर सवारियों को उतार कर फैज़ाबाद के लिए आगे बढ़ चुकी होगी। और यही प्रक्रिया लगातार वह दो दिन बदस्तूर वैसे ही दोहरा चुकी होगी, तब ख़याल आया। पापा कुछ भूल गए हैं। क्या भूल गए हैं। पता नहीं। पर पापा भूल गए हैं, यह मुझे बहुत बाद में पता चला। बस कुछ था, जो यहीं छूटा रह गया था। उसे ऐसे यहाँ छूट नहीं जाना था।

असल में पापा खिड़की भूल गए। यह दोनों तरफ़ से खुलती थी। जैसे मन हो, जिस तरफ़ से चाहो। हम भी इसके बाहर झाँककर, उनके लौट आने पर उन जगहों पर दोबारा चले जाते। यह जादुई खिड़की थी। जिसे खोलते और हम भी अदृश्य सुरंग से गुजरते हुए वहाँ पहुँच जाते। पापा हमेशा ऐसे ही करते हैं। अपने मन से कभी अपने झोले में नहीं रखते। हम ही उसकी बैटरी चार्ज करते। मैमरी कार्ड खाली करके उसमें लगा देते। चार्जर ध्यान से वहीं बगल में रख देते। पर इसबार पापा उसे लेजाना भूल गए या हमें रखना याद नहीं रहा। पता नहीं।

वही तो एक बहाना बनती, पर नहीं बन पायी। फ़िर भी यह बहुत अजीब बात है, जब भी हम वहाँ जाते तो उन्ही तस्वीरों को बार-बार अपनी आँखों में भर लेने की ज़िद पकड़ लेते। एकबार फ़िर उन सब जगहों को देख लेना चाहते। इस तरह हरबार लौटकर हमारे साथ कुछ गाँव भी लौट आता। लेकिन इसबार वह वहीं रह गया है। यह शायद ‘नॉस्टेलजिया’ नहीं है। या पता नहीं इसके लिए कोई और शब्द क्या हो सकता है। कोई होगा भी तो मुझे अभी नहीं पता। आपकी नज़र में कोई हो तो ज़रूर बताइये। अगली बार लिख लेंगे। पक्का लिख लेंगे।

कभी-कभी सोचता हूँ, हमारे ‘गाँव’ क्यों बन पाये। हमारे लिए गाँव वह जगह क्यों बनी, जहाँ लौटने के सपने हमारे माता-पिता की आंखोंमें आज भी चमक उठते हैं? यह शहर हमारे होकर भी किसी बेवफ़ा की तरह मौका पड़ते ही दूर छिटक जाते हैं। फ़िर यह गाँव ख़ुद मेरे अंदर उन्ही के रास्ते दाख़िल हुआ। वहीं से ब्याह कर तुम्हें लाये। सोचा, इसी बहाने एक और पीढ़ी वहाँ से जुड़ी रहेगी। हो सके तो वह घूमने की जगह से कुछ जादा इसी तरह बनी रह सकती है। वह हमारे घर में हमारे पैदा होने से पहले भी कोई घूमने की जगह नहीं थी। न हमारे आने के बाद उसके दर्ज़े में कोई परिवर्तन आया। हम भी कभी अपने मन में सोचा करते हैं, मौका लगे तो हम भी वहीं लौट चलेंगे। लौट चलेंगे, उसी सपने वाले गाँव। यह किसी को मात्र भावुकता या कोरी संवेदना लग सकती हैं। पर यह इच्छा आज की दुनिया में जितनी ‘फैशनेबुल’ दिखती है, उसकी तरह उतनी खोखली नहीं है। सच में एक दिन होगा, जब हम सच में लौट जाएँगे।

जिस तरह शहर अपने भीतर जीने के मौके जितनी तेज़ी से कम करते जा रहा है, उस अनुपात में हमारे अंदर लौट जाने का भाव उसी संक्रिया नहीं कर रहा। हम चाहते हुए भी इसे अपने ऊपर हावी होने नहीं देते। शायद असल में यह भी एक सुविधावादी भावुक तर्क है। जैसे सब विदेश से कमाकर नोटों को अपनी छाती में बाँधकर, उससे फुलाते हुए छाती चौड़ी करते अपने देस वापस लौटते हैं; शायद बिलकुल वैसे ही यह शहर हमारे साऊदी अरब या संयुक्त राष्ट्र अमेरिका हैं। हमारे भीतर भी इसी तरह गड्डी कमाकर लौटने का भाव कभी घर कर गया होगा। के बिन पैसे वहाँ लौटा नहीं जाएगा। यही हमारे जन्नत की हक़ीक़त है। हमारे जन्नत में भी नालियाँ बजबजाती हैं। 

फ़िर अचानक यह सब लिखते हुए महेश भट्ट की बनाई हुई एक शानदार फ़िल्म, याद की तरह मेरे अंदर कौंध जाती हैं। बिजलियाँ कड़कने लगती हैं। हवा बौछार के साथ पुरवाई में घर के बाहर लगी टीन को उड़ा ले जाती है। हमारे सपने, बारिश की बूंदों की तरह हमपर आसमान से गिर रहे पानी की तरह बरसते हुए हमें गीला करती जाती हैं। हम भीग रहे हैं। कपड़े गीले हो रहे हैं। आँखों से साफ़ कुछ नहीं दिख रहा। सब धुँधला है। तबतक संजय दत्त पर मकोका लगा गया था, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। पर उस फ़िल्म में परेश रावल सचमुच के विलन लगते हैं। सचमुच के डॉक्टर डेंग। कुमार गौरव अपने छोटे भाई को वापस ले जाने आए हैं। लेकिन हम सबको पता है, असल में क्या होता है? फ़र्जी दस्तावेज़ों के साथ देश छोड़ना आसान है, पर लौटना कितना मुश्किल। वहाँ वापस लौटने की छटपटाहट है, पर लौट आने के रास्ते सीधे नहीं हैं। मैं ख़ुद यह मिसाल क्यों दे रहा हूँ, मुझे नहीं पता। या शायद मेरा अवचेतन अंदर-ही-अंदर मान बैठा है कि यह शहर कभी किसी को वापस लौटने नहीं देंगे। जैसे जोंक हमारे ख़ून पर जिंदा रहती हैं, यह हमारी ज़िंदगियों पर जिंदा हैं। यह हमें छोड़ देंगे, तो ख़ुद मर जाएँगे। फ़िर हम सब भी अच्छी तरह जानते हैं, मरना हम सबको ही है, शहर कभी ऐसे मरा नहीं करते। तो चलो मर जाते हैं।

3 टिप्‍पणियां:

  1. एक बार फिर …. कितना सन्नाटा दौड़ जाता है ज़हन में पढ़ कर।

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  2. एक बार फिर …. कितना सन्नाटा दौड़ जाता है ज़हन में पढ़ कर।

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    1. सन्नाटे में दौड़ जाना, ज़िंदगी को बचा ले जाना है। शायद।

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