जुलाई 31, 2015

पिक्चर पोस्टकार्ड

वह उस कमरे में साड़ी पहनकर खड़ी है। साड़ी कुछ घाघरे जैसी दिखती रही। जैसे कहीं राजस्थान या गुजरात में उसका घर हो। तस्वीर वह खुद भी थी और उसके पीछे दीवार पर भी एक और तस्वीर लगी हुई है। फ़ोटो बहाई मंदिर, लोटस टैम्पल, नेहरू प्लेस की है। शायद हम उन्ही की तस्वीरें लगाते हैं, जिन्हे सबसे जादा अपने ख्वाबों में महसूस करते होंगे। जैसे उसके साथ मेट्रो से फरीदाबाद तक जाने का सपना सपना ही रह गया। वह कभी मेरे लिए ओखला मंडी भी नहीं आई। जैसे उस सुबह सबलोग अनिल कपूर की फ़िल्म, मुसाफ़िर देखने पारस  जा रहे थे। तुम चलते-चलते रुकी और रुक गयी। पीछे मुड़ी। फ़िर मुझे वहीं बैठा देख, तुम नहीं गयी। पता नहीं चार सौ सत्ताइस नंबर बस अब भी कालकाजी कृष्णा मार्केट होकर आती है भी या नहीं। हम आमने सामने बस स्टैंड पर खड़े रहते। देखते जब तक ओझल न हो जाते। सामने से नहीं बस की खिड़की से गर्दन तिरछी करके दिल के अंदर तक उतरती जाती नज़रों के साथ।

उसने कभी अपनी शादी के बारे में नहीं बताया। बस एक शाम अपनी एफ़बी वाल पर कह दिया- उन्हे गुस्सा कभी नहीं आता। इस एक पंक्ति के बाद हमारी अधूरी कहानी वहीं ओखला मंडी पर छूट गयी। 

{अधूरे किरदारों की अधूरी कहानी से..}

3 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. पता नहीं, ऐसा भी होता होगा शायद। पर ज़रूरी नहीं किरदार खुद को कभी रच पाये..;p

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  2. हमारी अधूरी कहानी वहीं ओखला मंडी पर छूट गयी।

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