जुलाई 29, 2015

उदास शाम में दिल्ली होना

जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती जाती है,  हम वापस अपने अंदर लौटने लगते हैं जैसे। जैसे कहीं अनजानी जगह फँसे रहने का एहसास अंदर-ही-अंदर चुभता रहता है। कोई बहाना होता, जो वापस ले जाता। पर बहाना ऐसा, जब हम खुश हो सकें। खुश होकर ख़ुद को देख सकें। ऐसा न हो जब हम लौटकर वापस आयें तब तक सूरज ढल चुका हो। अँधेरा डराता नहीं, बस सबको अपने अंदर समा लेता है। जिसे हम देखना चाहते हैं उसे भी। भले हमें उनका आभास होता रहे, पर वह सामने होते हुए भी सामने नहीं होते। बाबा ऐसे ही किसी तत्व में तब्दील हो गए हैं। इसी तरह वह सब लोग भी जो हमारे बचपन में उमरदराज़ थे, धीरे-धीरे गायब होते रहे। गायब होना रातरानी के फूलों की ख़ुशबू और उस मौसम की ठंडक में शामिल होते जाना कभी नहीं रहा। वह यादों का खो जाना था। 

यह उस एहसास से भर जाना था, जब हम कुछ नहीं जानते थे, तब वह हमें अपनी दुनिया में शामिल कर रहे थे। कि एक दिन आएगा जब हम नहीं होंगे, तब यह हमें याद किया करेंगे। हो सकता है उन्होने कुछ और भी सोचकर रखा हो, पर इस बात के अलावे कोई बात उन्होने हमें नहीं बताई। हम ख़ुद कौन-सा उनके पास रहे। यह शहर हमें ज़िंदा रखने के एवज़ में रोज़ थोड़ा-थोड़ा निगलता रहा है। यह ऐसा तिलिस्म है, जहाँ हमें अपने होने का एहसास तो होता है, पर असल में वह वैसा होता नहीं है। यह बिलकुल ऐसा ही है जैसे हम किसी रात उनींदे जगकर नींद में चल रहे उस सपने में वापस लौटने की ज़िद में आहिस्ते-आहिस्ते छत के तीन चक्कर लगाकर भी नहीं थकते। सोचते रहते हैं, जैसे वह अभी याद आ जाएगा और हम सामने खुलते परदे में दाख़िल होते ही वहाँ पहुँच जाएँगे। कभी ऐसा किसी के साथ हुआ हो तब वह भी एक सपना ही होगा, तिलिस्म भरा। अधूरा बिलकुल हमारी साँसों की तरह। फेफड़ों के बीच धड़कते मैदे में फँसा हुआ सा।

कभी-कभी मम्मी कहती हैं, हम लोग भी घर से इतनी दूर पड़े हुए हैं। किसके लिए? पता नहीं। तब पापा अपनी अम्मा को याद करते करते कहीं दूर निकल जाते हैं। माँ धानेपुर अपने मामा के यहाँ या नानी के सेवढ़ा वाले घर पहुँच जातीं। फ़िर पापा कछोली, गुजरात में चीकू के पेड़ों की यादों में डूबते जाते। साइकिल से उन खजूर के पेड़ों के नीचे सड़क पर दूर-दूर तक कोई नहीं होता। पापा मम्मी को हमसे पहले वह सब जगह घुमा लाये हैं। हमारे लिए दिल के एक बड़े से कोने में यह जगह गाँव ने भरी। जहाँ बाबा हैं, दादी हैं। संदीप है। चाचा-चाची हैं। खपरैल वाला घर है। एक छत है, जिसपर उमस भरी डूबती शाम हम सब भाई-बहन चटाई लेकर बैठ जाते। दुआरे एक कुआँ रहा, जो अब सिर्फ़ दूल्हे के बरात जाते वक़्त कुआँ पूजय काम आवत हय। बिजली के खंबे हैं, तारें हैं पर चाचा ने बिजली नहीं ले रखी। एक सौर ऊर्जा का बैटरा है, उसी को धूप से चार्ज करके दुकान में बलब जलाते हैं। जो बच जाता है, उससे रात में एक छोटा-सा टेबल फ़ैन चलता है।

इस तरह यह दिल्ली कभी मुझे उस तरह कभी रोक नहीं पायी। हमेशा इसे अपने अंदर दाख़िल होता देख डर जाता हूँ। इस एक कमरे में फैली दुनिया काटने को दौड़ती है। यहाँ हम छह लोगों के सिवा कोई नहीं है। जैसे हम सब अँग्रेज़ बहादुर के कहे किसी काला पानी की सजा भुगत रहे हों। मैं कितना भी इस जगह से भागना चाहूँ, ख़ुद को बचाए रखने, उन यादों को समेटे रहने के लिए बार-बार उसे कहीं तहख़ाने में बंद कर चाभी अरब की खाड़ी में फेंक आऊँ, वह समंदर की लहरों के साथ वापस इस साहिल लौट आती हैं। पता नहीं यह सिलसिला कहाँ जाकर ख़त्म होगा। शायद वहाँ, जब हम लोग, अपने ख्वाबों में यह तय कर लेंगे कि अब लौट चलते हैं। अब बहुत हुआ, इससे जादा सहन करना खुद को तपती धूप में नंगे सिर कुर्सी लगाकर बैठे रहने जैसा लगने लगा है। यादें बेतरतीब होती उलटने-पुलटने लगी हैं। जैसे लग रहा है हम सब वक़्त से काफ़ी पहले बूढ़े हो गए हैं। कमर झुककर सुबह कपड़े सुखाने वाली तार की तरह हो गयी है।

इससे जादा शहर किस तरह डराता है, मालुम नहीं। पता नहीं डर लगता है, हम कहीं डरना न भूल जाएँ। इसलिए लौट चलते हैं। वापस।

{हफ़्ता भर पहले यह आज के दिन शनिवार को आया और हमारी नज़रों से बचता रहा। हमें कभी पता भी नहीं चल पाता। पर आज पापा ने इसे पकड़ लिया। अख़बार हिंदुस्तान, कॉलम: साइबर संसार। पन्ना बारह। तारीख: आठ अगस्त, साल: पंद्रह। नाम:यादों का दरीचा। }

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