जुलाई 21, 2015

वह हू बहू ऐसी ही थी।

उसने कभी सोचा नहीं था के आज बरसात के बाद इस ढलती शाम में अचानक वह फ़िर दिख जाएगी। वह अभी भी साँवली थी। उसे यह रंग सबसे जादा पसंद था। अपना नहीं, उस लड़की का। जैसे अभी भूरे बादलों ने उजले आसमान को ढक लिया हो। वह अपने दिल की धड़कनों में ढलते हुए सूरज की तरह धीरे-धीरे नीचे उतरने लगा। उसके पास इस बार भी उसकी तस्वीर उतार लेने के लिए कोई चीज़ नहीं थी। वह पिछली बार की तरह इस बार भी दोबारा अपनी आँखों में उन आँखों की परछाईं तलाशने लगा। उसने तब उपाध्याय की दुकान पर आहिस्ते से किसी किताब का नाम पूछा था। वह सुन नहीं पाया। किताब कहीं दूर से आने वाली थी। ऐसा सुनकर वह चुपचाप अपने दुपट्टे को सहेजते हुए वापस रिक्शे पर बैठ गयी। वह दीप्ति नवल नहीं थी। वह फ़ारुख शेख नहीं था। यह दिल्ली का मुखर्जी नगर भी नहीं था। यह कचहरी रोड, बहराइच की छोटी-सी दुकान से निकली लड़की थी। जहाँ अपना नंबर कटता देख, सब लड़के उस लड़की के भाई बनकर शोहदे लड़कों को इसी तरह पहचान कर पीटने में ज़रा भी देर नहीं लगाते।

यह सब जो बीत चुका है, अभी कुछ देर पहले तक वहीं उसी जगह बर्फ़ की तरह जमा हुआ रहता। अगर उसने नानपरा स्टेशन से बाहर निकलते हुए पलटकर दोबारा न देखा होता। गाड़ी बुलेट ट्रेन नहीं थी, साधारण सवारी गाड़ी, पैसेंजर थी। वह जगजीत सिंह से किसी भी मानी में कम नहीं थी। उनकी किसी कम पसंद गज़ल की तर्ज़ पर आहिस्ते-आहिस्ते प्लेटफ़ॉर्म छोड़ते हुए बीच में दोबार रुक भी गयी। सच, इस सीन को अपनी आँखों के सामने घटते देख, उसे अपनी मरती हुई सगी नानी के गले में अटकी हुई पौने दो-सवा तीन साँसें की याद हो आई। हलक में उसके भी थूक बलगम जैसा कोई पदार्थ अटक गया, जब उसने उसकी बायीं कलाई पर लाल धागा बंधे हुए देखा। इसका क्या मतलब हो सकता है, इसकी अनंत संभावनाओं को टटोला जा सकता था। पर उसने शादी, पति, ससुर, बच्चे आदि सभी कयासों को शहनशाह टेलर से सिलाई हुई अपनी पैंट की चोर जेब में सिकुड़े-मुकड़े दस रुपये के नोट की तरह कोंचते हुए रख लिया।

उसने साथ में यह भी याद से अपने दिमाग में टाँक लिया कि वह बिलकुल इसी क्षण से कालिदास के दुष्यंत परिवर्तित होने वाला है। वह सब कुछ भूलकर भी याद रख लेगा। इसी उधेड़बुन में उसे फ़ेयर एंड लवली के विज्ञापन का ख़्याल आया। वह सोचता रहा, उस लड़की की खाल का रंग साँवला कैसे रह पाएगा? उसने मन के खाली दरवाज़ों को पटकते हुए पाया कि इस फैसले के बाद से कोई भी लड़की अगली शकुंतला बन जाने की आहर्ता को आसानी से प्राप्त कर जाएगी। उनका अभिज्ञान शाकुन्तलम् कहीं कोई भवभूति बना लिख रहा होगा। 
***
एंड नोट: ताकि सनद रहे।
मसान की कहानी क्या है(?) नहीं पता। फ़िल्म के ट्रेलर में लड़का-लड़की किसी अनाम से स्टेशन पर लोहे के बेंच पर बैठे कुछ सोचते, खोते, गिरते-पड़ते बात कर रहे हैं। पूरा किस्सा खुलेगा चौबीस जुलाई को। किसी पीवीआर में। वहाँ जाने की औकात हमारी नहीं। पर ऐसे ही शाम को कॉफी के बाद दिमाग थोड़ा बादलों में कहीं खो गया।  यहाँ भी प्लेटफ़ॉर्म संज्ञा की तरह है, वह भाववाचक संज्ञा में तब्दील नहीं हो पाया है। किन्ही मरे हुए शब्दों से घिरा हुआ। इसलिए आगे और नहीं लिख पाया। फ़िर उसमें तस्वीरों वाली नन्दिता दास भी नहीं हैं। न मेरा बेंगॉली लड़कियों को लेकर कोई ऑबसेशन है। दिमाग दौड़ाया तो साँवली याद करने पर यही याद आई।

फ़िर याद आयीं स्मिता पाटील और दोबारा से दीप्ति नवल। शबाना आज़मी कभी याद नहीं आतीं। बस याद आता है, उनका अर्थ का गाना सामने राज किरण बैठे हैं। और साथ बैठी हैं, उन सबकी परछाईं। परछाईं में भी सब उनकी तरह चुप हैं। बिलकुल चुप। 

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