जुलाई 23, 2015

छपने की राजधानी

वह लोग ऐसे समय में जी रहे थे, जहाँ इस शहर के अलावे कहीं किताब लिखने वाले नहीं बचे थे। जिसे आना था, जिसे छपना था, उसे इस राजधानी आना पड़ता। यह मजबूरी कम सुविधा अधिक थी। यह उन सबका संगठित प्रयास था, जो लेखकों को यहाँ अपने आप खींच लाता। कोई भी होता उसे पिताजी मार्ग पर कुछ देर चलकर ख़ुद को थकाने का अभिनय करना पड़ता। इस तरह बदरिया घाम में बिन पानी पिये टहलने का छद्म संघर्ष बाकी सबको आपके लेखन के प्रति प्रतिबद्धता तुल्य लगता। इसका एक अनुवाद सरोकार में भी किया जाने लगा। सब इस प्रक्रिया में साथी पैदल सवार को पहचान रहे होते पर पहचानने से बिलकुल मना कर देते। मना करना मित्रता का एक और अवसर लेकर आता। जानकर भी अनजान बने रहना इसकी सबसे सफल और सदियों से आजमाई तरकीब ठहरती। वह बालम खीरे की तरह दोनों के हाज़मे को दुरुस्त ही नहीं करती बल्कि उनके वैचारिक उद्वेलनों के सर्वाधिक महत्वपूर्ण क्षणों में पाद के रूप में निकलने वाले नाद स्वर में भी एक तादात्म्य स्थापित कर सम्बन्धों में तत्काल मधुरता के संचार का अनिवार्य हेतु-सेतु बनकर उभरती।

इन सब महान आत्माओं के इस अकिंचित अपरिचित स्थान पर ठहरने का बंदोबस्त पिछली सदी के सन् उन्नीस सौ बाईस में अंग्रेज़ सरकार ने किंगस्वे कैम्प के पास एक सराय बनाकर किया। वह आज़ादी के साल देश का बँटवारा निपटाकर यहाँ से चली गयी। एकबार की गयी वह फ़िर कभी वापस नहीं आई। उसने आने की ऐसी उत्कट इच्छा कभी प्रकट भी नहीं की। आज वह दूर देस से इन्हे देखती होगी तो फ़ूली नहीं समाती होगी। उसे इन सबको अपने नुमाइंदों के रूप में चुन लेना कितना कारगर लग रहा होगा। काम उसी का हो रहा है, बस हमें पता नहीं चल पा रहा। या पता चलते हुए भी हम अनजान बने रहने में ही अपनी ख़ैर समझते हुए चहल कदमी कर रहे हैं।

लेकिन इस बहस का कोई ओर छोर पकड़ने का अभी वक़्त नहीं है। अभी तो बस इसका एक अर्थ यह निकलता दिख रहा है कि अगर वे सब मास्टर थे,  तब यहाँ पढ़ने वाले भी रहे होंगे। उनको पढ़ाये जाने के लिए पाठ्यक्रम भी बनाया गया होगा। पाठ्यक्रम बिना छपी किताब के अधूरा रह गया होगा। पहली किताब छपी दैनिक मिलाप की बहादुरशाह ज़फ़र मार्ग वाली प्रैस में। पर बगल वाली इमारत के अहाते में बनी झुग्गी में रहने वाले अब्दुल करीम और उसके पड़ोसी राम जियावान मिसरा की अर्जी पर कोर्ट ने तत्काल संज्ञान लेते हुए कहा होगा, ‘चुपचाप अपनी प्रैस लेकर यहाँ से चले जाओ!’ अब सब मरते क्या न करते। उन्हे डर था के कहीं उनके छापेखाने से आती भयानक आवाज़ों से झुग्गी की छत में छेद हो गया तो लेने के देने पड़ जाएँगे। टिटहरी प्रकाशन एक दिन वहाँ से चलकर नयी इमारत में आ गया। अब उनका नया पता था: 1-ए, पिताजी मार्ग, दलीचागंज, नयी दिल्ली। गोलचा सिनेमा के बिलकुल सामने। पीछे गली में नहीं।

पश्चलेख माने पोस्ट स्क्रिप्ट:
उपरोक्त टंकित प्रत्येक पंक्ति से उछ उछलकर बाहर निकलने को आतुर सभी पात्र, स्थान, और घटनाएँ काल्पनिक हैं। इनका  यथार्थ से मिलान महज संयोग है। उसी तरह जैसे आज आठ बजकर चौबीस मिनट पर विनीत की फ़ेसबुक पोस्ट से मिल जाना अनगिनत संयोगो में से एक संयोग है। बाकी खत्म करने से पहले अखिलेश के निर्वासन की पंक्तियों से सादर चुराये गए विन्यास के लिए क्षमा प्रार्थना।

2 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. यह किसी दुरभिसंधि का जवाब ही है जनाब, इसे लाज़वाब ही होना था।

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