अगस्त 31, 2015

मुझे मार दिया गया है..

मैं मूलतः इंसान हूँ। इसलिए थोड़ा विचलित हूँ। थोड़ा दुखी भी हूँ शायद। मेरे पास कहने के लिए कुछ ख़ास नहीं है। पर कभी-कभी कहना ज़रूरी लगता है। जैसे आज।

मुझे नहीं पता, आततायी कैसे होते हैं। उनकी शक्लें शायद हमारी तरह ही होती होंगी। लेकिन वह असहिष्णु होते होंगे। उनके पास शायद दिल नहीं होंगे। उनका इतिहासबोध बिलकुल शून्य होता होगा। वह इस तरह इंसान ही नहीं होते होंगे।

इसी में जी लूँगा कि थोड़ा बहुत सही, मेरे अंदर इतना साहस नहीं के दूसरे के अस्तित्व को सिरे से नकार दूँ। कभी इतना साहसी होने का दुस्साहस चाहता भी नहीं। मुझमें हिम्मत नहीं बची है, ख़ुद को बचाने की। इसलिए शायद मेरी बातें प्रत्यक्ष प्रकट न हो रही हों, तो वह केवल मेरी कमज़ोरी मानी जाये। मेरे कमज़ोर देश पर उसकी किसी भी ज़िम्मेदारी से उसे स्वयं च्युत करता हूँ। इसे एक डरे हुए समय का डरा हुआ वक्तव्य माना जाए। इन सबसे अधिक इसमें कल्पना का पुट है। यह वास्तविक से अधिक अवास्तविक समय का सत्य है। थोड़ा बेचैन करता, हाँफता, अधकचरा, विकृत, कुरूप, भदेस, झूठे सच-सा।

आप इसे कुछ भी मान सकते हैं। और अगर इसे कुछ नहीं मान सकते तो एक ख़राब कविता मान लीजिये।

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