अगस्त 26, 2015

दो की कहानी

बात पता नहीं किस दिन की है। होगी किसी दिन की। हम लोग फरवरी की ठंड में सिकुड़ते हुए नेहरू प्लेस से शायद नजफ़गढ़ जाने वाली बस में बैठे थे। ग्रेजुएशन का आख़िरी साल था। हम जेएनयू फ़ॉर्म भरने जा रहे थे। वह हमारे नए सपने का नाम था। जिस बस में हम थे, उसकी पिछली सीटें भी बस की तरह खाली-खाली थीं। बिलकुल उसी तरह जैसे कुछ देर बाद हमारी दोस्तीयाँ भी खाली होने जा रही थी। हमें अभी मुनीरका उतर जाना था के उससे कुछ देर पहले उसने मुझसे मेरा फ़ॉर्म माँगा। वह उसे इतमीनान से देखती रही और देखकर एकदम चुप हो गयी। चुप होने का मतलब उसी ने कुछ देर बाद पूछते हुए समझाया। तुमने मुझे कभी बताया क्यों नहीं? हम दोनों को कुछ देर तो समझ ही नहीं आया कि ऐसी क्या बताने लायक चीज़ थी जो हम दोनों एक-दूसरे को एक साथ बताना भूल गए थे। सच, हम बिलकुल नहीं समझ पाये, हम दोनों के बीच क्या बताना रह गया।

यह शायद हमारे खाली होने की पहली कही गयी औपचारिक शुरुवात रही होगी। पर कभी-कभी कुछ चीज़ें ऐसे एकदम से ख़त्म नहीं होती। ख़त्म होते-होते सालों लग जाते हैं। वह अभी भी आहिस्ते-आहिस्ते ख़त्म हो रही है। यह बात इधर नयी तरह से उन पुरानी कड़ियों को जोड़ते हुए समझ आयी। पर तब डायरी में लिखने के अलावे कुछ और नहीं कर पाया। आज भी काफ़ी देर इस पन्ने को खाली देखते रहने के बाद यह दिन दिखाई दिये। पता नहीं इसे मेरे अंदर का क्या कहेंगे ? यह भी हो सकता है, यह उस क्षणिक घटना की बिलकुल गलत व्याख्या हो? पर जिसे कुछ माना हो, वह जब पास नहीं होता, तब हम ऐसे ही कितने ख़यालों से भर जाते होंगे। यह भरना खाली होते रहने की अदृश्य प्रक्रिया-सा है। चुपके से एक छोटे से सुराख़ के सहारे ख़ून के क़तरे बहने लगते हैं। दिल कुछ धड़कना कम कर देता है। रुक जाता है। हम भी वहीं रुके रह गए हैं। उन सीटों के बीच कहीं छिपे-छिपे से। एक दूसरे में धीरे-धीरे लौटते से। आहिस्ते से। रुके-रुके से।

जैसे अभी रुकना चाहता हूँ। ठहर कर एकबार फ़िर देखना चाहता हूँ। वह सारे पल, जो एक क्षण में नज़रों के सामने से कौंधते हुए गुज़र रहे हैं। यह तंगनज़री उसकी नहीं, मेरी तरफ़ से है। वह तो बस इतना कहती रही, तुम अब बदल गए हो ! पहले जैसा न रह पाने की टीस तब होती जब पता होता, कभी हम कैसे हुआ करते थे। यह भी याद करना पड़ रहा है। तब सबसे पहले याद आती, एक याद। उस इतने बड़े गलियारे में हम कहीं भी होते, घेरे में वापस आने के लिए तड़प उठते। कभी नहीं बताया लाल रंग की धानी साड़ी में जो तुम आज से आठ साल पहले उस कुर्सी पर बैठी हुई इधर देख रही थी, वह तुम ही थी। छिपी हुई। दिल की गहराई में कहीं। डूबी-डूबी-सी। उस दिन बदलने ने ही सब बदल दिया। तुम जो भी थी, तब तुम मेरी सबसे कोमलतम कल्पनाओं में से एक थी। आज कुछ नहीं हो, बस कल्पना हो।

{असल ज़िन्दगी के ख़राब प्लॉट से..}

2 टिप्‍पणियां:

  1. कभी-कभी कुछ चीज़ें ऐसे एकदम से ख़त्म नहीं होती। ख़त्म होते-होते सालों लग जाते हैं। वह अभी भी आहिस्ते-आहिस्ते ख़त्म हो रही है।

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    1. ख़त्म होना उन देखे गए सपनों की आख़िरी किश्त होगा न, इसलिए।

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