अगस्त 29, 2015

दुःख की कथा

पता नहीं यह कैसी अलसाई-सी सुबह होती? सब तुम्हारे आने की आहट में न जाने कब से टकटकी लगाए ऊँघते उनींदे करवट लिए वहीं बैठे रहते। तुम आते, तो पता नहीं आज कैसा होता। शायद इस अधूरी दुनिया का अधूरापन कुछ कम हो जाता। हम भी कुछ पूरे होकर थोड़े और भर जाते। तुम थोड़ी देर करते, तब भी हम कहीं दूर नहीं जाते, वहीं चाय के कप लिए घूम रहे होते। पता नहीं तुम कहाँ रुक गए। तुमने कुछ कहा नहीं। बस रुक गए। अब यह इंतज़ार करना कैसा कर जाता है। अनमना-सा। जैसे हिचकी फेफड़े तक आकर कहीं पसलियों में अटक जाये। धड़कन धड़कने से पहले कुछ छन और रुक जाये जैसे। टहनी कितना इंतज़ार करती है उन अधखिले नन्ही कलियों का। एक दिन खिलकर वह सचमुच खिल जाती हैं। अनदिखी मुस्कराहटें होंठों से होकर दिल में नीचे उतरती जाती हैं।

तब कोई पूछता नहीं, सब उसी तरह थोड़ा मुस्कुरा देते। उनकी आँखें थोड़ी चमक जाती। उसी चमक में अपना चेहरा भी कुछ और चमकता लगता। पर कमरे में अँधेरा है। सब चुप हैं। शांत हैं। अधूरे हैं। जबसे तुम नहीं आए तबसे यह अधूरापन हर रात उनके दिल में ऐसे ही अधूरा धड़ककर रह जाता। लगता जैसे उनकी यादें, आह बनकर उनके खून में कहीं घुल गयी हैं। दोनों मन में कितनी ही ऐसी बातें लिए उस दानव जैसे काले दरवाजे से चिपके खड़े रहते। इस तरह उनके पास दुखी होने के लिए पर्याप्त मात्रा में दुख था। जैसे-जैसे यह घटना उनसे दूर होती गयी, वैसे-वैसे वह अपने अंदर इस दिन का इंतज़ार करते हुए ख़ुद को खीज से भरा पाते। ऐसा करते हुए उनके अंदर पिछले दिन के अनुपात में कुछ अधिक उखड़ापन घर करता रहता। इसी अनुपात में इस घर की दीवारें और अधिक चुप रहने लगीं। वह भी शायद उनकी तरह इस इंतज़ार में शामिल होकर सब भूल चुकी थीं। भूल चुकी थी, वह दीवारें हैं। जैसे वह दोनों भूल चुके थे, वह दीवार नहीं हैं।

तुम उनके स्पर्श की सबसे कोमलतम अभिव्यक्ति होते। वह तुममे अपनी की छवि देखते। तुम कुछ-कुछ उन सबकी तरह दिखते। आँखों से अपनी माँ पर गए होते। माथा पिता से लेकर बड़े दिखते। रंग से कोई फ़रक नहीं पड़ता। बोलते बिलकुल अपनी अम्मा की तरह। हँसते बिलकुल मेरी तरह। चाहकर भी कुछ काट नहीं सकते। उन सबने मिलकर तुम्हारा नाम ढूँढ़ते पिछली ठंड की गुलाबी दुपहरों को अपने अंदर एहसास की तरह छिपा लिया होगा। वह तुमसे कभी कहते नहीं, पर तुम्हें देखकर उन दिनों को याद किया करते। इस तरह की अनगिन बातों के जब वह दिल को भरा पाते, तब हाथों की उँगलियों को एकदूसरे की हथेलियों में फँसाकर छत पर चले जाते। वहीं घंटों उमस भरी असाड़ की चिपचिपी रातों में खो गए सपने की इस किश्त को ढूँढ़ते रहते। उनकी जेबें खाली हो गयी थीं। वहाँ तुम नहीं थे। यही उनके इस सपने की सबसे बड़ी विफलता थी। उन्हे पता था आज तुम नहीं आओगे, पर कैसे ज़िद्दी हैं, दोनों तुम्हारा इंतज़ार करते-करते वहीं सीढ़ियों पर बैठे-बैठे सो गए हैं। तुम इतने कठोर कैसे हो गए। तुम्हें तो आ जाना था। चुपके से। सपने से बाहर। इन सीढ़ियों के पास। आहिस्ते से।

{अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट पढ़ते हुए तुम्हारे पिता की तरफ़ से, तुम्हारे लिए। हमारे लिए। उसपर आज की तारीखलिखी हुई है। }  

2 टिप्‍पणियां:

  1. तुम आते, तो पता नहीं आज कैसा होता। शायद इस अधूरी दुनिया का अधूरापन कुछ कम हो जाता। हम भी कुछ पूरे होकर थोड़े और भर जाते।

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    1. कसक यह कि वह नहीं आया। आता तो क्या बात होती। ख़ैर,..कुछ नहीं।

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