अगस्त 20, 2015

इन दिनों..

खिड़कियों पर पर्दे डालकर इस लाल अँधेरे में बैठे बहुत देर से सोच रहा हूँ। कई सारी बातें चलकर थक चुकी हैं। कुछ मेरे बगल ही बैठी हैं। कुछ सामने एक बंद किताब की ज़िल्द के अंदर छिपी हुई हैं। डायरी लिखना एक दम बंद होने की कगार पर है। लिखने का मन होते हुए भी पूरे दिन की भागमभाग में ठहर कर इस मेज़ पर आने की फुर्सत भी नहीं मिल पाती। यह कागज़ पर लिखने का छूट जाना है शायद। मन होता है, घंटों इसी कमरे में अकेले बैठा रहूँ। मेज़ पर सामने पड़े काँच के कछुए में बदलकर जड़ हो जाऊँ। इतना लिखकर आगे कुछ कहने का मन नहीं है। शायद कुछ दिनों की लंबी छुट्टी पर जाना चाहता हूँ। अजीब तरह से कुछ भी न करते हुए थक गया हूँ शायद। 

रात सपनों में खाली प्लेटफ़ॉर्म आता है। वहाँ बल्ब की रौशनी में दिखते लोहे के बेंच पर उस सुनसान रात में बारिश की बूँदों के होने का एहसास सिहरन बनकर अंदर दौड़ने लगता है। सुबह तक कोई गाड़ी नहीं है। शाम को भी नहीं। परसो एक मालगाड़ी आएगी उसी के गार्ड के साथ मुझे कहीं के लिए निकलना है। बहुत दूर से यह सब मैं देख रहा हूँ, और वहीं सोचते हुए बहुत चुप हूँ। तभी नींद अचानक टूटती है और बाहर होती बरसात का एहसास मेरे मन को भिगोता हुआ चला जाता है। वहाँ एक खयाल से टकराकर बची खुची नींद भी उड़ जाती है। वह सब लड़कियाँ जो ख़ुद को एक जमाने में 'फ़ेमिनिस्ट' कहती थीं और हम लड़कों के साथ ख़ूब बातें किया करती थी; इधर वह सब शादियों के बाद दो-दो उपनाम अपने कंधों पर लिए चल रही हैं। पहले सिर्फ़ अपने पिता का ढो रही थी, अब 'उनके' पिता का उपनाम भी राजी-खुशी जोड़कर हनीमून पर ग्रीस टहल रही हैं। अब वो भी क्या करें, सारा नारीवाद रिसर्च आर्टिकल लिखने में ख़त्म हो गया।

इसे ख़त्म होना नहीं कहते। ख़त्म होना कहते हैं, किसी भी चीज़ के न रहने पर पड़ने वाले फ़रक को। मन कर रहा है, थोड़ी देर लेट जाऊँ। इन सबमें वैसे भी कुछ ख़ास बचा नहीं रह गया है। जैसे कुछ ख़ास नहीं है, पुलिस का रात के बारह बजे जंतर मंतर पर लाठी चार्ज। इसमें भी कोई नई बात नहीं है कि बांग्लादेश में कट्टरपंथी एक के बाद एक प्रतिरोध करने वाले लोगों की आवाज़ को कुचलने के लिए उनकी हत्या करने के रास्ते पर खड़े हो गए हैं। जैसे बीसीसीआई की इजारेदार क्रिकेट टीम के कप्तान आगरा में पैराशूट से कितनी भी छलाँगे मारते रहें, आज नहीं तो कल वह आईपीएल में सट्टेबाजी के आरोपों में लिप्त पाये जाएँगे। फ़िर एक दिन वह सब आरोपों से मुक्त हो जाएँगे और उन्हे उपकार त्रासदी में अंसल बंधुओं की तरह तीस-तीस करोड़ रुपये जुर्माना देने के बजाए अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा।

थोड़ी देर रुक कर सोचता हूँ, तो लगता है, सब ऐसे ही चलते हैं। सब अंतर्विरोधों को अपने अंदर समेटे हुए खिसकते रहते हैं। हम किसी ख़ास तरह से जीने के बजाए, जीने के ढर्रे चुनने लगते हैं। लोग इसे परंपरा कहते हैं। कुछ इसे परंपरा की आधुनिकता भी कह सकते हैं। लेकिन यह नहीं मानते कि इनके भी इतर कुछ और विकल्प हो सकते हैं। उन मूल्यों से निकलकर, आगे बढ़ते हुए हमें महसूस होगा, जिन चीजों के साथ आज तक हम चल रहे थे, वह किसी चालबाज़ समाज का काइयाँपन था। जब तक उसे समझने लायक होते, तबतक, हम अपनी आधी ज़िंदगी बिताकर चैन की बीड़ी फूँक चुके होते हैं। हो सकता है, आज मेरी इन सब बातों का कोई मतलब नहीं क्योंकि अभी किसी विकल्प का कच्चा ख़ाका भी दिमाग में नहीं है। जब होगा, तब शायद वह इसे अपने सामने पाकर सबसे पहले ख़ारिज़ करने पर तुल जाएँगे। पर इस बार मानुंगा नहीं। सब कुछ भी कहते रहें, पीछे नहीं हटना। उस पर चलकर देखेंगे। कैसा है।

2 टिप्‍पणियां:

  1. सब अंतर्विरोधों को अपने अंदर समेटे हुए खिसकते रहते हैं।

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    1. केंचुए की तरह शायद, नहीं तो हम बनना तो जोंक चाहते हैं।

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