अगस्त 16, 2015

पंद्रह अगस्त, दिल्ली

पंद्रह अगस्त की सुबह

अगर आज कोई रेडियो पर लाल क़िले से प्रसारित होते सीधे प्रसारण को सुन रहा होगा, तो उसे अपनी सहज बुद्धि पर एक दो नहीं कई-कई बार संदेह हुआ होगा कि आज पंद्रह अगस्त की सुबह लाल किले को क्या हुआ(?) जो वह उठकर बिहार सहरसा, बेगू सराय कैसे पहुँच गया।

लगता है, पर'धान सेवक की भाषण की प्रति बदल गयी होगी। शायद।

वह बिलकुल उसी मूड में थे, जैसे चुनावी रैलियों में अपनी सरकार की उपलब्धियों का बखान करके मतदाता को अपनी तरफ़ कर लेने की कवायद में पिछले साल से एक ही टोन में लगे रहे हैं।

ख़ैर, हमारी समझ में 'देश' सरकार से कुछ जादा हैसियत रखता है। उनका 'अर्थ संकुचन' उन्हे मुबारक़। हम तो कभी पतंग नहीं उड़ाते। उनकी तो किले की प्राचीर से कट भी गयी।

पंद्रह अगस्त की शाम

यदि आज किसी ने इस 'टीम इंडिया' वाले भाषण को सुन पाने की अथक व कामयाब कोशिश की है तो कृपया वे मार्गदर्शन करके बतावें कि उन्होने कितनी बार 'मेरे सवा सौ करोड़ देशवासियों' कहा, कितनी बार पंद्रह महीने की सरकार की दुहाई दी, और जितनी बड़ी-बड़ी रकम का हवाला दिया, उसका कितना योग बना।

वे तो अपनी उपलब्धियों का झऊआ गीली रुई की तरह लेकर सब पर बरस पड़े। बीस लाख की सब्सिडी तो स्वेच्छा से ख़त्म करवा देने की उक्ति तो कही पर संसद में चवन्नी-अट्ठनी में मिलती चाय एवं समोसे के कॉम्बो का ज़िक्र करना भूल गए।

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