सितंबर 17, 2015

पाँच साल बाद: करनी चापरकरन: लौटने से पहले

देखते-देखते पाँच साल बीत गए। जैसे अभी कल ही की तो बात है। लेकिन जैसे अगले ही पल लगता है, यह पिछली पंक्ति और उससे पिछली पंक्ति कितनी झूठ है। सरासर झूठ। पाँच साल। कितना बड़ा वक़्त होता है। हमारी ज़िंदगी के वह साल, जब हम जोश से भरे हुए किसी भी सपने को देख लेने की ज़िद से भर जाते होंगे। भर जाते होंगे, भरी मुट्ठियों से। उँगलियों से। पर वह क्षण लौट के नहीं आएंगे। उनकी यादें इधर-उधर हमारे अंदर हमारे बाहर बिखरी पड़ी होंगी। कभी लगता है, इतने कम अरसे में तारीखें गड्ड-मड्ड हो गईं हैं। वह सत्रह रही होगी या अट्ठारह। महिना यही था। और साल था, दो हज़ार दस। 

पर अब कोई फरक नहीं पड़ता। बस इसी के आस-पास कोई दिन रहा होगा। एक दिन आगे, एक दिन पीछे। फ़िर यह बात कितनी ही बार अपने अंदर दोहराई होगी, बस पाँच साल ! आज यह मोहलत ख़त्म। आज से वापस लौटने की तय्यारी शुरू। पर मुझे नहीं पता इस वापसी में कौन-सा ख़ाका काम करेगा। या फ़िर वापस लौटकर कहाँ पहुँच जाना है। कहीं पहुँचना भी है या ऐसे ही बोल दिया। पता नहीं। पर सच, जब बोला होगा, तब इतना सोचा नहीं होगा। बस बोल दिया होगा। जैसे हम सब ख़ुद को बोल देते हैं। ऐसे ही। 

यह सच है कि सामंती संरचनाओं वाले इस काल खण्ड में इसकी कोई जगह अभी तक तय नहीं हो पायी है। जो ख़ुद को तारीख का ख़ुदमुख़्तार कहते हैं, उनके लिए हम 'आँख की किरकिरी' हैं। इसके बाहर वह किसी भी ऐसी जगह या 'स्पेस' को मानने के लिए तय्यार नहीं हैं। वह कहते हैं, इसके लिए 'इतिहास' में कोई कुर्सी या मेज़ खाली नहीं है। यह उनकी समझ का फेर है या बेदख़ल करने की राजनीति, कह नहीं सकता। शायद दोनों का गठजोड़ होगा। वरना अब मुझे भी यह मानने में कोई ऐतराज नहीं है कि हम भले एक भाषा विशेष में लिख रहे हैं, पर कथ्य के स्तर पर यहाँ जो अभिव्यक्त हो रहा है उसकी नब्ज़ पकड़ने का हुनर उन्हे नहीं आता। फ़िर हम कौन-सा किसी से मानद उपाधि लेने की जुगत लगाने वाले हैं। ख़ैर, हमें क्या करना। हम तो बस ऐसे ही यहाँ आ गए थे। के देखते हैं, कैसा खुला मैदान है?

लिखना मेरे अंदर एक खिड़की का बन जाना है। जैसे हम सब अपनी-अपनी परछाईं में होते हुई भी नहीं होते बिलकुल वैसे। वह हमारे अंदर से होते हुए बाहर की तरफ़ जाती रही हैं। जैसे सबकी ईमानदारियाँ उनकी नौकरियाँ तय करती रहीं और मैं उनके दफ़्तरों के बाहर लगी भीड़ में मारामारी करते हुए अंदर घुसने की फ़िराक़ में लगा रहा। कभी-कभी मन करता है, सब छोड़ छाड़कर बैठ जाऊँ। पर कर नहीं पाता। सोचने और करने जो फ़र्क है, वह यहीं से शुरू होता है। बिलकुल इसी पंक्ति से। यहाँ जितने भी किरदार हैं, उनमें कहीं-न-कहीं मेरा अक्स छिपा हुआ है। वह सब मुझमें अपने अपने हिस्से लेकर इन पन्नों पर बिखर गए हैं। इस तरह सब सामने होते हुए भी सामने नहीं है।

ऐसा करते-करते बहुत सारी चीज़ें बदल गईं। रहने के लिए यह दुनिया बद से बदतर होती गयी है। जो शक्तिशाली हैं, वह अपने इसी अहंकार में चूर हैं। जो शक्तिशाली नहीं हैं, वह उस शक्तिशाली की नकल में ही ख़ुद को मसरूफ़ रखे हुए हैं। जो न नकल कर सकते हैं और न शक्तिशाली हैं, वह इन दोनों के बीच पिस रहे हैं। हम सब इस चक्की में गेहूँ की तरह पिसने के लिए पैदा हुए हैं। सुन रहा हूँ, अब हम सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाने जा रहे हैं। वहीं मैं एक ऐसे देश में रह रहा हूँ, जहाँ पढ़ लिखकर इन पाँच सालों में एक अदद नौकरी तक नहीं ले सका। सारे तंत्र इस तरह भ्रष्ट होते जा रहे हैं, जिनमें किसी तरह की संभावना नहीं दिखती। मैंने एक संभावना इस लिखने में ढूँढ़ी है। ख़ुद को ज़िंदा कहने के लिए मैं इसकी ओट में आकर छिप गया हूँ। ताकि जब कोई पूछे, तब कुछ कह सकूँ। यह लिखना ही मेरी राजनीति है। लिखना कहीं चले जाने से पहले किसी खाली पन्ने पर अपने पते को लिख जाना है। 

मैं भी अपना यही पता दुरुस्त करता जा रहा हूँ। लिखकर देख रहा हूँ, दुनिया का कौन-सा कोना मुझ जैसे व्यक्ति को अपने भीतर समेटे रहेगा। शुरू-शुरू में लगता था, लिखना पलायन कर जाना है। थोड़ा लिखा और भाग गए। पर लिख लिखकर मालुम पड़ा, लिखना अपने भीतर चलने वाला एक सतत् संघर्ष है। लिखने के लिए हिम्मत चाहिए। यह सबके बस की बात नहीं। मैंने ख़ुद अपनी पड़ताल शुरू की। भले यह दुनिया का सबसे आसान काम लगता हो, पर लगने से क्या होता है। यहाँ बिखरी मेरी एक-एक बात, इस देश और काल पर एक अनसुनी टिप्पणी है। यह उस मर्मांतक पीड़ा का छोटा-सा रुक्का है। यह पढ़े जाने लायक भाषा में कहने की छोटी-सी कोशिश भर है।

{इससे जादा कहने का कोई मतलब नहीं। पहले ही औकात से जादा कह गया हूँ। बस इधर पिछले चार सालों की सालगिरहों को लगाता चल रहा हूँ। मन करे तो देख लीजिएगा। सब एक के पीछे एक हैं।  साल पहला, साल दूसरा, साल तीसरा और साल पिछला। }

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