सितंबर 08, 2015

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी..

रात अभी शुरू हुई है। मन में न जाने कितनी बातें एक-दूसरे को धकेलते हुए मरी जा रही हैं। कोई भी किसी का इंतज़ार नहीं करना चाहती। बस एकबारगी कह दूँ तो उन्हे चैन पड़े। पर उन्हें एकसाथ यहाँ कहूँगा तो कोई मतलब भी बन पड़े, कह नहीं सकता। इसलिए तरतीब होनी चाहिए। एक सलीका सबको सीखना पड़ता है। तुम भी सीख लो अविनाश। सही कह रहा हूँ। तुम्हारी कविता ठीक-ठाक बन पड़ती है। ऐसे लिखते रहे, तब भी अपनी कोई जगह तो बना ही जाओगे। पर अपने मन को कैसे समझाऊँ। वह किसी बात पर राजी नहीं है। वह जिद्दी है। शाम से ही पता नहीं ऐसा क्या हुआ कि इसपर हर छपी किताब पढ़ लेने की ज़िद सवार ही गयी। वह लिखता है, उसकी कई सारी बातें अभी भी पूरी नहीं हुई हैं। पर लगता है, जैसे मेरे मन में झाँककर वह अभी गया हो जैसे। जैसे खिड़की के बाहर अँधेरे में जुगनू घूमते हुए कहीं थम जाएँ। थमकर उस दूसरे जुगनू की रौशनी में अपनी परछाईं देख सोच में पड़ जाएँ। हो सकता है, इन कही गयी बातों में भले कोई मतलब अभी न हो, आगे भी कभी नहीं रहेगा, ऐसा कतई नहीं कह रहा। यहाँ लिखी, कही, छपी हर बात का कोई मतलब है। कोई जाने न जाने। कोई माने न माने।

जैसे एक बात न जाने कब से इस चारदीवारी के चक्कर लगाए जा रही है। वहाँ सामने कील पर तुम्हारी कोई तस्वीर नहीं है। पर वह सोचता रहता है कि अब तुम अब थोड़ी मोटी हो गयी हो और थोड़ी बदसूरत भी..। इस पंक्ति के बाद जो कहा जा सकता है, वही कहने जा रहा हूँ। शादियों के बाद लड़कियाँ ऐसी ही हो जाती हैं। तुम भी हो गयी तो ऐसा कोई पहाड़ नहीं टूट गया। यहाँ मैं बिलकुल उस पुरुष की हैसियत से यह बात कह रहा हूँ, जिसमें एक लड़का, किसी लड़की को ख़ुद के लिए अप्राप्य वस्तु की तरह देखा करता है। वह उसके लिए किसी अधूरे सपने की तरह ही बनी रहती है। उसकी सबसे बड़ी जीत इसी में होती है कि उसकी औकात से कहीं आगे दौड़ने वाली वह लड़की उसे कभी नहीं मिल पायी। मिल जाना सपने का टूट कर बिखर जाना है। लेकिन एक बात है, जो तुम कभी अपने ध्यान में नहीं ला सकती। के जैसी रंगत के साथ हमने तुम्हें अपने अंदर महसूस किया है, वैसे तुम्हारा पति भी कर सकता है, कहा नहीं जा सकता। 

पता नहीं इस बीती पंक्ति का लोड तुम्हारा दिल कैसे ले(?) इसलिए छोड़ दो। तुम्हें नहीं समझ आने वाली मेरी बात। मुझे तो यह भी नहीं समझ आता तुम सब लोग क्यों फ़ेसबुक पर अपनी अपनी तस्वीरें लगा कर हमें जलाया करते हो। क्यों एहसास दिलाते हो कि हम लोग अभी भी उसी घेरे में रहा करते हैं, जहाँ पेट काट काटकर घर चलाने वाले मुहावरों को हम जीते हैं। हम मूलतः ऐसी पितृसत्तात्मक संरचनाओंमें बंधे हुए हैं, जहाँ कोई भी कदम अपनी मर्ज़ी से नहीं उठा सकते। इस अर्थ में बाज़ार के लिए निकालने से लेकर बीवी के लिए लिपिस्टिक लाने तक के सारे निर्णय जाँच आयोग के सामने से गुज़रकर अपनी नियति को प्राप्त होंगे। हमारे यह आदर्श इस शहर से कहीं छह सौ किलोमीटर दूर गोण्डा, बहराइच, बलरामपुर से होते हुए इस एक कमरे वाले गाँव तक पहुँचते हैं। यह नौकरी होने या न होने से परे हैं। यह एक ऐसे बिन्दु पर अवस्थित हैं, जहाँ ऐसे कोई भी सवाल उन्हे छू नहीं सकते। छूने पर वह पिघलेंगे नहीं, करंट मारेंगे।

यह सिर्फ़ मेरी, इस शहर, इस घर की, उस कभी न मिल पाने वाली लड़की की बात नहीं है। यह उन तमाम न कही गयी चुगलियों का लेखा-जोखा है, जो सामने होते हुए भी सामने नहीं है। इस तरह पता है, मैंने क्या किया है। मैंने तुम्हें बचा लिया। तुम जो ताजमहल को पीठ दिखाये मेरी तरफ़ देखते हुए फोटो खिंचा रही हो, वहाँ तस्वीर खींचने वाला भले कोई और है। पर जब-जब उसे देखता हूँ तो लगता है, तुमने बड़ी चालाकी से मेरी तरफ़ हिकारत की नज़रों से देखते हुए उस तरफ़ देखा होगा। तुम कहाँ इस तरह मेरी ज़िंदगी में अट पाती। कहाँ तो हम पहलीबार तुम्हारी सहेली की शादी में किसी कानपुर जा पाते। तुम्हारा इस बड़ी-सी खिड़की वाले कमरे में दम घुटता। अच्छा हुआ हमने आपस में शादी नहीं की। सच, तुम जहाँ हो वह इससे लाख गुना अच्छी जगह है। मैं भी यही चाहता था, तुम अच्छी जगह रहो।

मेरे पास बस एक गाना बचा है, इस रात को बिताने के लिए, वक़्त हो, मन हो, तो तुम भी सुन लेना कभी।

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