सितंबर 15, 2015

हिन्दी दिवस: इस मरतबा

असहमति

अपूर्वानंद दिल्ली विश्वविद्यालय में हमारे मास्टर रहे हैं। हम आज भी उनसे काफ़ी कुछ सीखते हैं। हमने उनसे बात को तार्किक आधार से कहने का सहूर सीखा और लिखकर उसे कहने का कौशल भी। लेकिन वह एनडीटीवी के 'मुक़ाबला' में कैसी बात कह रहे हैं। समझ नहीं आता। वह जब अल्पसंख्यक समुदाय का हवाला देते हुए यह कहते हैं कि उस 'पशु विशेष' में ही सारी पौष्टिकता प्रचुर मात्रा में है और उसी झोंक में यह भी कहते हैं कि यह माँस ही उनकी क्रय शक्ति के भीतर है; बात समझ नहीं आती।

इस प्रचुरता को तो थोड़ी देर वह एक तरफ़ रख दीजिये, बस वह इतना बता दें कि किस शोध के हवाले से वह यह बात कह रहे हैं।

उन्हे शायद अब थोड़ा भूगोल पढ़ना चाहिए। जिस तरह के गरम भौगोलिक परिवेश में हम रहते हैं, उसमें उपरोक्त पशु के मांसाहार से शारीरिक व्याधियाँ अधिक घेरती हैं, पौष्टिकता तो जाने दीजिये। और वह शायद तब यह भी देख पाएँ कि कैसे हरित क्रान्ति की आँधी में नकदी फसलों के प्रोत्साहन से किस तरह दालें कहीं पीछे की कतार में जाकर खड़ी हो गयी, जो पॉल्ट्री उद्योग के अंडे आने से पहले भारतीय समाज में प्रोटीन की स्रोत रहीं थी।

मुझे पता है, उन तक मेरी बात नहीं पहुँचेगी। फ़िर भी कहे दे रहा हूँ।

{सितंबर चौदह, नयी दिल्ली, शाम छह बजे }

2.
आज हिन्दी दिवस है। मैंने आज पूरा दिन हिन्दी में ही दिमाग चलाया। जो भी दृश्य लिखे वह सब इसी भाषा में थे, मेरे रेडियो पर भी सब हिन्दी फिल्मों के गाने बज रहे हैं। जिसमें सबसे बढ़िया गाना फेंटम का अफ़गान जलेबी लगा। मन हो, वक़्त हो आप भी सुन सकते हैं।

इस तरह मेरा हिन्दी दिवस मन गया। बस माइक्रोसॉफ़्ट वालों से गुजारिश है, मुझे अपने विण्डो फ़ोन में हिन्दी लिखने की 'गूगल इनपुट' सेवा या उनकी खुद की 'भाषा' सेवा देने की कृपा करें। जय हिन्दी।

{चौदह सितंबर, नयी दिल्ली, आठ बजे रात }

3.
जो राजेन्द्र यादव ने कभी नहीं किया, वह एबीपी न्यूज़ के हिन्दी उत्सव  में जाकर रचना यादव ने कर दिखाया। उन्हे बधाई। पुराने ढहेंगे, तभी नए बनेंगे। नव-निर्माण की शुरवात हो चुकी है।

#‎राजेन्द्र_यादव‬ ‪#‎हिन्दी_उत्सव_पुरस्कार‬

{पंद्रह सितंबर, शाम सवा सात बजे }

4.
यह हमारी सहूलियत है या कुछ और कह नहीं सकता के कैसे 'श्रृंखला' की जगह आज जनसत्ता ने 'इंदिरा और राजीव वाले टिकटों की छुट्टी' शीर्षक से छपी ख़बर में 'शृंखला' का इस्तेमाल किया है।

कोई भाषाविद् या तकनीकी ज्ञान से सम्पन्न व्यक्ति इस पर प्रकाश डाल सकें तो हम भी इसे जान सकेंगे।

वरना इसके बाद सिरे से महादेवी वर्मा की कृति को ढूँढ़ते हुए हिन्दी समय से लेकर विकिपीडिया तक 'शृंखला की कड़ियाँ' लिखा हुआ मिला। क्लिप का लिंक  यह है।

{सितंबर पंद्रह, रात पौने बारह के लगभग }

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