सितंबर 06, 2015

विवेक के हक़ में

यह तस्वीर जिस वक़्त की है, तब घड़ी पाँच बजकर बाईस मिनट पर स्थिर है और मदन कश्यप अपनी कविता ‘ढपोरशंख’ सुना रहे हैं। मुझे भी आए हुए काफ़ी देर हो चुकी है। शायद एक डेढ़ घंटे से खड़ा हूँ। खड़े-खड़े कमर में दर्द जैसा था, पर लौटने का मन नहीं था। देवेश से पहले समर मुझे वहीं एक कंधे वाला झोला टाँगे देखे। पास बुला लिया। साथ खड़े रहे। हमारे आसपास बहुत से लोग घेरा बनाकर कुर्सियों के इर्द-गिर्द खड़े हैं। हम भी उसी घेरे का एक हिस्सा हैं। हमसब शर्तिया बूढ़े घुटने वाले लोग नहीं हैं। उनकी ताकत अभी चुकी नहीं है। हम खड़े हो सकते हैं। फ़िर सार्वजनिक रूप से ऐसे किसी कार्यक्रम में पहली बार जाने का लाभ यह होता है कि भीड़ में अपरिचित बनकर आप काफ़ी देर तक वहाँ जमे रह सकते हैं। कोई नहीं पूछता कैसे हैं? क्या कर रहे हैं? वहाँ बहुत से सार्वजनिक व्यक्ति परिचय से बचना चाहते हैं। चाहते हैं यह संकोच कोई पास आकर न तोड़ दे। लेकिन ऐसा होता कहाँ है। जो पहचान जाते हैं। वह बता देते हैं, हम पहचान गए।


धीरे-धीरे सूरज ढल रहा है। गर्मी नहीं है। उसका एहसास नहीं है। बीच में एक चाय वाला प्लास्टिक के गिलास लिए घूमता दिखा। याद नहीं किसी ने उससे कुछ लिया भी हो। इस बैनर के पीछे से संजीव सर आगे बैठे किसी बुजुर्ग के लिए चाय का कप लाये और पूछने लगे कुछ और लेंगे। वे मुरली मनोहर प्रसाद हैं। सहजता से वे मना कर देते हैं। इधर मंच पर कभी अशोक कुमार पाण्डे उद्घोषक की भूमिका में होते कभी संजीव जी। संचालन इसी तरह चलता रहा। शमसुल इस्लाम के बाद मंच पर जनम की एक साथी ने राजेश जोशी की कविता ‘वली दक्कनी’ का पाठ किया। कविता की सबसे शानदार पंक्तियाँ अंत होने से कुछ क्षण पहले खुलती है, जब वे कविता में कहते हैं:

यक़ीन करें मुझे आपकी मसरूफ़ियतों का ख़्याल है/ इसलिए उस तवील वाकिए को मैं नहीं दोहराऊँगा/ मुख़्तसर यह कि/ एक दिन..!/ ओह ! मेरा मतलब यह कि/ इक्कीसवीं सदी की पहली दहाई के शुरूआती दिनों में एक दिन/ उन्होंने वली दकनी का हर निशान पूरी तरह मिटा दिया/ मुहावरे में कहे तो कह सकते हैं/ नामोनिशान मिटा दिया !/ उन्ही दिनों की बात है कि एक दिन/ जब वली दकनी की हर याद को मिटा दिए जाने का/ उन्हें पूरा इत्मीनान हो चुका था/ और वे पूरे सुकून से अपने-अपने/ बैठकखानों में बैठे थे/ तभी उनकी छोटी-छोटी बेटियाँ उनके पास से गुज़री/ गुनगुनाती हुई: वली तू कहे अगर यक वचन/ रकीबां के दिल में कटारी लगे !

अचानक मेरी नज़र अपने पीछे दायीं तरफ़ गयी तो कुर्ते पयजामे में सतीश देशपांडे खड़े दिखे। तब इनकी वह बात याद आती रही कि हिन्दी भाषी नहीं हूँ पर हिन्दी में ही कहने की कोशिश करूँगा। सीआइई की वह रिकॉर्डिंग पता नहीं कैसे मोबाइल में गुम हो गयी जो अभी तक मिली नहीं है। प्रियदर्शन अभी आकर भीड़ में गुम होना ही चाहते थे कि बिलकुल हमारे पीछे उन्हे उनके एक फ़ेसबुक मित्र ने न केवल पहचान लिया बल्कि इतमिनान से बताने लगा कि वह कितनी गंभीरता से उनकी पोस्टों को पढ़ता है। वह पता नहीं किस बात पर कह रहे थे, सब पूँजी का खेल है। होगी कोई बात। विजेंदर जी और नीलिमा जी दोनों साथ आए थे। और दिल्ली विश्वविद्यालय के साथी मास्टरों से मिलते हुए कहीं गुम हो गए। संजय सहाय, संपादक हंस, एवाने गालिब जैसी ही पोशाक में थे। वे आगे जाकर कुर्सी पर विराजमान हो गए। आनंद प्रधान को अपने लंबे होने का फ़ायदा मिलता है। वे दूर से ही पहचान लिए जाते हैं। समर इनकी टोह लेते हुए पकड़े गए थे।

देवेश ने भी अपनी शिक्षिकाओं को दूर से ही अभिवादन कर लिया। ऐसे न जाने कितने लोग, इसी पहचानने और न पहचानने के अनकहे दौर में बीत गए होंगे। अभी तक ख़ुद नहीं पहचान पाया कि वह डी. राजा ही थे, जो बगल में कुर्सी पर बैठे हुए थे। शाम की बातें बहुत सारी हैं। जैसे पंकज सिंह की लंबी कविता। केरल से दिल्ली चलकर आए उस दल के जिन्होने मलयालम में क्रांति गीत गाया। वह भी जब बालेंदु जी मसिजीवी की बात को थोड़ा रद्दोबदल के साथ दोहराते हुए कहते हैं: हिन्‍दी में कोई ऐसा कुछ क्‍यों नहीं लिख पाता कि उससे व्‍यवस्‍थाएं इतना डर जाएं कि गोली मारना लाजिमी हो जाए। आप मारिए। कितनों को मारेंगे। हमें ख़ुद को मरने के लिए तय्यार करना है।

आप इन सवालों से जूझते रहिए। समाचार यह है कि इस हत्या के विरोध में उदय प्रकाश, अशोक वाजपेयी और चित्रा मुद्गल के प्रति आभार व्यक्त करते हुए, मोहनदास पर मिले 2010-11 के साहित्य अकादमी पुरस्कार को लौटा रहे हैं। हम सब भी लौटेंगे, एक दिन।

{किश्त पिछली, इसे एक राजनीतिक वक्तव्य होना था।}

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