सितंबर 05, 2015

गुरु-चेला संवाद

गुरु: पुनीत जी आपकी इस किताब पर मैंने जनसत्ता में लिखा था। वह भी खरीद कर। इस पर लिखी गई बेहद कम समीक्षाओं में एक वह भी। लेकिन हम जैसे हिंदी के मामूली लेखक आपको याद नहीं रहते। हिंदी के लेखक में ग्लैमर नहीं होता न। लेकिन दुर्भाग्य से आप भी उसी ग्लैमरहीन भाषा के लेखक हैं। बहरहाल शुभकामना आपको। ख़ुशी हो रही है।

चेला: सरजी, ऐसा क्यों कहते हैं.. हमें इस किताब को लेकर एक-एक लोग याद हैं.. आपने लिखा सो लिखा ही.. मौके-मौके पर जबरदस्त ढंग से इसकी बात लोगों तक रखी. कुछ बातें दुरुस्त करके स्टेटस में लिखी है, पढ़िएगा न।

चेले का दुरुस्त स्टेटस:
हिन्दी के तमाम अखबार के लोगों ने इसे पढ़ा। फोन पर बधाई दी, मिलने को कहा। और बेहतर करने के सुझाव दिए लेकिन इस पर कुछ लिखना-कहना जरूरी नहीं समझा.. इस बीच निशांतजी का विस्तार से लिखा जनसत्ता में आया.. निशांतजी के लिखे की सबसे खास बात थी कि उन्होंने किताब के उस हिस्से को मजबूती से पकड़ा जहां पत्रकारिता, धंधा और राजनीतिक धत्तकर्म एक सर्किल बनाते नजर आते हैं. किताब युवा साहित्य अकादमी की आखिरी दौड़ तक जाकर रह गई। निशांतजी ने इस पर फिर से स्टेटस अपडेट किए और कुछ वो वजहें बताई जो पुरस्कार-सम्मान की मकड़जाल की कहानी कहती है। 

चेला (दोबारा, हिचक से बाहर आकर): निशांतजी जब कभी मेरी वॉल पर अपने को हिन्दी का मामूली लेखक लिखते हैं, लगता है अपना माथा नोच लूं या फिर अपनी आंखें फोड़ लूं। न ये आंखे रहेंगी और न ऐसे वाक्य पढ़ने पडेंगे।

हिन्दी क्या दूसरे अनुशासन के लोगों का मार्केज से परिचय करानेवाला, स्कॉर्पियो क्लास लिखनेवाला, टेढ़ीपुलिहा को नए लोगों के लिए छपाई का ऐशगाह बनानेवाला हिन्दीजीवी आखिर किस हाल में मामूली होगा। असल में हम जिसे निशांतजी की सहजता समझते हैं, बाकी कई दूसरे लोगों की अकड़ के पाजामे धारण करनेवाले से अलग समझते हैं, निशांतजी खामखां उसके लिए मामूली शब्द का इस्तेमाल कर जाते हैं। निशांतजी, आप जब भी अपने लिए मामूली शब्द का इस्तेमाल करते हैं, मुझे अपना कद बहुत ज्यादा ठिगना लगने लग जाता है..आप हमारे लिए इंचटेप हो, हम अपना कद आपसे मापते हैं..प्लीज मत लिखा करें ऐसे शब्द..हमारा उत्साह मरता है..चायगोई का लेखक तो मामूली करार दिए गए लोगों के उद्दात्त रूप को हमारे सामने ला रहा है..उसका मामूली होना जमाने का प्रहसन है।

{यहाँ गौर करने लायक है, चेले का गुरु के नाम की माला जपना। ख़ुद गिनकर देखिये, कितनी बार निशांतजी का नाम लिया गया है }

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