सितंबर 24, 2015

बातें बेतरतीब..

जब कुछ दिन रुक जाओ तब ऐसे ही होता है। कितनी बातें एक साथ कहने को हो आती हैं। जबकि मन सबको धीरे से कह चुका है, कह देंगे इतमिनान से। पर कौन मानने वाला है। कोई नहीं मानता। कभी-कभी जब अपने चारों तरफ़ देखता हूँ तो लगता है, उन सबमें सुस्त क़िस्म का रहा होऊंगा। कछुए जैसा। तभी आज तक वहीं का वहीं हूँ। वह आले दर्ज़े के इरशाद रहे होंगे, जो क़ाबिल होकर वहाँ पहुँच सके, जहाँ सब पहुँच जाना चाहते थे। मैं कहीं नहीं पहुँच सका। तब एहसास होता, यह कोई दौड़ नहीं है। तब लगता, यह बहस किसी काम की नहीं। इसका कोई मतलब नहीं है। सब बकवास है। मेरी तरह। 

दुनिया इससे भी अश्लील है। और सबसे खतरनाक है, हमारी दुनिया का इस तरह न दिख पाना। ऐसा क्या हुआ जो इसमें इस तरह दिख पाने की क़ाबिलियत कम होती गयी। पता नहीं। पर मेरी समझ में वह सब बहुत कमज़ोर हैं, जो बिन कपड़े वाली अश्लीलता की तरफ़ खिंचे चले जाते हैं। उनमें हिम्मत है। पर उस कमरे के भीतर। वह उन शब्दों से उस स्पर्श को ‘छूने’ में तब्दील कर उस कमरे की खिड़की के पीछे छिप जाते हैं। अकसर ऐसा करते हुए वह अपने अंदर छिपी हुई उन इच्छाओं की तस्वीर उकेरते हुए अपने कोमलतम हृदय को छलनी करते रहते हैं। वह कभी नहीं देख पाते किसी रुखसार पर अटके हुए तिल को गर्दन से होते हुए छूने की तमन्ना पीठ के एक ख़ास कोण पर जाकर ठहर जाना। उनपर ठहरी पसीने की बूँदों से गँधाती बनियान रोज़ पानी से धुलने के बावजूद बदबू से बजबजाना कम नहीं करती। वह नहीं चाहती बदबू देना। तिस पर नहीं लगाना चाहती घरों में पोंचा। कभी नहीं चाहती उन बड़ी औरतों से कुछ सुनना।

इससे जादा अश्लील और क्या होगा, जो लोग पहले कुछ लोगों से उनका पता पूछ-पूछकर मारपीट करते थे, वही अब उनके सांवैधानिक प्रतिनिधि बनने की प्रक्रिया में शामिल हो गए हैं। वह अपनी राजनीतिक ज़मीन की तलाश में महाराष्ट्र से उठकर बिहार चले आए हैं। अब बिहारी होने पर पिटाई नहीं होगी। जब वह नहीं जीतेंगे, तब होगी। क्योंकि इनकी पहचान करना उतना ही आसान है, जितना रात एक बजे किसी होटल के कमरे की कुंडी खटखटाना और लड़का-लड़की को पकड़ लेना। ‘मसान ’ इस हिस्से की सबसे जटिल कहानी कहती है। फ़िर हमें पता चलता है, बनारस छोटा शहर है। उसे बंबई नहीं कह सकते। पर इस नज़र से सब बनारस है और सब शिवदासपुर है।

हम रोज़ उन जगहों से अपने अंदर-बाहर गुजरते रहते हैं पर जैसे हम कुछ देखते ही नहीं हैं। तुम किसी महँगी शराब के फिरोज़बादी गिलास को पकड़े, हाथ की उँगलियों में फंसाई हुई सिगरेट के धुएँ में उन सब पर थूक रहे हो। जो तुम्हारे इस नंगे कमरे से बाहर हैं। यह दुख की बात है। मुझे पता है, तुम मुझे पढ़ रहे हो। इसलिए तुम्हारा नाम नहीं ले रहा। पर दोस्त उन बिखरे कपड़ों के बाहर पड़ी वह लड़की, कुछ पल तुम्हारी नशीली आँखों में डूब कर कोई हसीन खवाब देख रही होगी। क्या तुम चाह कर भी उसके साथ छत पर उन चाँद-सितारों के पार उस सपनीली दुनिया में ले जा सकोगे। तुम शरत चंद्र को पढ़ते हो। पर शरत चंद्र बनने की हिम्मत तुममे भी नहीं है। तुम कहते भले हो तुम्हें पता है। पर तुम जानते नहीं हो। उसे पैसे देकर वापस भेज देना अश्लील नहीं है। तुम्हें पता ही नहीं है, सबसे अश्लील क्या होता है?

सबसे अश्लील होता है, बिन नौकरी शादी कर लेना और माँ के बुखार में तपते रहने के बावजूद ऊपर इस कमरे में आकर लिखते रहना।

2 टिप्‍पणियां:

  1. सबसे अश्लील का स्वानुभव ... अश्लील के अलग अलग मायनों में ये मुझे फिट नहीं लगता ...

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    1. मैं भी 'फ़िट' नहीं कर रहा, बस वह ऐसा लग रहा है, पर तब तुम बताओ अश्लील क्या है..?

      लिखते वक़्त जो लिखता गया उसे बैठकर देखने और दूर से पढ़ने में शायद यह अंतर ज़रूर आया होगा। पर मेरे लिहाज से यह एक भाव है, जो हमारे अंदर उन परिस्थितियों में सबसे जादा हावी हो जाता होगा, जो चाहकर भी हमारे नियंत्रण में नहीं होती होंगी।

      तुम किस बात से असहमत हो, बताओ ज़रा..

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