सितंबर 04, 2015

इसे एक राजनीतिक वक्तव्य होना था..

बिलकुल अभी, सीढ़ियाँ चढ़ते हुए सोच रहा था, कितना अच्छा होता, मैं इस दुनिया के किसी भी देश का नागरिक न होता। पर इस सोचने के साथ ही एक पल में मैंने न केवल राष्ट्र-राज्य के राजनैतिक इतिहास को ख़ारिज कर दिया अपितु इस किसी भी तरह से हताश दिखने वाली टिप्पणी में उन सारी परिस्थितियों को भी ताक पर रख दिया, जिसमें यह छोटी-सी छत का एक बड़ा-सा कमरा मुझे अपने अंदर छिपाये रखता है। यह वह अवस्थिति है, जो एक पागल अस्थिर दिमाग की उपज जादा लगती है। हो सकता है, यह है भी। जैसे हम होते गए हैं उसमें इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। पर इस स्थिति को थोड़ी देर स्थगित करते हुए थोड़ा सोचने लगता हूँ तो दीपांकर गुप्ता याद आने लगते हैं। 

हमें एक उपनिवेश होने का लाभ मिला, जिसके फलस्वरूप हमने लोकतान्त्रिक व्यवस्था को शासन प्रणाली के रूप में चुना। आरक्षण के रूप में सकारात्मक भेदभाव को चुनते हुए, धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय के संरक्षण को भी सशक्त रूप से स्वीकार किया। यह सब माँगें भले पश्चिम की अवधारणों से निकली थीं, लेकिन यह विविधता पूर्ण राष्ट्र के भविष्य के लिए देखे गए सपने थे। स्वतन्त्रता आंदोलन के रूप में एक साथ इन सभी विरोधाभासी घटकों को लेकर आज़ादी की तरफ़ बढ़ रहे भौगोलिक क्षेत्र को दीर्घकाल में एक समतामूलक समाज में परिवर्तित हो जाने के लिए बाध्य परिस्थितियों का निर्माण करना था। आज भी हम इस संघर्ष में डटे हुए हैं।

लेकिन लगता है, कहीं चूक हो गयी है। जिन प्रणालियों को हमने अपनाया, वह इस समाज के लिए जैविक निर्णय की तरह नहीं बन पायीं। यह कौन-सी ताक़तें हैं, इसकी पहचान इतनी मुश्किल भी नहीं है। महात्मा गाँधी की दिल्ली में हत्या इस असंतोष की पहली प्रामाणिक उपस्थिति है। इसे किसी सिरफिरे के दिमाग की उपज कहकर ख़ारिज नहीं किया जा सकता। पूरा देश जिस तरह ख़ुद को गढ़ने की कोशिश कर रहा था, उसमें यह सबसे बड़े हस्तक्षेप के रूप में आया। फ़िर भी यह देश सपनों का देश है। आज भी जब कभी कसप उठाता हूँ, आगे लिखी देवीदत्त की पंक्तियाँ, इस देश पर सबसे बड़े राजनैतिक वक्तव्य की तरह मिलती हैं:“दुर्भाग्य से इस देश में एक ख़ास तरह का काईयांपन प्रबुद्धता के नाम पर प्रतिष्ठित हो गया है और मैत्रेयी उससे अछूती नहीं रह सकी है। यह काइयांपन शायद ह्रासोन्मुख हिन्दू मानस की देन है। इसके चलते गरीबी और उपभोग की संस्कृति का वह दारुण समन्वय किया गया है, जिसका नाम आधुनिक भ्रष्ट भारत है। इस भारत के लिए प्रतीकात्मकता ही सब कुछ है। तकली थाम लेने से गांधीवाद हो जाता है। बंदूक पकड़ लेने से माओवाद। सेमीनार कर लेने से संस्कृति। चुनाव करा देने से लोकतंत्र। सड़क बना देने से प्रगति। संस्था खोल देने से संस्था के उदेश्यों की पूर्ति”।

इसी के आसपास पार्थ चटर्जी सन् उन्नीस सौ छियानवे में जर्मन दार्शनिक इमानुएल कांट के सहारे कहते हैं, हर कोई स्वतः प्रबुद्ध नहीं होता, उसे प्रबुद्ध होने की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। जो गुज़र गए हैं, वह सीमातित हैं। वह अपने लिए उस परिधि का निर्माण करते हैं, जहाँ वह तर्क कर सकें, वह सहिष्णु हो सकें। स्वयं में दूसरे की बातों को सुनने के साहस को भर सकें। वह वैचारिक भिन्नता का आदर करते हैं। स्वतन्त्रता के सपने देखने के लिए स्वतंत्र होते हैं। वह एक मुक्त और सार्वभौमिक क्षेत्र होता है, जहाँ प्रबुद्ध होने की परिस्थितियाँ लगातार बनती हैं। इसके लिए सबसे ज़रूरी है, विचारों की स्वतन्त्रता। स्वतन्त्रता का उत्तरदायित्व पूर्ण निर्वहन। दुर्भाग्यपूर्ण है, किन्तु यह सत्य है, हम अपने यहाँ ऐसे क्षेत्रों का निर्माण करने में बहुत पीछे छूट गए हैं। पीछे छूटना एक ख़ास तरह की सुविधा का उपभोग करना है। वह तार्किक नहीं हैं इसलिए आस्थावान हैं। उनके पास अपनी भावनाओं के ठेस पहुँचने का सारा बहीखाता है।

मैंने भी कह दिया है, कलतीन बजे जंतर मंतर मिलुंगा। वहाँ कोई मुझे पहचानेगा नहीं पर फ़िर भी ख़ुद के लिए जाऊँगा। हो सकता है, एक दिन मेरी पत्नी भी दरवाजा खोलकर उन दोनों कम उम्र के नौजवान लड़कों को बैठने के लिए कहे और वह मुझे देखते हो बंदूक से मार दें। मैं जाऊँगा कि हमेशा बोल सकूँ। उनकी आदत अगर मारना है, तब हमारी आदत बोलना है। हमें ख़ुद तय करना है, हम चुप रहेंगे या उस देश को बनाएँगे जो सबकी आवाज़ों को सुन सके। मेरा लिखना ही मेरी ज़िन्दगी है। आने वाली पीढ़ियाँ भी कह सकें इसलिए जाऊँगा।

{दिन शनिवार, जंतर मंतर, विवेक के हक़ में। }

2 टिप्‍पणियां:

  1. बंदूक पकड़ लेने से माओवाद। सेमीनार कर लेने से संस्कृति। चुनाव करा देने से लोकतंत्र। सड़क बना देने से प्रगति। संस्था खोल देने से संस्था के उदेश्यों की पूर्ति”। satik aur sahi kaha hai !!

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    1. 'कसप' सन् 1982 में लिखा गया और उन्होने भी क्या ख़ूब बखिया उधेड़ी है। लाजवाब।

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